गृहशोभा विशेष

बौलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की फरवरी माह में फिल्म ‘शमिताभ’ रिलीज हुई, जिस में उन के साथ धनुष और अक्षरा हासन हैं. इस फिल्म के सहनिर्माता अभिषेक बच्चन हैं. पेश हैं, अमिताभ से हुई मुलाकात के कुछ खास अंश:

आर. बालकी जब आप के पास ‘शमिताभ’ की स्क्रिप्ट ले कर आए थे, उस वक्त आप को इस में ऐसी क्या बात नजर आई कि आप ने तय कर लिया कि इस का निर्माण भी किया जाए

हम लोग भी थोड़ा बहुत प्रोडक्शन करते रहते हैं. आर. बालकी के साथ हम पहले भी फिल्में बना चुके हैं. एक दिन अभिषेक ने मुझ से पूछा कि क्यों न हम इस फिल्म को मिल कर बनाएं? तब मैं ने उस से कहा कि ठीक है.

फिल्म ‘शमिताभ’ को ले कर क्या कहेंगे?

यह फिल्म सिनेमा की पृष्ठभूमि पर एक ऐसी रोचक कहानी है, जो अब तक किसी भी फिल्म का हिस्सा नहीं रही है. फिल्म में 2 इंसान हैं, जिन की उम्र में काफी अंतर है. मगर दोनों में कुछ कमियां और कुछ खूबियां हैं. दोनों एकदूसरे के साथ जुड़ कर सफलता के नए मानदंड स्थापित करते हैं. मगर एक मुकाम पर दोनों का ईगो आडे़ आ जाता है, फिर उन में विद्रोह हो जाता है. फिल्म में अक्षरा हासन एक कैटालिस्ट की तरह हैं. वे समझ जाती हैं कि इन दोनों की कमियां क्या हैं और कैसे दोनों एकदूसरे की कमियों को पूरा कर सकते हैं. वे इन दोनों को एकसाथ लाने का काम करती हैं.

70 व 80 के दशक में आप ने एक ऐंग्री यंग मैन के हीरोइज्म को पेश किया था. अब वह नहीं रहा. यह जो हीरोइज्म बदला है, उसे ले कर क्या कहना चाहेंगे?

सिनेमा का हीरो कैसा हो, यह हमें समय बताता है. 70 के दशक में लेखकों को लगा था कि हमारे देश में जो कुछ हो रहा है, वह सही नहीं है. उस वक्त देश की नौजवान पीढ़ी के अंदर विद्रोह था, आक्रोश था. इसी वजह से जो किरदार फिल्मों में निखर कर आते थे, उस से लोग आईडैंटिफाई करते थे. उस वक्त युवा पीढ़ी को लगता था कि फिल्म में यह जो किरदार निभाया गया है, वह हमारी बात कर रहा है. बाद में धीरेधीरे वह दौर खत्म हो गया. फिर रोमांस का दौर आया. उस दौर में जो हीरो चमके, वे सभी रोमांटिक हीरो बन गए. उस के बाद फिर नया हीरो आया. मुझे लगता है कि अब एक बार फिर यह दौर भी बदलेगा और फिल्मों में नया हीरोइज्म सामने आएगा.

क्या आप मानते हैं कि इन दिनों जिस तरह से फिल्मों में भारी मात्रा में ऐक्शन दिखाया जा रहा है, क्या वह हमारे समाज का हिस्सा है?

यह तो जनता से ही पता चलेगा. जब फिल्म सौ या 2 सौ करोड़ कमा ले, तो क्या कहेंगे? लोग तो यही कहेंगे कि यही सही है, तो इस में हमारा कुछ लेनादेना नहीं है.

मगर बौक्स औफिस के इन सौ या 2 सौ करोड़ के आंकड़ों को ले कर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं?

इस के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है. लेकिन इस प्रश्न का सही जवाब डिस्ट्रीब्यूटर या फाइनैंसर अथवा फिल्म के निर्माण में जो फंडिंग करते हैं, वही दे सकते हैं. मैं ने इस तरफ कभी ध्यान नहीं दिया. मुझे पता नहीं है कि यह क्या होता है. मुझे तो यह भी नहीं पता कि फिल्म का व्यवसाय कैसे होता है. पर हम सुनते रहते हैं कि फलां फिल्म ने सौ करोड़ कमाए, फलां फिल्म ने 2 सौ करोड़ कमाए. अच्छी बात है यदि फिल्में कमा रही हैं. इस से फिल्म इंडस्ट्री को फायदा ही है.

फिल्म जगत में हर दिन नएनए बदलाव आ रहे हैं. भविष्य में क्या होगा, क्या इस का कोई एहसास आप कर पा रहे हैं?

