दक्षिण भारत के तेलगू भाषी नेवल ऑफिसर व रक्षा विशेषज्ञ उदय भास्कर और ईरा भास्कर की बेटी स्वरा भास्कर की शिक्षा दिक्षा दिल्ली के जे एन यू विश्वविद्यालय में हुई है. उनकी मां ईरा भी ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ दिल्ली में सिनेमा की प्रोफेसर हैं.

‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में एमए करने वाली स्वरा भास्कर एक बेहतरीन अदाकारा हैं. उन्होंने शिक्षा के महत्व पर बात करने वाली फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ में अभिनय कर काफी पुरस्कार बटोरे. अब उनकी नई फिल्म ‘अनारकली ऑफ आरा’ 24 मार्च को प्रदर्शित होने वाली है.

‘निल बटे सन्नाटा’ के प्रदर्शन से पहले जेएनयू में कन्हैया व उमर खालिद का मुद्दा गर्माया था. तब स्वरा भास्कर ने उमर खालिद के पक्ष में खुला पत्र लिखा था. उस वक्त स्वरा भास्कर ने भाजपा सरकार व छात्र संगठन ‘एबीवीपी’ के खिलाफ मोर्चा खोला था. अब जबकि उनकी फिल्म ‘अनारकली ऑफ आरा’ प्रदर्शित हो रही है, तो दिल्ली विश्वविद्यालय फिर से सूखिर्यों में है.

एक बार फिर स्वरा भास्कर ने छात्र संगठन ‘एबीवीपी’ के खिलाफ और छात्र संगठन ‘आइसा’ के पक्ष में मुहीम चला रखी है. ‘जे एन यू’ की छात्रा रही स्वरा भास्कर के दिमाग में यह बात बैठी हुई है कि ‘जे एन यू’ से जुड़ा कोई भी शख्स या छात्र गलत बात नहीं कर सकता. वह छात्र संगठन ‘आइसा’ को सबसे ज्यादा इमानदार व संस्कारी मानती हैं. जबकि उनकी नजर में ‘एबीवीपी’ महज गुंडई करता है.

हाल ही में ही हमारी मुलाकात स्वरा भास्कर से हुई.  

शिक्षा की बात करने वाली फिल्म निल बटे सन्नाटा के प्रदर्शन के बाद किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली?

बॉक्स ऑफिस के साथ साथ लोगों की तरफ से भी बहुत अच्छा रिस्पांस मिला. फिल्म हिट रही. फिल्म दस सप्ताह चली, पैसे कमा लिए. छोटी फिल्मों के लिए यह सब बहुत जरुरी है. लोगों ने कल्पना नहीं की थी कि लोगों के घरों में काम करने वाली बाई और शिक्षा को लेकर इस तरह की फिल्म भी बन सकती है. यह मां व बेटी की कहानी लोगों के दिल में बसने के साथ ही एक मिसाल बन गयी है. 

कुछ लोगों ने पत्र लिखकर कहा कि फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ देखने के बाद उनकी बेटी ने इंटरनेट से आई ए एस का फॉर्म निकालकर भरा और परीक्षा की तैयारी कर रही है. इस तरह की कम से कम दो पत्र तो मुझे याद हैं. अभी कुछ दिन पहले मैं दिल्ली हाट बाजार में खरीददारी कर रही थी, तब एक पिता ने अपनी बेटी से मिलवाते हुए बताया कि मेरी फिल्म देखकर उनकी बेटी आई ए एस बनने की लिए पढ़ाई कर रही है. जब हम छोटे थे, तब मेरे घर काम करने आती थीं चंद्रा, अब वह काम नहीं करती है, मैंने दिल्ली में दूसरी महिलाओं के साथ उन्हें भी बुलाकर अपनी यह फिल्म दिखायी. फिल्म देखने के बाद पांच मिनट तक मुझसे चिपककर वह रोयीं. इन दिनों दिल्ली में मेरे घर पर गीता दीदी काम करती हैं, उन्होंने मुझसे कहा कि उन्हें यह बात अच्छी लगी कि हमने उनकी कहानी को फिल्म में दिखाया.

