गृहशोभा विशेष

महज 4 साल की छोटी उम्र में मराठी फिल्म ‘हा माझा मार्ग एकला’ में बाल कलाकार के रूप में काम कर राष्ट्रपति पुरस्कार जीतने वाले अभिनेता सचिन पिलगांवकर ने मराठी और हिंदी फिल्मों के अलावा भोजपुरी फिल्मों में भी काम किया है.

हिंदी फिल्म ‘बालिका वधू’ उन की चर्चित फिल्म है, लेकिन जीवन का टर्निंग पौइंट उन की फिल्म ‘गीत गाता चल’ थी. इस फिल्म में उन की और सारिका की जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया. फलस्वरूप ‘अंखियों के झरोखों से’ फिल्म बनी. फिल्म ‘नदिया के पार’ सचिन की सब से बड़ी हिट फिल्म थी. अभिनेत्री साधना सिंह के साथ उन की यह फिल्म सुपरडुपर हिट हुई. यही वजह थी कि राजश्री प्रोडक्शन वालों ने दोबारा उस फिल्म को 1994 में सलमान खान और माधुरी दीक्षित के साथ ‘हम आप के हैं कौन’ नाम से बनाया और एक बार फिर वह कामयाब रही.

अभिनय के साथसाथ सचिन ने मराठी और हिंदी फिल्मों के लिए निर्माता और निर्देशक का काम भी किया है. इतना ही नहीं, उन्होंने सिंगिंग और कौमेडी शो भी किए हैं. सचिन हर काम को चुनौती मानते हैं. उन के कामयाब फिल्मी सफर के साथसाथ उन का पारिवारिक जीवन भी बेहद सुखद है.

सचिन और सुप्रिया एक मराठी फिल्म के दौरान मिले, प्यार हुआ और फिर शादी कर ली. दोनों की एक बेटी श्रेया पिलगांवकार है, जो अभिनेत्री है. शांत और हंसमुख स्वभाव के सचिन से बात करना रोचक रहा. पेश हैं, कुछ अंश.

वैब सीरीज में काम करने की इच्छा कैसे पैदा हुई?

वैब सीरीज भविष्य की एक बहुत बड़ी मांग है. जब मैं ने पहली बार 8-10 साल पहले सुना था तो महसूस हुआ कि यह भी औडियो विजुअल माध्यम है. यह भी किसी कहानी को कह सकता है, लेकिन इस की तकनीक अलग है. मुझे हर बदलाव को अपनाने में खुशी मिलती है. यही वजह है कि मैं ने 1995 में सब से पहले टीवी को अपनाया था. उस समय सैटेलाइट टीवी एक नई बात थी.

वैब सीरीज को भी मैं ने उसी तरह से अपनाया है. इस में अच्छी बात यह रही कि सैक्स से जुड़ी जिन बातों को समाज और परिवार कहने से कतराता है और चोरीछिपे उस बारे में बातें करता है, उसे मैं ने सामने आ कर एक सीरीज के रूप में दिखाया. इसे व्यक्ति किसी भी फोन या लैपटौप पर किसी भी समय जब चाहे देख सकता है. उसे एक आजादी मिलती है.

वैब सीरीज को करने के बाद मुझे बहुत खुशी मिली. मैं मनोरंजन के क्षेत्र से हूं और कोई काम जिस में कोई मैसेज हो तो मैं उसे तुरंत हां कर देता हूं.

बचपन से ले कर अब तक के फिल्मी कैरियर को कैसे देखते हैं?

मैं इस कामयाबी को बहुत अधिक नहीं समझता. मैं तो अभी भी खुद को 18 वर्ष का ही समझता हूं. कभीकभार बचकानी हरकतें भी कर लेता हूं. मैं ने अपनेआप को हमेशा टीनएजर ही समझा है. इसीलिए किसी भी नई चीज को करने में उत्साह महसूस करता हूं.

मैं अपनेआप को कभी लीजेंड नहीं समझता और क्या अच्छा कर सकता हूं उस के बारे में सोचता हूं. यही वजह है कि मेरी यह लंबी पारी चल रही है. जब मैं 50 साल का हुआ था तब मैं ने एक जगह कहा था कि अब मुझे लगने लगा है कि मेरी जर्नी अब शुरू हुई है. इस की वजह यह है कि अब वही करना है, जिसे अब तक नहीं किया है. मेरे लिए, आप ने कितने साल इंडस्ट्री में गुजारे, इस से अधिक किया क्या, वह अधिक महत्त्व रखता है.

