गृहशोभा विशेष

अपने किरदार के माहिर खिलाड़ी पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित नसीरुद्दीन शाह, अभिनय और कला की ऐसी जुगलबंदी हैं जिस का आज तक कोई तोड़ नहीं है. बाराबंकी (उत्तर प्रदेश) में जन्मे  59 वर्षीय नसरुद्दीन शाह की अदाकार बनने की ख्वाहिश जन्मजात थी. उन्होंने इस की बारीकियां जरूर दिल्ली में नैशनल स्कूल औफ ड्रामा से सीखीं, लेकिन नाटकों के प्रति उन का प्रेम बचपन से ही था. एक पढे़लिखे और नामचीन परिवार से होने के कारण नसीरुद्दीन को हमेशा उन की कोशिशों के लिए प्रोत्साहन मिला. सेंट जोसेफ स्कूल, नैनीताल से अपनी स्कूलिंग और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने वाले नसीरुद्दीन शाह शुरू से ही मेधावी छात्र रहे. बाद में इसी सेंट जोसेफ स्कूल में उन्होंने अपनी फिल्म ‘मासूम’ की शूटिंग की.

जब एनएसडी में उन का दाखिला हुआ, तभी उन्होंने अपने घर वालों से वादा किया था कि वे एक अभिनेता बन कर ही घर लौटेंगे. वे अपने वादे पर कितने खरे उतरे है उस का अंदाजा आज फिल्मी दुनिया में उन के कद को देख कर लगाया जा सकता है. उन्होंने अपनी अभिनय पारी की शुरुआत समानांतर सिनेमा से की. 1975 में आई उन की फिल्म ‘निशांत’ व इस के बाद ‘आक्रोश’, ‘स्पर्श’ जैसी प्रासंगिक फिल्में.

नसीरुद्दीन शाह की कामयाबी की सब से बड़ी वजह उन का अभिनय रहा है. वे हर किरदार को करने से पहले सोचते हैं कि क्या वे इस के प्रति न्याय कर पाएंगे? फिर जब वे अभिनय करते हैं तो बस उसी के हो जाते हैं. जैसेजैसे उन का फिल्मी सफर आगे बढ़ता गया वैसेवैसे उन का अभिनय सौंदर्य भी निखरता गया. ‘हम पांच’, ‘कर्मा’, ‘इज्जत’ फिल्मों ने उन्हें मुख्यधारा के अभिनेताओं में शामिल कर दिया. बेशक वे एक स्टार छवि के करीब कभी न पहुंचे हों, लेकिन अभिनय की परीक्षा में हमेशा खरे उतरे हैं. नसीर का जादू इंडिया में ही नहीं पाकिस्तान में भी चला. पाकिस्तानी फिल्म ‘जिंदा भाग’ में उन के जीवंत अभिनय को खूब सराहा गया और यह फिल्म औस्कर तक पहुंची. अपनी पहली फिल्म ‘निशांत’ के विश्वम से ले कर ‘डेढ़ इश्किया’ के इफ्तखार तक हिंदी फिल्मों के इस दिग्गज अभिनेता ने 3 से ज्यादा दशकों में पचासों किरदारों को परदे पर जीवंत बनाया और कभी किसी दायरे में नहीं बंधे. बुरा से बुरा और अच्छे से अच्छा, हर किरदार उन की अदाकारी में ढल कर शक्ल लेता गया और अमर होता गया. तालियां बजती रहीं, अवार्ड मिलते रहे. हाल के दिनों में तो उन्होंने ऐसी भूमिकाओं के लिए हां कही है जिस के बारे में दूसरे अभिनेता 10 बार सोचेंगे.

नसीर को बुरे चरित्र निभाना मजा देता है और अच्छे चरित्रों को वे बोरिंग मानते हैं. कहते हैं कि मुझे तो बुरे चरित्र निभाना खूब पसंद है. मैं परदे पर अच्छा इंसान नहीं बनना चाहता क्योंकि यह बहुत उबाऊ है. मेरे पसंदीदा किरदार वे हैं जो मैं ने ‘मिर्च मसाला’ और ‘मोहरा’ में निभाए. ये ऐसे चरित्र हैं, जो मुझ से जुड़े और शुरू से ले कर आखिर तक मैं ने खूब मजा उठाया. नसीर और उन की दूसरी पत्नी रत्ना पाठक शाह ने कई सफल फिल्मों और नाटकों का निर्देशन और मंचन किया. आज विश्वस्तर पर हम नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेताओं के दम पर ही भारतीय सिनेमा के विश्वस्तरीय होने का दावा करते हैं.

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