फिल्म निल बटे सन्नाटा शिक्षा और अपने बच्चों को कुछ बनाने के सपनों की बात करती हैं. इन दिनों जो कुछ विश्वविद्यालयों में हो रहा है, क्या उससे लोगों के सपने पूरे होंगे? क्या यही सही शिक्षा है?

मुझे लगता है कि विश्वविद्यालयों में लोगों का आपस में वाद विवाद होना, उनका आपस में राजनीतिक मतभेद होना बुरी बात नहीं है. विश्वविद्यालय इसी के लिए बनती हैं. मगर हिंसा का होना बहुत बुरी बात है. एक खास गुट का दूसरे छात्रों पर अपनी सोच, अपने एजंडे को लागू करना, अपनी फिलोसफी को थोपना ठीक नहीं है. मैं एबीवीपी की बात कर रही हूं. एबीवीपी हमेशा गलत ढंग से लोगों को बरगलाना और धमकाता है. दिल्ली पुलिस का हिंसा की जगह पर मूक दर्शक बने रहना गलत है.

सरकार का इस पर प्रतिक्रिया न देना अथवा जो पिट रहे हैं, उन्हीं पर आरोप लगाना भी गलत है. मैं तो एबीवीपी की किसी भी कही हुई बात पर यकीन नहीं करती. मेरी राय में एबीवीपी के लोग सिर्फ झूठ बोलते हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि जब से इनकी सरकार आयी है, तभी से सारे भारत विरोधी नारे लग गए. इस सरकार से पहले भी वामपंथी, कांग्रेसी,कश्मीरी लोग जेएनयू में पढ़ते रहे हैं.

पर इस सरकार के आते ही भारत के विनाश की योजना बननी शुरू हो गयी. यह तर्कहीन बाते हैं. मैं जेएन यू की छात्रा रही हूं. मैं उनकी हरकतें जानती हूं. इसलिए मुझे एबीवीपी की बातों पर भरोसा नहीं है. उनका सारा काम झूठ पर चलता है. वह छात्रों की राजनीति करते हैं, पर एबीवीपी ने कभी छात्रों के मुद्दे को नहीं उठाया. उन्हें सिर्फं गुंडई, दबंगई व अनावश्यक विवाद फैलाने में ही रूचि रहती है. आप अपने अध्यापकों के साथ सम्मान से पेश नहीं आते हैं. आप अपने गुरू की इज्जत नहीं कर सकते, तो फिर आप क्या लोगों को देशप्रेम सिखाओगे. एबीवीपी के लोग अपने गुरूओं का सम्मान नहीं करते हैं, वह देश का क्या खाक सम्मान करेंगे.

मान लो कि इस तरह के नारे लगे हों, तो उसका मुकाबला तर्क से करें, हिंसा से न करें. यदि वह कुछ बोल रहे हैं,तो उसका मुकाबला आप बोली से करिए,हाथ क्यों उठा रहे हैं?हाथ वही इंसान उठाता है, जिसके पास कोई तर्क न बचा हो. मैं आपसी झगड़े या आत्मरक्षा की बात नहीं कर रही. मैं सामाजिक वाद विवाद की बात कर रही हूं.

सामाजिक वार्तालाप में जो इंसान हिंसा का रास्ता अपनाता है, इसके मायने हैं कि उसके पास तर्क नहीं है. यही हमारे विश्वविद्यालयों में हो रहा है. जिनके पास तर्क खत्म हो चुके हैं, वही हाथ उठा रहे हैं. देखिए,मैं देशभक्त हूं. मुझे मेरे देश से प्यार है. मैं हर नारे का तर्कसंगत जवाब दे सकती हूं. लेकिन मुझे हाथ उठाने की जरुरत नहीं पड़ेगी. मैंने कश्मीरी विद्यार्थियों से ही नहीं बल्कि जो लोग वास्तव में अलगाव वादी हैं, उनसे भी बात की है. उनसे बात करते समय मुझे कभी भी हाथ उठाने की जरुरत नहीं पड़ी, तो फिर आपको हाथ उठाने की जरुरत क्यों पड़ रही हैं.