इस का जवाब देना बड़ा मुश्किल है. 30 साल पहले हम ने कभी सोचा भी नहीं था कि टीवी हमारे सामने इतना बड़ा माध्यम बन कर उभरेगा अथवा सोशल मीडिया प्रबल होगा. भविष्य का कुछ पता नहीं चल सकता, क्योंकि आए दिन नए आविष्कार होते रहते हैं. मैं ने सुना है कि टीवी भी 85% फिल्म केंद्रित हो गया है. सोशल मीडिया हो या इंटरनैट, वहां भी ज्यादातर सामग्री फिल्मों की ही होती है, तो फिल्म मूलमंत्र रहेगा. आज की पीढ़ी के पास समय की कमी है. कम समय होने का मतलब यह नहीं है कि उस के पास समय नहीं है. समय होता है, पर उस में तीव्रता बहुत है. वह चाहती है कि बड़ी तेजी से काम हो जाए. पहले किसी बात को कहने के लिए 4-5 या 10 वाक्यों का सहारा लेना पड़ता था, पर अब ऐसा नहीं है. अब शब्दावली कम होती जा रही है. आज की पीढ़ी ‘कूल’, ‘रौकिंग’ जैसे शब्दों में ही सारी बात खत्म कर देती है.

धारावाहिक ‘युद्ध’ करने का अनुभव कैसा रहा?

इस धारावाहिक को जितनी टीआरपी मिलनी चाहिए थी उतनी नहीं मिली. दर्शकों ने इसे ज्यादा पसंद नहीं किया.

क्या वजह रही?

यही कि लोगों ने इसे नहीं देखा. लेकिन इस धारावाहिक में काम करने का मेरा अनुभव अच्छा रहा. मुझे वहां जा कर काम करना अच्छा लगता था. मुझे लगता है कि धीरेधीरे यह सारा माहौल बदलेगा. लोग चाहेंगे कि टीवी पर और ज्यादा बेहतरीन काम हो. मैं भी निरंतर टीवी पर कुछ न कुछ काम करता रहूंगा.

आप अभिनय जगत के साथसाथ सोशल मीडिया में भी सुपर स्टार बने हुए हैं. अब आगे क्या करने वाले हैं?

मैं ने कभी कोई काम यह सोच कर नहीं किया कि मुझे इस से इतने प्रशंसक मिलेंगे. सोशल मीडिया से मेरा जुड़ाव इत्तफाकन हुआ. किसी ने कहा कि आप की वैबसाइट होनी चाहिए, क्योंकि आप के नाम पर सौ से डेढ़ सौ वैबसाइट बनी हुई हैं और सभी में कोई न कोई गलत जानकारी दी गई है. लोग उसे सही मान रहे हैं. तब मैं ने उस से पूछा कि यह वैबसाइट क्या बला है? तब उस ने मुझे दिखाया, तो सारी बात मेरी समझ में आई.

मैं ने देखा कि मेरे बारे में कुछ गलत समाचार भी थे. मैं ने उस से पूछा कि यदि वैबसाइट बनाई जाए, तो कितना समय लगेगा? उस ने कहा कि 6-7 माह में बना देगा. उस ने मुझ से कहा कि आप अपने परिवार वालों से व अपने से संबंधित सारी जानकारी मुझे दे दीजिए. तब मैं ने उस से कहा कि 6-7 माह कौन इंतजार करेगा. कोई ऐसा रास्ता बताओ ताकि जल्दी हो जाए. तब उस ने मुझे ‘ब्लौग’ के बारे में बताया. उस ने कहा कि सुबह लिखिए, शाम तक छप जाएगा. मुझे लगा कि यही ठीक है. मैं ने कुछ लिखा फिर उसे टाइप कर ब्लौग पर पोस्ट कर दिया. अगले दिन एक रिस्पौंस आ गया. मुझे लगा कि यह तो बहुत अच्छी बात है. मैं ने जो कुछ लिखा, उसे किसी ने तो पढ़ा. मैं ने उसे जवाब दे दिया. अगले दिन 3 रिस्पौंस आ गए. धीरेधीरे रिस्पौंस की संख्या बढ़ती चली गई. अब मेरा परिवार काफी बड़ा हो गया है. ब्लौग के साथ जुड़े लोगों को मैं ने ‘ऐक्सटैंडेड फैमिली’ का नाम दिया है. ये बड़े कमिटेड लोग हैं. ये हर दिन मेरे ब्लौग पढ़ते हैं और अपना रिस्पौंस देते हैं.

कभी कोई आलोचना करता है?

हां, लोग आलोचना भी करते हैं. प्रशंसा भी करते हैं और गालीगलौज भी करते हैं. सब कुछ करते हैं. हमें सब अच्छा लगता है. देखिए, कोई भी इंसान हर काम अच्छा नहीं कर सकता. उस की आलोचना तो होनी ही चाहिए. ये मेरे प्रशंसक ही हैं, जो मेरे काम की आलोचना करते हैं. यदि आप एक ऐसे माध्यम से जुड़े हैं, जो आप की बातों को संसार भर में फैलाता है और आप यह मान कर चलते हैं कि कोई आप की बुराई नहीं करेगा, तो यह अच्छी बात नहीं है. आप को इस माध्यम में बहुत संभल कर चलना होगा.

आप की आने वाली फिल्में?

अप्रैल माह में सुजीत सरकार द्वारा निर्देशित कौमेडी व ड्रामा फिल्म ‘पीकू’ रिलीज होगी. इस के अलावा बिजय नांबियार द्वारा निर्देशित फिल्म ‘वजीर’ कर रहा हूं, जिस में मेरे साथ फरहान अख्तर भी हैं.

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