गृहशोभा विशेष

इतिहास के पन्नों को सिनेमा के परदे पर उतारना आसान नहीं होता है. मगर ब्रिटिश फिल्मकार स्टीफन फ्रेअर्स की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने इतिहास के एक अध्याय को बहुत बेहतर तरीके से सिनेमा के परदे पर उतारा है. कहानी 1887 से 1909 के बीच की है, जब ब्रिटिशों का भारत में शासन था.

फिल्म की कहानी भारत में आगरा से शुरू होती है. आगरा में रहने वाला एक मुस्लिम युवक अब्दुल करीम (अली फजल) ब्रिटिश शासन में आगरा की जेल में कैदियों का रजिस्टर में नाम लिखने का काम करता है. उसके काम से प्रभावित होकर लंदन में ब्रिटिश रानी विक्टोरिया (जूडी डेंच) को मोहर देने के काम के लिए भेजा जाता है. वहां अब्दुल मोहर देने के बाद रानी से कहता है, ‘‘जिंदगी कारपेट की तरह है. हम भारत में इसे बुनकर एक नया पैटर्न देते हैं.’’ इससे रानी, अब्दुल से प्रभावित होकर अपना निजी सहायक बना लेती है, फिर उसे अपना मुंशी बनाकर उससे उर्दू सीखने लगती है. इससे पूरा बैकिंघम पैलेस नाराज हो जाता है. सभी लोग अब्दुल के खिलाफ साजिश रचना शुरू करते हैं. जबकि रानी, अब्दुल की बात से प्रभावित होकर बैकिंघम पैलेस के ही अंदर एक भारतीय दरबार हाल बनवाती है. अब्दुल करीम को भारत भेजकर उसके परिवार को वहां रहने के लिए बुलाती है.

कहानी में कुछ उतार चढ़ाव भी आते हैं. एक बार रानी, अब्दुल से लंदन छोड़ने के लिए कह देती है, पैलेस के लोग खुश होते हैं, पर फिर रानी, अब्दुल को रोक लेती है. अपने बीमार होने और जीवन के अंतिम पलों में यहां तक की अब्दुल को बगल में खड़ा कर ही विक्टोरिया इस संसार से विदा लेती है. 1904 मे विक्टोरिया की मौत के साथ ही अब्दुल को लंदन से आगरा, भारत वापस आना पड़ता है ओर 1909 में अब्दुल की आगरा में मौत होती है.

फिल्म में इस बात का बेहतर तरीके से रेखांकन किया गया है कि उस वक्त विक्टोरिया रंगभेद से दूर थी. पटकथा लेखक ली हाल्स ने सत्य कथा को अच्छे ढंग से ड्रामा के रूप में पेश किया है. फिल्म में नाटकीय घटनाक्रमों के बीच कुछ हास्य के दृष्य भी पिरोए गए हैं. पर सत्य घटनाक्रमों को कहानी में ज्यादा महत्व दिया गया है, जो कि दर्शक को काफी कुछ सोचने पर मजबूर करता है. 1887 से 1904 के माहौल का फिल्म में सही ढंग से चित्रण है पर निर्देशक के तौर पर कुछ जगह स्टीफन फ्रेअर्स मात खा गए हैं. जहां तक गीत संगीत का मसला है, तो कुछ भी नया नहीं है.

अभिनेत्री जुडी डेंच महान अदाकारा हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है. इस फिल्म में विक्टोरिया के किरदार को निभाते हुए उन्होंने जबरदस्त परफार्मेंस दी है. जिस तरह से भावनात्मक अभिनय किया है, उसे देखकर दर्शक बार बार उन्हें देखने की प्यास लिए ही सिनेमा घर से बाहर निकलते हैं. अब्दुल के किरदार में बड़ा भावुक अभिनय अली फजल ने किया है. फिल्म के कई दृश्यों में सिर्फ जूडी डेंच और अली फजल होते हैं और हर दृश्य में कमाल का अभिनय अली फजल ने किया है. वह एक भी दृश्य में जूडी डेंच के सामने कमजोर नहीं पड़ते हैं. अदील अख्तर ने भी अपनी उपस्थिति अच्छे ढंग से दर्ज करायी है.

एक घंटे 52 मिनट की फिल्म ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ का निर्माण बीबीसी, ‘वर्किंग टाइटल फिल्मस’ और युनिवर्सल कंपनी ने किया है. फिल्म के निर्माता हैं बीबन क्रिडन, एरिक फेलनर, टिम बिवान और टै्सी सीर्वाड. फिल्म की कहानी श्राबनी बसु के उपन्यास ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ पर आधारित है. पटकथा लेखक ली हाल, संगीतकार थौमस न्यूमन, कैमरामैन डैनी कोहेन हैं तथा कलाकार हैं- जूडी डेंच, अली फजल, अदील अख्तर, एड्डी इजार्ड, टिम पिगौट स्मिथ, सिमौन कौलौ, मिचैल गैम्बोन, जुलियन वधम, जोनाथन हार्डेन और अन्य.

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