स्वतंत्रा सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर आधारित वेब सीरीज ‘बोस डेड और अलाइव’ में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेता राजकुमार राव हुबहू सुभाषचंद्र की तरह दिखे. उसमें उनके अभिनय की जितनी भी तारीफ की जाये वह कम होगी. उन्होंने उनके किरदार को बड़ी ही सहजता से निभाया है. इस किरदार को निभाने के लिए राजकुमार राव ने कड़ी मेहनत की है. उन्होंने फिल्म ‘ट्रैप्ड’ के लिए अपना वजन करीब 11 किलो तक कम किया था. वहीं इस फिल्म के लिए उन्होंने अपना वजन बढाया है. इतना ही नहीं नेताजी की लुक के लिए वे आधे गंजे भी हुए.

एकता कपूर के बालाजी प्रोडक्शन्स के डिजिटल चैनल आल्ट बालाजी के अंतर्गत निर्देशक पुलकित ने बहुत ही अच्छी तरह से इसे पेश किया है. 9 एपीसोड में बनी इस वेब सीरीज में नेताजी के मृत होने या जिन्दा होने जैसी अनसुलझे पहलुओं पर रोचक तरीके से रोशनी डालने की कोशिश की गयी है. अनुज धर की लिखी किताब ‘द बिगेस्ट कवर अप’ पर आधारित इस सीरीज में लेखक रेशु नाथ की भी तारीफ करनी होगी, जिसने बहुत बारीकी से हर पहलुओं को विस्तार पूर्वक लिखा है, जिससे ये वेब सीरीज रोचक बन पड़ी है. नंदिनी (पत्रलेखा) ने लेडी लव और बंगाली बाला के रूप में काफी अच्छा अभिनय किया है.

वेब सीरिज की शुरुआत एक प्लेन क्रैश से होती है, जिसमें नेताजी (राजकुमार राव) को कुछ लोग मृत तो कुछ जीवित समझते हैं. उनकी 14 साल से 41 साल तक की जर्नी, जो अजीब तरीके से खत्म हो जाती है और जिसे कोई सिद्ध नहीं कर पाता कि आखिर प्लेन क्रैश में उनकी मृत्यु हुई थी या नहीं, क्योंकि कुछ मानते है कि सुभाषचंद्र बोस उस प्लेन में थे ही नहीं जबकि कुछ मानते हैं कि वे प्लेन में सवार हुए थे. ऐसे में अगर वे उसमें थे ही नहीं, तो गए कहां? पूरी दुनिया जब उन्हें मृत घोषित कर शांत है, एक ब्रिटिश अधिकारी स्टेनली और उनकी जर्मन पत्नी एमिली को उसके मौत पर विश्वास नहीं हो रहा है और वे उसकी आवाज सुनने को आतुर हैं. ऐसे ही कई घटनाओं को दिखाकर कहानी को अंजाम तक पहुंचाया गया है.

इसके अलावा इसमें एक 14 साल का बच्चा जो आजादी पाने की चाहत में अपना घर छोड़ किन-किन हालात से गुजरता है उसे बहुत ही अच्छी तरह से वर्णन किया गया है. कहानी में आजादी के पहले की परिप्रेक्ष्य को अच्छी तरह से दिखाया गया है, लेकिन कहानी के संवाद थोड़े कमजोर हैं और यह चरित्र प्रधान न होकर परिस्थिति के अनुसार है जो कई बार सही नहीं लग रही थी. इसका संगीत ‘बोस…बोस…बोस…’ प्रभावशाली है. सीरीज देखने लायक है. इसे थ्री एंड हाफ स्टार दिया जा सकता है.