पर हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज में जो कुछ हुआ, उसमें एबीवीपी और आइसा दोनों ने एक दूसरे पर लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करने को लेकर कई तरह के आरोप लगाए हैं?

मैं एबीवीपी की किसी भी बात पर यकीन नहीं करती हूं. वह जहां भी जाते हैं, मारपीट ही करते हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि जहां जहां भारत के खिलाफ नारे लग रहे हैं, वहां वहां एबीवीपी कैसे पहुंच जाता है. यह आष्चर्य जनक बात है. जहां जहां हिंसा शुरू होती है, वहां भी एबीवीपी पहुंच जाता है. ऐसा कैसे हो जाता है?

आइसा की तरफ से हैदराबाद में कार्यक्रम कराया जाता है, वहां भी एबीवीपी की वजह से पुलिस को हाथ उठाना पड़ा. तो आप देख लीजिए, एबीवीपी का इतिहास है, जहां हिंसा होगी, वहां एबीवीपी होगा. मैं दुःख के साथ कहती हूं कि मेरे मन में एबीवीपी के प्रति सहानुभूति होना दूर की बात है, मैं उन पर विश्वास ही नहीं करती. सबसे बड़ी बात यह है कि एबीवीपी खुद हिंसा शुरू करते हैं और दूसरों पर लड़कियों के साथ छेड़खानी करने व हिंसा करने का आरोप लगा देते हैं.

इंटरनेट पर सत्येन्द्र के वीडियो हैं, यह 2016 का वीडियो हैं, जिसमें वह अपने शिक्षक से बदतमीजी से बात कर रहा है. उसके भाई पर दहेज का आरोप लगा हुआ है. उसकी भाभी ने उसके परिवार पर घरेलू हिंसा का आरोप लगा रखा है. इसलिए मैं इन लोगों पर विश्वास नहीं करती. जब वह कहते हैं कि आइसा के लोगों ने लड़कियों के साथ छेड़खानी की,तो वह साफ झूठ बालते हैं.

मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि किसी भी पक्ष को लड़कियो के साथ छेड़खानी करने की जरूरत क्यों पड़ जाती है?

यह एबीवीपी की मानसिकता है. दो साल में एबीवीपी की तरफ से यह चौथा घटनाक्रम है. इससे पहले दिल्ली में औरतें एक आंदोलन चला रही थीं, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं नुक्कड़ नाटक कर रही थी, उन पर भी एबीवीपी ने ही हमला किया था. हमारे देश में जबसे भारतीय जनता पार्टी की सरकार आयी है, तब से तमाम छोटे छोटे गुट उभरकर आ गए हैं. फिर चाहे वह बजरंगदल हो या गौरक्षक संगठन हो संजय लीला भंसाली की पिटाई करने वाला राजपूत करणी सेना हो.

भाजपा की सरकार बनने से पहले मैंने गौ रक्षक का नाम ही नहीं सुना था. मगर लोगों ने दो साल में ही गायों की सुरक्षा की बात सोचना शुरू किया. अचानक आपको पर्यावरण और जानवरों की सुरक्षा याद आने लगी है. इससे यह साफ जाहिर होता है कि ढाई साल पहले तक जो लोग अपने आपको हाशिए पर पाते थे, उन्हें अब लग रहा है कि हमारी सरकार है, तो हम कुछ भी कर सकते हैं.

आप मेरे सवाल का जवाब नहीं दे रही हैं. मेरा सवाल है कि आइसाछात्र संघठन हो या एबीवीपी’. क्या विश्वविद्यालय के अंदर हिंसा करना या लड़कियों के साथ छेड़खानी करना जायज है?

मैंने कब कहा कि जायज है. अगर दिल्ली पुलिस एबीवीपी के खिलाफ एफआइआर लिखने से मना कर दे तो क्या करें. हो यह रहा है कि जो लोग गुंडागर्दी कर रहे हैं. पर आप उन्हें जाने दे रहे हो. उसके बाद आप लोग गुरमेहर सहित दूसरों मुद्दों पर सोशल मीडिया व टीवी चैनलों पर बहस छेड़ते हैं, जिसका इस घटनाक्रम से कोई लेना देना नहीं है.

