फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली मौडल और अभिनेत्री दीपिका पादुकोण सबसे अधिक चर्चित और लोकप्रिय हैं. उनकी प्रंसशकों की संख्या करोड़ों में है. अभिनेत्री के अलावा वह एक खिलाड़ी भी हैं, इसलिए हमेशा फिट दिखती हैं. फैशन मौडल बनने की इच्छा में उन्होंने खेल से नाता तोड़ लिया और अभिनय की ओर  बढ़ गयीं. वह शांतप्रिय हैं और हमेशा अपने काम और परिवार के ऊपर फोकस्ड रहती हैं. पद्मावती को लेकर काफी विरोध हो रहा है, जिस कारण से फिल्म की रिलीज भी टालनी पड़ी. इससे वह परेशान और दुखी हैं. उनसे मिलकर बात हुई, पेश है अंश.

इस कहानी की कौन सी बात आपको सबसे अधिक अच्छी लगी?

पद्मावती की वीरता मुझे अच्छी लगी, क्योंकि हर एक हिन्दुस्तानी लड़की के अंदर कहीं न कहीं एक पद्मावती छिपी हुई है. कुछ कह पाती हैं कुछ नहीं, लेकिन यह सब में है और यही मेरे लिए प्रेरणा थी. इसमें पद्मावती की वीरता के अलावा, खूबसूरती, कोमलता, नारीवादिता आदि सभी को मैंने पर्दे पर दिखाने की कोशिश की है. उम्मीद है सारी महिलाएं मेरी इस भूमिका से अपने आप को जोड़ पायेंगी.

ऐसी ‘लार्जर देन लाइफ’ फिल्मों को करना कैसा लगता है?

मैं गर्वित महसूस करती हूं. ऐसी फिल्मों में इतने स्तर पर काम करना पड़ता है, जिसे मैंने कभी सोचा नहीं था. यहां मैंने एक महान महिला की भूमिका निभाई है, ये मौका मिलना ही अपने आप में बहुत बड़ी बात है. निर्देशक भंसाली ने मुझे दिया और मेरे लिए यह एक चुनौती है कि मैं इसे उसी रूप में पर्दे पर उतारूं, जैसी वह थीं. मेरे लिए ये किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं.

आपकी पोशाक, गहने और इस लुक को बनाने में किसका हाथ रहा? आपने अपना कितना पुट दिया है?

सही लुक का होना किसी भी भूमिका में खास मायने रखता है. जब हम किसी भी चरित्र को चित्रित करते हैं, तो उसमें अभिनेत्री के तौर पर मैं अच्छा काम कर सकती हूं, इमोशन ला सकती हूं, लेकिन उसे सही तरह से दर्शकों तक पहुंचाने में हेयर, मेकअप, ड्रेस, आभूषण और लुक को बनाने वाले होते हैं. 50 प्रतिशत उनका ही योगदान होता है. सही लुक सही चरित्र को पर्दे पर उतारने में सफल होती है. इसके अलावा सिनेमेटोग्राफर का भी बहुत बड़ा हाथ होता है. क्रेडिट हमेशा एक्टर्स को ही मिलता है, पर पर्दे के पीछे जो काम करते हैं, वह बहुत बड़े होते हैं. उनके बिना मैं कुछ भी नहीं हूं.

पद्मावती की अगर हम बात करें तो रिसर्च मेटेरियल बहुत है, लेकिन तब की तस्वीरें बहुत कम है, उसमें सामंजस्य लाना बहुत जरूरी था. इसलिए लुक को नए सिरे से क्रिएट किया गया, जो बहुत सुंदर बन पड़ा है. वैसे भी पद्मावती अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती थीं. ऐसे में सुन्दरता की परिभाषा जो हमारे दिमाग में है कि सुन्दरता केवल गोरे रंग से ही मिलता है, उसे हमने तोड़कर, अलग तरीके से लुक को क्रिएट किया है जिसे सबने सराहा.

इस फिल्म की ‘कौस्ट्युम’ बहुत भारी थी, इसलिए इसे पहनकर अभिनय करना डांस करना मुश्किल था. खासकर संजय लीला भंसाली जैसे निर्देशक फिल्म में बारीकियों पर अधिक ध्यान देते हैं. इस फिल्म को करने में जितना समय लगा, उस दौरान मुझे बहुत त्याग भी करना पड़ा. जिसमें मुझे परिवार के साथ मिलने का समय नहीं मिलता था, लेकिन इतना मेहनत के बाद जो चीज बनकर सामने आई है, उसे देखकर बहुत अच्छा लगता है.

