हिंदी, बंगला, मराठी व अंग्रेजी फिल्मों के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाटक ‘‘निर्भया’’ के हजारों शो कर चुकी अभिनेत्री प्रियंका बोस हमेशा सामाजिक मुद्दों को उकेरने वाली फिल्मों में ही अभिनय करती हैं. फिर चाहे वह नारी प्रधान फिल्म ‘गणगोर’ हो या महिला तस्करी पर ‘सोल्ड’ हो या ‘चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज पर बनी फिल्में हो या गैंग रेप पर नाटक ‘निर्भया’ हो अथवा सिंगल पैरेंटिंग पर आधारित उनकी ताजातरीन फिल्म ‘‘लायन’’ हो.

ऑस्ट्रेलियन निर्देशक गाथ्र की फिल्म ‘‘लायन’’ में प्रियंका बोस ने एक ऐसी भारतीय गांव की औरत का किरदार निभाया है, जिसका आठ साल का बेटा सरू खो जाता है, पर अंततः 21 साल के बाद वह महिला अपने बेटे सरू से मिलती है, जो कि अब ऑस्ट्रेलिया में रह रहा है. फिल्म ‘‘लायन’’ को ऑस्कर अवार्ड के लिए छह कटेगरी में नोमीनेट किया गया है. 26 फरवरी को खुद प्रियंका बोस ‘ऑस्कर अवार्ड’ समारोह में रेड कार्पेट पर फिल्म के अन्य कलाकारों व निर्देशक गार्थ के साथ चलने वाली हैं.

प्रियंका बोस ‘‘लायन’’ की वजह से मिल रही शोहरत से काफी उत्साहित हैं. मगर उन्हें अफसोस है कि भारतीय कलाकार अपने ओहदे का उपयोग सामाजिक मुद्दों के संदर्भ में नहीं करते हैं. एक खास मुलाकात के दौरान प्रियंका बसु ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका से बात करते हुए कहा, ‘‘औरतों के साथ जो कुछ गलत हो रहा है, उस पर हम बहुत विचार करते हैं. विचार करते करते थक जाते हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि हमारे स्टार कलाकार कब तक गोरेपन की क्रीम का विज्ञापन करते रहेंगे. एक ओहदे में आ गए हैं, तो उन्हें इस तरह के मुद्दों पर काम करना चाहिए. कैलाश सत्यार्थी को देखिए, वह क्या काम कर रहे हैं. कैलाश सत्यार्थी के लिए मैं तीन फिल्मों का निर्माण कर चुकी हूं. यह तीनों फिल्में चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज पर है. मैं इसे बहुत महत्वपूर्ण मानती हूं. मुझे लगता है कि मैं इस ओहदे पर पहुंच चुकी हूं कि समाज में व्याप्त इन बुराईयों व अपराधों के खिलाफ मुझे मुखर होना चाहिए. इसीलिए सिनेमा बना रही हूं. सिनेमा की अपनी ताकत है. ऐसी चीजें दर्षकों तक पहुंचनी चाहिए. चाइल्डसेक्सुअल एब्यूज की आवाज हर किसी के कानों में पहुंचनी चाहिए. अन्याय होता है. जरूरत है कि लोग अपना नजरिया बदले. हमारे देश के कलाकारों को भी इस दिशा में काम करना चाहिए. मैं सभी खान कलाकारों से निवेदन करना चाहूंगी कि वह समाज के इस तरह के मुद्दों पर काम करें. विदेषों में रॉबर्ट डिनेरो हों या मार्क अपोलो हों, यह सभी सामाजिक मुद्दों को लेकर काम करते रहते हैं.’’

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