गृहशोभा विशेष

फिल्म ‘हीरोपंती’ से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने वाली अभिनेत्री कृति सेनन ने तेलगू फिल्म से अभिनय शुरू किया था. बचपन से ही एक्टिंग के क्षेत्र में आने की इच्छा रखने वाली कृति एक मॉडल भी हैं, उनकी छरहरी काया और ऊंची कद काठी ही उन्हें इस ओर ले आई. हालांकि कृति ने अधिक फिल्में नहीं की है, पर वह फिल्मों का चयन करते वक्त उसकी कहानी और अपनी भूमिका पर खास ध्यान देती हैं.

हमेशा सकारात्मक सोच रखने वाली कृति की फिल्म ‘राब्ता’ रिलीज पर है, जिसमें उन्होंनें बहुत ही अलग भूमिका निभाई है, ये फिल्म उनके लिए एक चुनौती थी. उनसे बात करना रोचक था, पेश है कुछ अंश.

‘दिलवाले’ फिल्म की सफलता का फायदा आपको कितना मिल रहा है?

फिल्म बड़ी थी और फायदा से भी अधिक उस फिल्म में मुझे इतनी जल्दी बड़े कलाकार के साथ काम करने का मौका मिला. मैंने बचपन से काजोल और शाहरुख की फिल्में देखी हैं, मेरे लिए तो ये सपना ही था. दूसरी फिल्म में इतने बड़े बैनर में निर्देशक रोहित शेट्टी के साथ काम करना भी मेरे लिए बड़ी बात थी. मेरा अनुभव उस फिल्म में काम करने का एक परिवार की तरह था. लगता ही नहीं था कि मैं शूट कर रही हूं.

‘दिलवाले’ रिलीज से पहले मैंने केवल एक फिल्म ‘हीरोपंती’ की थी, जिसमें टाइगर श्रॉफ और मैं दोनों ही नए थें, ऐसे में हमारे दर्शकों की संख्या सीमित थी. दिलवाले फिल्म के बाद मुझे देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गयी है. फिल्मी बैकग्राउंड से नहीं होने पर आम जनता आपको जाने, आपके काम को जाने ये बहुत जरुरी है, जिसके बल पर आपको आगे काम मिलता है.

क्या किसी नए कलाकार का किसी बड़े व्यक्ति की सरनेम से जुड़े होने पर फायदा अधिक होता है?

भाई-भतीजावाद हर इंडस्ट्री में होता है. अगर मैं इसे ना बोलू तो मैं अंधी हूं. किसी व्यवसाय में हो या फिल्म इंडस्ट्री में ये तो चलता ही रहता है. जो बच्चे इंडस्ट्री में बड़े हुए है, उन्हें हर कोई जानता है. उन्हें अपनी इमेज क्रिएट नहीं करनी पड़ती. ऐसे में अगर कोई निर्देशक नयी फिल्म बनाता है, तो उसे सबसे पहले सामने वाला व्यक्ति ही नजर आता है. तीन-चार फिल्मों में उन्हें अवसर मिलता है और अगर वे उसमें सफल नहीं होते हैं तो वे आगे नहीं जा पाते. आसानी से फिल्मों में आने का अवसर तो ऐसे बच्चों को मिलता है पर बाद में प्रतिभा की जरुरत पड़ती है.

’राब्ता’ फिल्म की चुनौती क्या थी?

पिछले दोनों फिल्मों में मेरी भूमिका हल्की-फुल्की गर्लिश थी. उसमें भी मुझे मेहनत करनी पड़ी थी, लेकिन इसमें मेरी भूमिका मुझसे काफी अलग है, इसलिए अभिनय करने में मजा आया. इसमें मुझे दो अलग-अलग भूमिका में काम करने का अवसर मिला, जो बहुत चुनौतीपूर्ण था. इसमें जो अलग टाइम जोन को दिखाया गया है, उसकी कोई जानकारी मेरे पास नहीं थी. उसे समझना, मेकअप लेना और एक साथ काम करना आसान नहीं था. मैंने इस फिल्म के लिए मार्शल आर्ट और हॉर्स राइडिंग सीखा है.

आप फिल्मों को चुनते समय किस बात का ध्यान रखती हैं?

