गृहशोभा विशेष

एक राष्ट्रीय पुरस्कार, तीन फिल्मफेयर अवार्ड और एक एशिया पेशिफिक स्क्रीन अवार्ड से सम्मानित अभिनेता राज कुमार राव की गत वर्ष की चर्चित फिल्म ‘‘न्यूटन’’ को भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के रूप में आस्कर अवार्ड में भेजा गया था. अब उसी फिल्म ‘न्यूटन’ को इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किए जाने का ऐलान हुआ है. इससे राज कुमार राव काफी उत्साहित और खुश हैं.

न्यूटन’’को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किए जाने का ऐलान हो चुका है. आपकी प्रतिक्रिया?

बहुत खुश और उत्साहित हूं. यह पूरी टीम की सफलता है. यह उस विषय को सलाम है, जिसे पूरे देश ही नहीं विश्व भर में पसंद किया गया. जिसके साथ लोगों ने रिलेट किया. फिल्म‘न्यूटन’पूरी तरह से एक युनिवर्सल फिल्म है. हम सभी ने जिस ईमानदारी के साथ फिल्म में लोकतंत्र से जुड़े अहम मुद्दे को उकेरा, उसे ही यह सम्मान मिला है. मेरे लिए इस फिल्म का पुरस्कृत होना बहुत मायने रखता है. मुझे याद है कि इस फिल्म के लिए शूटिंग करना हमारे लिए आसान नहीं था. मैं अपनी तरफ से ज्यूरी को धन्यवाद देना चाहूंगा. ‘न्यूटन’को पुरस्कृत करने की घोषणा मेरी नई फिल्म‘ओमार्टा’के प्रदर्शन के एक सप्ताह पहले हुई है. ‘अब मेरी जिम्मेदारी बढ़ गयी है.

2017 से मेरे करियर में बहुत कुछ अच्छा हो रहा है. 2017 में प्रदर्शित मेरी सभी फिल्में बाक्स आफिस पर सफल रही ओर जबरदस्त रूप से सराही गयी. 2018 की शुरुआत से ही मुझे खुशी देने वाली खबरें मिल रही हैं. पहले खबर आयी कि मेरी अंग्रेजी भाषा की पहली फिल्म‘‘ फाइव वेडिंग्स’’इस बार ‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’मे जा रही है और अब ‘न्यूटन’को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार..मैं तो बहुत प्रसन्न हूं.

इस साल मेरी ‘फन्नेखां’, ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’, ‘स्त्री’, ‘मेंटल है क्या’जैसी एक साथ कई फिल्में आने वाली हैं. मेरे लिए खुशी की बात यह है कि बहुत कम समय में मेरी कई फिल्में रिलीज होंगी, जिनमें दर्शक मेरे अभिनय के अलग अलग रंगों का आनंद ले सकेंगे.

लोग ‘‘न्यूटन’’के साथ क्यों रिलेट कर रहे हैं?

हर देश में लोकतंत्र के चलते कुछ समस्याएं भी हैं. इसलिए लोग इस फिल्म के साथ रिलेट कर रहे हैं. एक इंसान जो कि सिस्टम में रहकर इमानदारी से काम करता है, साथ में ही वह अपने सिस्टम को भी फौलो करता है. दर्शक ऐसी दुनिया को देख पा रहा हैं, जिसके बारे में सुना था. झारखंड और नक्सल प्रभावित इलाका, जहां पर चुनाव कराना आसान नहीं.

क्या आप फिर से बताना चाहेंगे कि फिल्म‘‘न्यूटन’’क्या है?

अब तो इस फिल्म से लोग अच्छी तरह से वाकिफ हो चुके हैं. लोगों ने फिल्म देख ली है. फिल्म ‘‘न्यूटन’’ चुनाव के साथ साथ वोट देने की बात करती है. यह एक हल्की फुल्की ब्लैक कामेडी वाली फिल्म है. यह एक दिन की कहानी है. छत्तीसगढ़ के जंगलों में जहां सिर्फ 76 वोट हैं, वहां न्यूटन नामक यह युवक जाकर वोटिंग करवाता है. वहां पर नक्सल वादियों का भी आतंक है. लेकिन न्यूटन सिद्धांतों वाला इंसान है. वह चाहता है कि सभी लोग अपने मताधिकार का उपयोग करें. न्यूटन एक ऐसा युवक है, जो कि सिस्टम में रहकर चीजों को बदलना चाहता है. अब यह बदल पाएगा या खुद बदल जाएगा, यही सवाल है. वैसे भी कहा जाता है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता.