मजेदार बात यह है कि बहस में कौन किसका पिता था. किसने क्या किया. जैसी चर्चाएं शुरू कर दी और जिसने गुंदागर्दी की उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की. इससे आप क्या संदेश दे रहे हैं. आप खुद विश्वविद्यालय में हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं. दिल्ली पुलिस उन्हें पूरी छूट देते हुए कह रही है कि आओ आपको जो कुछ करना हो, करो, आपकी सरकार है. हम दिल्ली पुलिस के लोग चुपचाप खड़े रहेंगे. इससे आप विश्वविद्यालय में किस तरह की शिक्षा को बढ़ावा देंगे.

आप भूल जाते हैं.जेएनयू का तीन माह से नजीब नामक छात्र गायब है. उसे एबीवीपी के लोगों ने मारा. आज तक मिला नहीं. इसका जवाब दिल्ली पुलिस या दिल्ली की सरकार के पास नहीं है. एबीवीपी के लोग ‘भारत माता की जय’ चिल्लाने के अलावा कोई जवाब नहीं दे सकते.

दुःख के साथ कहना चाहूंगी कि यह बहुत चिंता जनक स्थिति है. यदि आपको लगता है कि मैं जान बूझकर किसी खास पक्ष की बात कर रही हूं, तो आप सोचते रहिए, मुझे फर्क नहीं पड़ता. अगर आपको लगता हैं कि मैं आइसा छात्रसंघ की समर्थक हूं, तो इससे मेरी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता. आप देख लीजिए, पिछले ढाई साल से केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद से ही एबीवीपी की हिंसात्मक गतिविधियां बढ़ी हैं.

नजीब को ढूंढ़ने के लिए जेएनयू के छात्र लगातार आंदोलन व मुहीम चला रहे हैं. लेकिन हमारे देश की मीडिया भी इस आंदोलन/मुहीम की चर्चा नहीं कर रहा है. यह छात्र सोशल मीडिया पर नजीब की तलाश की मुहीम चला रहे हैं. पर छात्रों के पास इतना धन नहीं होता कि वह कुछ कर सकें. उनके पास मीडिया की तरह कलम की ताकत नहीं है. जिस ढंग की शक्ति एबीवीपी के पास है, वैसी शक्ति भी उनके पास नही है. पर वह सब जगह सवाल कर रहे हैं. मुझे लगता है कि नजीब मारा गया.

मेरा सीधा सवाल यह है कि विश्वविद्यालयों में शुक्षा क्या हो रहा है?

मैं यह कहूंगी कि यदि आप विश्वविद्यालय में सवाल पूछने की आजादी खत्म कर देंगे, तो शिक्षा अपने आप बंद हो जाएगी.

आखिर क्या वजह है कि छात्र आंदोलन व हिंसा की घटनाएं जेएनयू व दिल्ली विष्वविद्यालय में ही होती हैं. मुंबई विश्विविद्यालय में इस ढंग की घटनाएं नहीं सुनायी देती?

आप जेएनयू को दोश ना दें. हैदराबाद विश्वविद्यालय में बहुत बड़ा कांड हुआ. एक छात्र ने आत्महत्या कर ली, जिसको लेकर बवाल भी हुआ, पर कोई परिणाम नहीं निकला. यूं तो मुझे मुबंई विष्वविद्यालय के बारे में जानकारी नहीं है. शायद मुंबई में बॉलीवुड, मीडिया व कॉरपोरेट हावी हैं. दूसरी बात मुंबई विश्वविद्यालय में लिबरल आर्ट की बजाय सबसे ज्यादा कॉमर्स पढ़ाया जाता है. फिर विज्ञान पढ़ाया जाता है.

जबकि दिल्ली विष्वविद्यालय व जेएनयू लिबरल आर्ट के केंद्र हैं. यहां सामाजिक इतिहास, समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान पढ़ाया जाता है. हैदराबाद व इलहाबाद विश्वविद्यालयों में भी यही विषय ज्यादा पढ़ाई जाते हैं. इलहाबाद विश्वविद्यालय में भी बड़े बड़े कांड हुए हैं. पर जेएनयू बदनाम है, इसलिए लोग वहां कि हर छोटी बड़ी घटना को बड़ा बनाकर पेश करते हैं. दूसरी बात दिल्ली देय की राजधानी है. केंद्र सरकार का दबदबा है. दिल्ली पुलिस, केंद्र सरकार के अधीन काम करती है.