लोगों का मानना है कि सैक्स वैब सीरीज या सैक्स ऐजुकेशन से समाज और परिवार बिगड़ता है, महिलाओं पर अत्याचार बढ़ता है. इस बारे में आप की क्या राय है?

जहां भी किसी बात की पाबंदी होती है, वहां लोग उसे सब से अधिक करते हैं. जिस प्रदेश में शराब पर रोक है, वहां सब से अधिक शराब की बोतलें बेची और खरीदी जाती हैं. लोग अधिक पैसे दे कर कहीं न कहीं से खरीदते हैं. जहां पर पाबंदी नहीं, वहां चोरी का धंधा नहीं है. वैसे ही सैक्स ऐजुकेशन एक ऐसी चीज है, जिस की जानकारी सब को होनी चाहिए.

मैं जब 6 साल का था तब मेरे पिता ने मुझे सैक्स के बारे में बताया था. 13 साल की उम्र में उन्होंने फिर से मुझे अच्छी तरह समझाया. 13 साल की उम्र में मैं और अधिक समझ सकता हूं. इसलिए उस हिसाब से समझाया. मेरी बेटी को मेरी पत्नी ने समझाया. हम दोनों आज भी अपनी 26 साल की बेटी के साथ बैठ कर बहुत सारे मुद्दों पर चर्चा करते हैं. हमारे आसपास कई ऐसे पुरुष हैं, जो हर दिन अपनी पत्नी का रेप करते हैं. उन पत्नियों को पता नहीं होता कि सैक्स और रेप में अंतर क्या है.

इसलिए सैक्स ऐजुकेशन केवल बच्चों में ही जरूरी नहीं, बल्कि महिलाओं में भी ऐसी जागरूकता होनी चाहिए. यह एक टैबू है, जिसे महिलाएं सामने आ कर बताना नहीं चाहतीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि पति उन का भरणपोषण कर रहा है और वह कुछ भी करने का हक रखता है, जो गलत है.

आप सोशल मीडिया पर कितने ऐक्टिव हैं और क्या बच्चों पर इस का गलत असर पड़ता है?

मैं अधिक ऐक्टिव नहीं, केवल फेसबुक पर जुड़ा हूं, ट्विटर पर नहीं हूं, क्योंकि उस में हर दिन कुछ पोस्ट करना पड़ता है. मैं मुक्त परिवेश में रहना पसंद करता हूं. मैं अपनी मां, पत्नी और बेटी को भी स्पेस देता हूं. मैं किसी पर अपनी कोई बात नहीं थोपता और कोई मुझ पर अपनी बात थोपे उसे भी नापसंद करता हूं.

मेरे हिसाब से जो भी नई चीज आती है, उस का कुछ सही और कुछ गलत परिणाम होता है. उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता. मातापिता को नजर रखनी पड़ती है कि बच्चे सोशल मीडिया का गलत प्रयोग न करें.

इंडस्ट्री में इतने सालों तक काम करते हुए आप इंडस्ट्री में कितना बदलाव महसूस करते हैं?

मैं ने हर बदलाव को देखा है और फिर उसी के अनुसार आगे बढ़ने की कोशिश की है. अब फिल्म की कहानी और उस की तकनीक में बदलाव आया है. मैं ने हर कैमरे पर शूट किया है. ‘डेबरी’ नाम का कैमरा जिसे उठाने में 10 लोग लगते थे, उस कैमरे पर मैं ने बचपन में शूट किया. इस के बाद ‘मिचेल’, ‘मिचेल 2’, ‘एरी’ कैमरे के सारे वर्जन आए. इस तरह करतेकरते डिजिटल कैमरे का युग आ गया. मैं ने हर तरह के बदलाव को नजदीक से देखा है.

आप की फिटनैस का राज क्या है?

मैं खुद से बहुत प्यार करता हूं. मैं संयम की जिंदगी जीता हूं. खाना सब पसंद है, लेकिन उस में संयम बरतता हूं. 8 घंटे की नींद लेता हूं और हफ्ते में 5 दिन जम कर बैडमिंटन प्रोफैशनल तरीके से कोच के साथ खेलता हूं.

क्या अभी कुछ और मराठी फिल्मों का निर्देशन करने की इच्छा है?

मैं ने अभी तक हिंदी, मराठी और कन्नड़ कुल 21 फिल्मों का निर्देशन किया है. ‘कट्यार कालजात घुसली’ के बाद 2 मराठी फिल्मों ‘वारस’ और ‘जवानी जाने मन’ पर काम चल रहा है. कुछ नई कहानियां भी सुन रहा हूं. हिंदी फिल्मों में भी अभिनय करने की इच्छा है.

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