गृहशोभा विशेष

लंबा कद, मजबूत कदकाठी, बेहद दमदार आवाज और जबरदस्त संवाद अदायगी जैसी खूबियों के मालिक अमरीश पुरी अपने बड़े भाई मदन पुरी का अनुसरण करते हुए फिल्मों में काम करने मुंबई पहुंचे थे. लेकिन पहले ही स्क्रीन टैस्ट में विफल रहे तो भारतीय जीवन बीमा निगम में नौकरी कर ली. बीमा कंपनी में नौकरी के साथ ही वे नाटककार सत्यदेव दुबे के लिखे नाटकों पर पृथ्वी थिएटर में काम करने लगे. 1971 में उन्हें पहली फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ मिली, लेकिन उस के द्वारा वे कोई खास जगह नहीं बना पाए. लेकिन मशहूर बैनर बौंबे टाकीज में कदम रखने के बाद उन्हें बड़ेबड़े बैनर की फिल्में मिलनी शुरू हो गईं. अमरीश पुरी ने वैसे खलनायकी को ही अपना कैरियर का आधार बनाया. लेकिन उन की फिल्मों में श्याम बेनेगल की कलात्मक फिल्में ‘निशांत’ (1975), ‘मंथन’ (1976), ‘भूमिका’ (1977), ‘कलयुग’ (1980) और ‘मंडी’ (1983) आदि भी सुपरहिट रहीं. जिन में उन्होंने नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल और शबाना आजमी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम किया और अपनी अदाकारी का जौहर दिखा कर अपना सिक्का जमाने में कामयाब हुए.

इसी दौरान उन्होंने अपना कभी नहीं भुलाया जा सकने वाला किरदार गोविंद निहलानी की 1983 में प्रदर्शित फिल्म ‘अर्द्धसत्य’ में निभाया. इस फिल्म में उन के साथ ओम पुरी भी थे. अमरीश के कैरियर में धमाका 1987 में आई फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ के मोगैंबो से हुआ. उन की पंच लाइन ‘मोगैंबो खुश हुआ’ दर्शक दोहराने लगे. मोगैंबो का किरदार विशेष रूप से डाइरैक्टर शेखर कपूर ने तैयार किया था. लेकिन किरदार को न भूलने वाली ऐक्टिंग अमरीश पुरी ने की थी. कुछ फिल्मों में अमरीश को पौजिटिव रोल करने के मौके भी मिले. प्रियदर्शन की फिल्म ‘मुसकराहट’ में एक झक्की जज के रोल को उन्होंने कुछ इस अंदाज में जिया कि पूरी फिल्म में दर्शक मुसकराते रहे. राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘घातक’ में भी बीमार पिता का रोल उन्होंने बखूबी निभाया. फिल्म ‘फूल और कांटे’, ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे’, ‘राम लखन’, ‘सौदागर’, ‘करण अर्जुन’, ‘घायल’, ‘गदर’, ‘दामिनी’ जैसी कई फिल्मों में उन की मुद्राएं, संवाद बोलने का अंदाज और बौडी लैंग्वेज देखने लायक है. 12 जनवरी, 2005 को कैंसर से उन का निधन हुआ. उन के गुजरने के बाद बौलीवुड को उन के जैसा दमदार खलनायक अभी तक नहीं मिल पाया है.

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