गृहशोभा विशेष

फिल्म ‘नाम शबाना’ एक्शन स्पाई थ्रिलर फिल्म है, जिसे शिवम् पाण्डेय ने निर्देशित किया है. इस प्रकार की फिल्म पहले भी आ चुकी है, और इसमें अधिकतर फिल्मों में अक्षय ने ही अभिनय किया है. पर यहां सबसे अलग बात यह है कि इस फिल्म में तापसी पन्नू ने एक्शन किया है.

फिल्म को देखकर लगता है लेखक और निर्देशक इस फिल्म को बनाते समय थोड़ी दुविधा में थे. तापसी पर पूरी तरह से विश्वास न होने की वजह से ‘स्टार फैक्टर’ अक्षय कुमार को लिया गया, जो पूरी फिल्म के दौरान कहानी को सपोर्ट करती हुई दिखे. हालांकि अक्षय की एंट्री फिल्म में काफी देर से हुई. फिल्म के शुरुआत में लग रहा था कि फिल्म मनोज वाजपेयी और तापसी पन्नू के कंधों पर है और कहानीकार ने तापसी पन्नू को ही ध्यान में रखकर ही पूरी कहानी लिखी है. लेकिन अक्षय के पर्दे पर आने के बाद कहानी में थोड़ी दम आया.

तापसी ने अपनी भूमिका को सफल बनाने के लिए काफी मेहनत की है. पर लचर पटकथा की वजह से उनका अभिनय बहुत अधिक उभर कर नहीं आ पाया. शुरु में फिल्म की रफ्तार बहुत धीमी थी, लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म ठीक लगी. मनोज बाजपेयी इसमें कुछ खास नहीं कर पाए हैं.

कहानी

शबाना (तापसी पन्नू) एक मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की है, जो अपनी मां के साथ रहती है. उसका अतीत काफी दर्दनाक है. वह कूडो चैम्पियन है और उस क्षेत्र में नाम कमाना चाहती है. वह एक साहसी लड़की है और किसी को भी सबक सिखाने से पीछे नहीं हटती. उसका एक लॉयल बॉयफ्रेंड है. लेकिन एक दिन जब वह अपने बॉयफ्रेंड के साथ उसका बर्थडे मनाकर बाइक के पीछे बैठकर घर लौट रही थी, तो रास्ते में कुछ  मनचले लड़कों ने उसके साथ छेड़खानी की और शबाना उन लड़कों से लड़ पड़ी.

इसी झगड़े में उसके बॉयफ्रेंड का मर्डर उसकी आंखों के सामने हो जाता है. परेशान और दुखी शबाना उन लड़कों को सबक सिखाना चाहती है. इसी बीच मनोज वाजपेयी (भारत की एक सुरक्षा एजेंसी के प्रमुख) को एक फुर्तीले और जाबांज एजेंट की तलाश है, क्योंकि उन्हें टोनी (पृथ्वीराज सुकुमारन)को मारना है. टोनी देश में आर्मस की सप्लाई करता है, पर उसे कोई भी पकड़ नहीं पाया है.

शबाना के सारे साहसी कारनामो को मनोज बाजपेयी कैमरे में कैद करते हैं और एक दिन उससे खुश होकर वह एक डील करते हैं ,जिसमें दोनों को फायदा हो. शबाना राजी हो जाती है और अपना बदला लेकर खतरनाक मिशन पर निकल पड़ती है, जिसमें उसका साथ देता है, एजेंट अजय सिंह राजपूत(अक्षय कुमार). इस प्रकार काफी जद्दोजहद के बाद कहानी अंजाम तक पहुंचती है.

फिल्म में गानों का अधिक महत्व नहीं दिखाई पड़ा, कोई भी गाना ऐसा नहीं था जो, गुनगुनाया जा सके. फिल्म जरुरत से अधिक लम्बी है. पटकथा को और अधिक काट-छांट करने की जरुरत थी. अगर आप एक्शन फिल्म पसंद करते हैं तो ये एक बार देखने लायक है. इसे टू एंड हाफ स्टार दिया जा सकता है.

                                                   

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