नाट्यभूषण पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार सचिन गुप्ता ‘‘पराठे वाली गली’’ व ‘‘थोड़ा लुत्फ थोड़ा इश्क’’ के बाद अब चाइल्ड ट्रैफिकिंग पर विचारोत्तेजक  फिल्म ‘‘पाखी’’ लेकर आ रहे हैं. दस अगस्त को सिनेमाघरों में पहुंच रही फिल्म ‘‘पाखी’’में अनामिका शुक्ला व सुमित कौल की अहम भूमिकाएं हैं.

फिल्म‘‘पाखी’’क्या है?

यह फिल्म लड़कियों और औरतों की आजादी को लेकर सवाल उठाती है. पाखी का अर्थ होता है पंक्षी..जो कि स्वच्छंद विचरण करता है. पर हमारे देश में जिस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं, उससे साफ नजर आ रहा है कि हमारे यहां अभी भी लड़कियां आजाद या सुरक्षित नहीं हैं. पक्षी कहीं भी उड़ान भर सकता है. पर हमारे देश में पाखी यानी लड़कियां किस तरह से जकड़ी हुई हैं, उन्हें आजादी दिलाने की बात हमारी फिल्म करती है. हमारी यह फिल्म चाइल्ड ट्रैफीकिंग पर है, जो कि विश्व का सबसे बड़ा व्यापार है. मगर हमारी फिल्म पूरी तरह से व्यावसायिक फिल्म है. इसमें गाने भी हैं और साथ में एक रोचक प्रेम कहानी भी है.

कहानी क्या है?

फिल्म की कहानी एक दस वर्षीय बालक (अनमोल गोस्वामी) और उसकी बहन (पिहू) की भावनात्मक यात्रा है, जो कि अनचाहे ट्रैफीकिंग के जाल में फंस जाते हैं. पूरी कहानी सत्य घटनाक्रमों पर आधारित है. कहानी हमारी फिल्म के विलेन यानी कि वेश्यालय चलाने वाले बाली (सुमित कौल) के वेश्या गृह से शुरू होती है. जहां एक लड़की पाखी (अनामिका शुक्ला) को उसका प्रेमी बेचकर गया था. वह किस तरह से अपनी जिंदगी जी रही है, तो वहीं पिहू और उसके भाई को किस तरह से यहां लाकर बेचा जाता है. पाखी की यात्रा के साथ हम पिहू और उसके भाई की यात्रा को भी दिखा रहे हैं, जो इस गलत धंधे में फंस जाते है. तो हम पाखी और पिहू इन दो किरदारों के साथ पूरे विश्व को दिखाना चाहते हैं कि सिर्फ भारत ही नहीं पूरे विश्व में देह व्यापार और चाइल्ड ट्रैफीकिंग का धंधा हो रहा है. हमें शोध में पता चला कि कमाई के मामले में यह धंधा पूरे विश्व में दूसरे नंबर पर है. कुछ लड़कियां वेश्यालयों में बेचे जाने के बाद अपनी जिंदगी से समझौता कर वहीं रम जाती हैं. मगर कुछ लगातार नर्क की इस जिंदगी से छुटकारा पाने के लिए एक लड़ाई लड़ती रहती हैं. उज्ज्वल भविष्य के लिए लड़ने वाली लड़कियों की जद्दोजेहद भी इस फिल्म का हिस्सा है. हमें बहुत तकलीफ हुई सच जानकर यहां तक कि हम लोग डिप्रेशन में जाते जाते बचे.

यह कहानी कब आपके दिमाग में आयी?

इस कहानी पर मैं 2004 से काम करता आ रहा हूं. 2004 में मैंने एक नाटक ‘‘वेकअप’’ किया था, उसमें जो समाज में डार्क एलीमेंट हैं, उनके उपर कटाक्ष किया गया है. तो 2004 से ही कही न कहीं मेरे दिमाग में इसको लेकर कहानी चल रही थी. मैं धीरे धीरे जानकारी इकट्ठा करता जा रहा था.

आपने इस फिल्म के लिए किस तरह का शोधकार्य किया?

मैंने बहुत शोध किया और जो तथ्य सामने आए, उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए. छोटी उम्र की लड़कियों को हारमोन्स के इंजेक्शन देकर बड़ी उम्र और सेक्स के लिए भोग्य वस्तु के रूप में तैयार किया जाता है. यह क्रूरता ही है. इतना ही नहीं यह चाइल्ड ट्रैफीकिंग वेश्या के बाजार में लड़कियों को बेचने के लिए नहीं हो रही है, बल्कि उनके शरीर के अंगों को बेचने के लिए भी हो रही है. मैंने इसी तरह के तमाम शोधपरक तथ्यों का इस फिल्म में समावेश किया है.

आप हमेशा अपनी लिखी हुई कहानियों पर फिल्म का निर्माण निर्देशन करते हैं?

जी हां! मुझे लगता है कि मैं अपने कंविक्शन के साथ लिखी गयी कहानी पर बेहतर फिल्म बना सकता हूं. कहानीकार के तौर पर मुझे अपनी कहानी से प्यार हो जाता है और मुझे पता होता है कि उसे किस तरह से परदे पर लाना है. मुझे नहीं लगता कि मेरी लिखी कहानी के साथ दूसरा निर्देशक न्याय कर पाएगा.

फिल्म ‘‘पाखी’’ के लिए कलाकारों का चयन कैसे किया?

फिल्म के विेलन और वेश्यालय चलाने वाले बाली के किरदार में सुमित कौल हैं. सुमित कौल मेरे साथ पिछले छह वर्षों से जुड़े हुए हैं. हम लोग थिएटर भी एक साथ करते आए हैं. हम दोनों एक दूसरे के विचार बहुत अच्छी तरह से समझ जाते है. पाखी के किरदार में अनामिका शुक्ला हैं, जो कि कानपुर की हैं और दिल्ली में थिएटर करती रही हैं. मुबई आने के बाद वह हमारे साथ थिएटर कर रही हैं. इसके अलावा भाई बहन के किरदार में अनमोल गोस्वामी व पिहू हैं. दोनों दिल्ली से हैं. यह दोनों बच्चे हैं.

इसके बाद..?

हमने एक फिल्म ‘‘मनसुख चतुर्वेदी की आत्मकथा’’ बनायी है. इसमें भी अनामिका शुक्ला ने अभिनय किया है. दो माह बाद हम इस फिल्म को रिलीज करेंगे.