तो आप भारत विरोधी नारों को जायज ठहराती है?

मेरी नजर में जब भारत विरोधी नारे लगते हैं, तो उससे बातचीत शुरू होती है, जिससे नई बातें सामने आती हैं. जब वार्तालाप होगा, बहस होगी,तभी समाज व देश प्रगति करता है. महात्मा गांधी जी ने बात बात कर कर के देष को आजाद कराया था. गांधी जी को हिंसा का रास्ता अपनाने की जरूरत नहीं पड़ी. देखिए,उस जमाने में भगतसिंह जैसे हिंसावादी नेता भी थे,पर सफलता तो अहिंसावादी और बातचीत करने वाले गांधी ने ही दिलायी.

आपको नहीं लगता कि एबीवीपी को उन लोगों से समस्या है,जो आम जगहों यानी कि पब्लिक प्लेस पर द्विअर्थी गाने गाते हैं या अश्लील बातें करते हैं?

क्या समाज सुधार का ठेका एबीवीपी को मिला है? आप समाज के ठेकेदार नही हैं. देश कानून व संविधान से चलता है. देश के कानून ने ही तय किया है कि पब्लिक प्लसे में क्या क्या किया जा सकता है. कानून में कहीं नही लिखा हैं कि दो लोग हाथ पकड़कर पब्लिक प्लेस में साथ में नही चल सकते. यदि आपको किसी के किसी काम से समस्या है, तो आप उसके खिलाफ कानून का सहारा लीजिए.

मैं लिखकर देती हूं कि यदि दो लोग पब्लिक प्लेस में किसिंग कर रहे हैं और आप पुलिस के पास जाएंगें, तो पुलिस आपको ही भगाएगी. क्योंकि पुलिस को कानून की समझ है. यह अदालत तय करेगी कि क्या सही है व क्या गलत. आप किसी को गलत मानकर उसका मुंह काला कर दें, उसकी पिटाई करें, यह सब गलत है.

आप किसी के साथ जबरदस्ती नहीं कर सकते. हिंसा का रास्ता नही अपना सकते.आप संविधान के खिलाफ काम नहीं कर सकते. आप उसके ठेकेदार नहीं बन सकते हैं. किसी इंसान को अछूत मानना भी अपराध है.

क्या वजह है कि जब आपकी फिल्म रिलीज होने वाली होती है, तभी दिल्ली विश्वविद्यालय या जेएनयू में बवाल हो जाता है?

मुझे भी नहीं पता. मेरे निर्माता भी यही सवाल मुझसे पूछ रहे थे. पर हो यही रहा है कि मेरी फिल्म के रिलीज से पहले कोई न कोई भारत का राजनीतिक मुद्दा गर्मा जाता है. मेरी फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ के रिलीज से दो माह पहले जेएनयू में कन्हैया और उमर खालिद का मुद्दा गर्माया था. मैंने उमर खालिद के पक्ष में खुला पत्र लिख दिया था. अब ‘अनारकली ऑफ आरा’ 24 मार्च को प्रदर्शित होने वाली है, तो दिल्ली विश्वविद्यालय का मुद्दा गर्मा गया है. जहां एबीवीपी ने आग लगा रखी है. अब मैं सोचती हूं कि मैं अपना फेक ट्वीटर एकाउंट खोल लूं. जहां मैं राजनीतिक बातें किया करूं,जिससे मेरी फिल्मों पर असर ना पड़े.

उमर खालिद के पक्ष में आपने खुला पत्र लिखा था. इस बार आपने कोई पत्र नहीं लिखा?

पिछली बार मेरे खुले पत्र को लेकर बहुत बवाल हो गया था. इस बार भी लिखना चाहती थी. पर समय नहीं मिला. मैं फिल्म के प्रमोशन में व्यस्त हूं.