इसमें दर्शकों ने मुझे न्यूटन के शीर्ष किरदार में देखा है. यह एक सरकारी मुलाजिम है. वह कलेक्टर यानी कि जिलाधिकारी के दफ्तर में क्लर्क है. इस नक्सल प्रभावी इलाके में कोई भी इंसान चुनाव करवाने के लिए चुनाव अधिकारी के रूप में नहीं आना चाहता. तब न्यूटन को यह जिम्मेदारी दी जाती है. न्यूटन को लगता है कि नौकरी, नौकरी होती है. काम कोई भी हो, हमें अपने हर काम को पूरी इमानदारी के साथ करना चाहिए. निजी जिंदगी में भी मेरी यही सोच है कि काम काम होता है. हर काम को सम्मानजनक तरीके से किया जाना चाहिए.

आपके अनुसार लोकतंत्र और वोट का अधिकार कितने महत्वपूर्ण ढंग से फिल्म में उभरा है?

देखिए, देश की आजादी को 70 वर्ष हो गए. पर अभी भी देश का एक तिहाई इंसान वोट देने नहीं जाता. शायद हमें अभी तक अपने वोट का महत्व समझ नहीं आया. जबकि लोकतांत्रिक प्रकिया में इंसान का सबसे मजबूत हथियार वोट है. वोट देकर हम तय कर सकते हैं कि हमें किस तरह का देश चाहिए? हमारी फिल्म ‘‘न्यूटन’’ देखकर लोगों को अहसास हो रहा है कि चुनाव और वोट कितना महत्वपूर्ण है.

20 अप्रैल को प्रदर्शित होने वाली आपकी फिल्म‘‘ओमेर्टातो आतंकवादी उमर सईद की कहानी है. क्या ऐसे इंसान की कहानी को परदे पर लाना जायज मानते हैं?

जब तक हम उसे हीरो बनाकर नहीं दिखा रहे हैं, तब तक उसकी कहानी को बयां करना गलत नहीं है. आतंकवाद दुनिया का सच है. आतंकवाद से पूरी दुनिया जूझ रही है. यह कहानी सिर्फ आतंकवाद पर नहीं है, बल्कि कहानी यह है कि एक स्मार्ट लड़का आतंकवाद का रास्ता क्यों चुनता है? उसकी यात्रा क्या है? हमने अब तक आतंकवाद को इस नजरिए से देखा है कि एक आतंकवादी ने कहां कितने लोगों को मौत के घाट उतारा. पर इस फिल्म में हम आतंकवाद को दूसरे नजरिए से देख रहे हैं. यह जरुरी है जानना कि आखिर आतंकवाद से छोटे छोटे लड़के क्यों जुड़ रहे हैं. बांगलादेश में तो पढ़े लिखे स्टूडेंटों ने यह काम किया. सिर्फ आतंकवादियों पर बम फेंक देने से आतंकवाद खत्म नहीं होगा. इसकी जड़ में जाकर वजह समझनी होगी. आखिर बच्चे इस रास्ते से क्यों जुड़ रहे हैं.

हर फिल्म में अलग अलग किरदार निभाना कितना आसान होता है?

आसान नहीं होता है. बल्कि काफी मेहनत करनी पड़ती है. मगर कलाकार के तौर पर आत्मसंतुष्टि भी विविधता पूर्ण किरदार निभाते हुए ही मिलती है. देखिए, हर किरदार की अपनी मांग होती है और हर किरदार की मांग को पूरा करना कलाकार के तौर पर मेरी जिम्मेदारी होती है. मैं अपने किरदार की मांग पर अपना वजन बढ़ाता और घटाता भी हूं. यह मेरा काम है, पर कई बार किरदार बहुत डिमांडिंग होता है. अब मैं हर जानर की फिल्म कर रहा हूं. यथार्थपरक और बायोपिक फिल्में करने के बाद अब मैं रोमांटिक, रोमांचक, नाटकीय के साथ साथ सुपर नेच्युरल पावर वाली फिल्म भी कर रहा हूं.

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