मैं जब भी स्क्रिप्ट पढ़ती हूं, तो उसे फील करना चाहती हूं. मैं एक दर्शक को अपने दिमाग में रखती हूं. अगर फिल्म मुझे पसंद आयेगी, तो दर्शकों को भी अवश्य आएगी. किसी भी प्रोजेक्ट को करने में तीन महीने देने पड़ते हैं, ऐसे में स्क्रिप्ट मजेदार होना जरुरी है. ताकि हर रोज जब मैं नींद से उठूं तो मेरे अंदर काम करने की उत्साह बनी रहे. इसके बाद मेरा चरित्र फिल्म में कितना प्रभावशाली है उसे देखती हूं. फिल्म करते-करते आपकी सोच बदलती रहती है. ऐसे में फिल्मों का सही चयन करना आसान होता है.

फिल्म प्रमोशन कितना जरुरी है?

फिल्मों का प्रमोशन जरुरी है लेकिन उसमें कई बार इतने अजीब लिख दिए जाते हैं, जिसे पढकर मैं खुद ताज्जुब हो जाती हूं कि ये कैसे लिखा गया है. पकाई हुई न्यूज मुझे कभी पसंद नहीं. फिल्म अगर सही बनी हो, तो दर्शकों को अच्छी लगेगी. सही तरह फिल्म का लिखा जाना और सही तरह से शूटिंग का होना बहुत जरुरी है. सही फिल्म न होने पर कितना भी प्रमोशन आप कर लें फिल्म नहीं चलेगी.

आपको और सुशांत को लेकर जो खबरें आ रही हैं, उसमें कितनी सच्चाई है?

उसमें कुछ भी सच्चाई नहीं है. थोड़े समय बाद तो हम दोनों ऐसी कहानियों को देखकर मजे लेने लगे थें. हम काम के दौरान आपस में झगड़ते हैं, फिर मिल जाते हैं. इस तरह काम में एक उत्सुकता बनी रहती है. मुझे तो ऐसी खबरें पढ़कर ऐसा लग रहा था कि लिखने वाला मेरे साथ रहकर लिख रहा है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था. ऐसी मनगढ़ंत कहानी लिखने वाले की तारीफ करनी पड़ेगी.

सुशांत के साथ काम करने का अनुभव कैसा था?

वे एक अच्छे कलाकार हैं और उनके साथ काम करना आसान था. वे एक मेहनती कलाकार हैं और हर भूमिका की डिटेल में जाकर अभिनय करते हैं.

आपने कई लव स्टोरी वाली फिल्में की है, क्या किसी लव स्टोरी से आप खुद प्रेरित हैं? आज की पीढ़ी के लिए लव अलग है, क्या कहना चाहेंगी?

आजकल लव के मायने बदल चुके हैं. ऐसे में जब मैं किसी फ्रेंड की 11 साल की डेटिंग के बाद शादी को सुनती हूं, तो बहुत अच्छा लगता है. इसके अलावा जब कोई बुजुर्ग दम्पति जो हाथ में हाथ डाले किसी स्थान पर बैठे हुए होते हैं या एक दूसरे को सड़क पार करवा रहे होते हैं, तो मैं बहुत प्रभावित होती हूं, क्योंकि उम्र के उस पड़ाव में भी वे एक दूसरे के लिए होते हैं.

आजकल यूथ इतने व्यस्त और आत्मनिर्भर हैं कि उनके पास ठहराव की कमी है. ऐसे में वे प्यार और रिश्ते की गहराई को कम समझ पा रहे हैं. वे किसी भी रिश्ते से निकलने में घबराते नहीं. मेरे लिए किसी भी रश्ते में ठहराव और इमानदारी काफी मायने रखती है. समस्या है तो उसे मिलकर सुलझा लें और अगर नहीं सुलझता है तो उससे निकल जाना ही बेहतर होता है. पहले लोग रिश्ते में दुखी होकर भी उसे निभाना पसंद करते थें. मेरे हिसाब से लाइफ एक है और अगर किसी से आप नाखुश हैं, तो उससे निकलने में कोई बुराई नहीं है.

आपके यहां तक पहुंचने में परिवार का सहयोग कितना है?

मेरे परिवार ने बहुत ही सहयोग दिया है, क्योंकि मैं एक उच्च शिक्षित परिवार से हूं. मेरे पिता चार्टेड अकाउंटेंट हैं, मेरी मां लेक्चरर हैं और मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी. इसके बाद काम भी मिला, लेकिन मुझे करना नहीं था, क्योंकि मुझे मुंबई आना था. खासकर मध्यम वर्गीय परिवार में लड़कियों को कोई दूर, फिल्म इंडस्ट्री में भेजने से डरते हैं. ऐसे में उन्होंने मुझपर भरोसा किया, यहां आने दिया, ताकि मुझे कभी अपने ऊपर पछतावा न हो.

आप इस लेख को सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं