औनलाइन ‘फेक आई डी’ बनाकर डेट करने और उसमें की गई नासमझी को दिखाती फिल्म ‘करीब करीब सिंगल’ एक मनोरंजक फिल्म है. इसे निर्देशक तनुजा चंद्रा ने बहुत ही मजेदार तरीके से पेश किया है. खासकर कवि योगी की भूमिका में इरफान खान का अभिनय बहुत ही मजेदार है. ये फिल्म तनुजा चंद्रा की अबतक की फिल्म से हटकर है.

तनुजा ने इस फिल्म पर मेहनत तो की है, जिसका प्रभाव इंटरवल तक दिखा, बाद में फिल्म की रफ्तार कुछ धीमी रही. फिल्म की लोकेशन दिल्ली, अलवर, ऋषिकेश और गंगटोक है, जो अच्छी रही. फिल्म में दक्षिण भारतीय चर्चित अभिनेत्री पार्वथी की भूमिका कुछ हद तक ठीक रही, लेकिन पूरी फिल्म इरफान के कंधे पर थी, जिसे इरफान ने बखूबी निभाया.

कहानी

जया (पार्वथी) एक विधवा है, जिसकी उम्र 35 साल है, उसका स्वभाव बाकी महिलाओं से अलग है. वह इंश्योरेंस पालिसी बेचने का काम करती है और आस-पास के किसी की भी जरूरतों में उसका साथ देती है. सिंगल जया को उसकी सहेली जिंदगी में कुछ रंग भरने को कहती है. जया को ये बात सही लगती है और वह अपना ‘फेक आई डी’ बनाकर किसी साथी की तलाश करने लगती है. ऐसे में योगी (इरफान खान) उसे मिलता है. जो मनमौजी है और अपनी दुनिया में खुश रहने वाला है.

ये बातें जया को अजीब तो लगती है, लेकिन उसके साथ वह कहीं आने-जाने से मना नहीं कर पाती. योगी बात-बात में अपने पुरानी तीन प्रेमिकाओं के बारे में जया को बताता है और उन सबसे मिलने के लिए जया को आमंत्रित भी करता है. जया उसके साथ जाने को तैयार हो जाती है. योगी उस वक्त हैरान रह जाता है, जब ऋषिकेश में उसकी पहली प्रेमिका का पति उसे साला और उसके बच्चे उसे मामा कहकर पुकारते है. यहीं से जया और योगी की जर्नी फ्लाइट, कार, ट्रेन से शुरू होकर कई परिस्थितियों से टकराकर अंजाम तक पहुंचती है.

कहानी में कुछ बातें अधूरी रही, जिसे निर्देशक कहने में असमर्थ रही. मसलन योगी का स्वभाव ऐसा क्यों है? उसके पास इतने पैसे आये कहां से हैं, जिसे वह खर्च करता था? उसने तीन प्रेमिकाओं को छोड़ा क्यों है? फिल्म में गाना ‘जाने दो’ और ‘खत्म कहानी’ परिवेश के अनुरूप है. बहरहाल फिल्म एक बार देखने लायक है. इसे टू एंड हाफ स्टार दिया जा सकता है.