फिल्म की सबसे कठिन भाग कौन सी थी?

फिल्म का अंतिम भाग एक अभिनेत्री होने के नाते मेरे लिए काफी चुनौतीपूर्ण थी.

नैतिकता पर ‘पोलिसिंग’ के होने को किस हद तक सही मानती हैं?

मेरे हिसाब से जो सही लगता है, उसे हर कोई कह सकता है या अपनी राय दे सकता है. स्वाधीन भारत  में ये अनुमोदन मिलता भी है, पर जिस तरह से लोग उसे एक्सप्रेस कर रहे हैं, उससे मैं सहमत नहीं हूं. हर बार ‘क्रिएटिविटी’ को ‘एटैक’ करना ठीक नहीं. हम हिन्दुस्तानी हैं और इस ऐतिहासिक कहानी को जानते हैं. वे जो चाहते हैं, उसे ही हम सब पूरे विश्व में दिखाना और बताना चाहते हैं कि वह कितनी महान महिला थी. इस क्षण को सभी को सेलीब्रेट करना चाहिए और वह होगा.

आपने बाजीराव मस्तानी और पद्मावती दोनों हो अलग तरह की फिल्में की है, अपने आप को इन फिल्मों की चरित्र से कितना जोड़ पाती हैं?

इन दोनों फिल्मों से मैं अपने आप को जोड़ सकती हूं. खासकर उनकी वीरता उनकी बुद्धिमता और उनकी सोच से मैंने अपने आप को जोड़ा है. इन फिल्मों को बनाना आसान नहीं होता, सालों तक उसी चरित्र में सघनता से अपने आप को बनाए रखना, अपने आप में मेरे लिए एक चुनौती थी. इसके अलावा इन फिल्मों में बहुत बाधाएं आने के बाद भी हम काम करते रहे, जो मुश्किल थी.

सालों से महिलाएं मानसिक अत्याचार सहती आई है और आज भी सह रही है, लेकिन कोई महिला उसका विरोध करती तो उसे बगावती कहकर दबाने की कोशिश की जाती है, इसके जिम्मेदार कौन हैं? समाज, परिवार या धर्म?

बहुत सारे तथ्य इसके जिम्मेदार हैं, लेकिन अब बदलाव भी आ रहा है. महिलाएं अब अपनी आवाज उठा रही हैं और ये सिर्फ भारत में नहीं, हर जगह वे कर रही हैं. मुझे तब अच्छा लगता है, जब कोई अपनी सही बात कहने के लिए आगे बढ़ती है. इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हम खुद हैं, क्योंकि जब तक हम बदलाव नहीं चाहते, कोई और इसे बदल नहीं सकता.

आप अपने मानसिक स्वास्थ्य का खयाल कैसे रखती हैं? अपनी संस्था के बारें में बताएं.

मैं मानसिक स्वास्थ्य के लिए अपने मनोवैज्ञानिक डाक्टर के पास जाती हूं. जैसे हम शारीरिक व्यायाम को महत्व देते हैं, वैसे ही हमें मानसिक स्वास्थ्य की भी देख-भाल करनी चाहिए. शरीर फिट होने के साथ साथ मानसिक स्वास्थ्य भी फिट होना जरूरी है, ताकि काम बेहतर हो. मैं इस बात से नहीं शर्माती और डाक्टर के पास जाती हूं. मैं सबसे कहना चाहती हूं कि किसी को भी अपनी बात डाक्टर को कहने से घबराना नहीं चाहिए.

तीन साल पहले जब मैं मानसिक अस्वस्थता से गुजर रही थी, तो मैंने लिव, लव, लाफ संस्था की स्थापना की थी, मैंने अपनी स्टोरी सब के साथ शेयर किया था. मैं चाहती थी कि सभी अपनी समस्याओं को पहचानें. मैं इसे स्कूल में भी ले गयी, अध्यापिकाओं को इसका प्रशिक्षण दिया. कैसे ये काम कर रही है उसके बारें में जायजा भी ये संस्था लेती है. इससे मुझे बहुत बदलाव दिखा है. मेरे साथ में कई मनोचिकित्सक भी पैनल में हैं. मानसिक स्वास्थ्य की अगर बात करें तो अधिकतर देखा गया है कि लोग अपनी समस्या ही समझ नहीं पाते, जिससे उन्हें उससे निकालना या बचाना मुश्किल हो जाता है. मैंने कई कैम्पेन भी किया है. गांव और कार्पोरेट के लिए भी मैं काम कर रही हूं.