महीपत के 1 बेटी और 1 बेटा थे. दोनों भाई बहन एक साथ पले बढे़ थे. उन में कोई मतभेद भी नहीं था. महीपत ने अपनी पत्नी लक्ष्मी की मौत के बाद वसीयत तैयार कराई और उस में अपनी बेटी को भी बराबर का अधिकार दिया. महीपत की मौत के बाद उस की सारी प्रौपर्टी 2 हिस्सों में बंटनी थी. भाई शिवम को बहन रश्मि से कोई दिक्कत नहीं थी. उसे अपने बहनोई दिवाकर से समस्या थी.

पिता की मौत के बाद दिवाकर का महीपत खानदान में दखल बढ़ गया था. दिवाकर की निगाह एक होटल पर थी जो महीपत अपने बेटे शिवम के नाम पर ही बना कर गए थे. बहन रश्मि भी यही चाहती थी कि होटल भाई शिवम के पास ही रहे. दिवाकर को यह बात पसंद नहीं थी.

उस ने पत्नी पर दबाव बनाना शुरू किया कि वह होटल पर भी अपना अधिकार मांगे. पिता की वसीयत के आधार पर होटल पर उस का आधा अधिकार है.

शिवम होटल पर बहन को हिस्सा देने को तैयार नहीं था. ऐसे में मामला कोर्ट में गया. कानूनी रूप से बहन का होटल पर अधिकार था पर मानसिक रूप से शिवम और बहन रश्मि इस के लिए तैयार नहीं थे. ऐसे में वसीयत होने के बाद भी दोनों भाईबहनों के बीच रिश्ते खराब नहीं हुए.

आपसी रिश्तों को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हर मातापिता अपनी जायदाद का बंटवारा सही तरह से अपनी ही जिंदगी के दौरान करें. वसीयत से पहले ही अपने पैसों व जायदाद का बंटवारा कर दें. इस में कुछ आर्थिक दबाव जरूर पड़ता है पर बाद की मुकदमेबाजी और रिश्ते खराब होने से बच जाता है.

कानून खडे़ करते हैं विवाद

वसीयत को ले कर कानून कहता है कि रजिस्टर्ड और गैररजिस्टर्ड में कोई भेद नहीं है. सरकार ने वसीयत के बाद होने वाले झगड़ों से बचने के लिए प्रावधान बनाया है कि केवल रजिस्टर्ड वसीयत ही मान्य है. अलगअलग राज्यों में इस के अलगअलग नियमकायदे हैं. उत्तर प्रदेश में खेती की जमीन के बदलाव में रजिस्टर्ड वसीयत ही मान्य है. अगर मसला कोर्ट में जाता है तो वहां रजिस्टर्ड और गैररजिस्टर्ड में कोई भेद नहीं है.

भारतीय कानून के अलावा यहां पर अविभाजित हिंदू परिवार कानून भी लागू होता है. जिस के तहत अलग तरह के बंटवारे का प्रावधान है. कानून यह भी मानता है कि अगर आप अपनी पैतृक जायदाद का बंटवारा करते हैं तो उस में उत्तराधिकार कानून के तहत ही हिस्सेदारी देनी होगी. अपनी स्वअर्जित जायदाद का बंटवारा ही आप अपनी वसीयत के अनुसार कर सकते हैं.

वसीयत के अलावा अगर अपनी जायदाद का बंटवारा करना है तो जमीन या मकान की रजिस्ट्री कराना ही सब से मुफीद तरीका होता है. इस से लोग बचते हैं, क्योंकि जायदाद की रजिस्ट्री कराने में सरकारी खर्च यानी स्टांप ड्यूटी देनी पड़ती है. लोगों को यह अनावश्यक बोझ लगता है. दूसरे कई बार माता पिता को इस बात का भी भय होता है कि जायदाद लेने के बाद बच्चे बुढ़ापे में सेवा करेंगे या नहीं. इसलिए वे बंटवारे की सारी जिम्मेदारी वसीयत पर छोड़ कर जाते हैं. वसीयत उन के न रहने पर ही मान्य होती है. ऐसे में मरने के बाद परिवार में झगडे़ शुरू हो जाते हैं. इन झगड़ों से बचने का एक ही जरिया है कि अपने पैसों और जायदाद का बंटवारा वसीयत से पहले ही कर के जाएं.

वसीयत से पहले बंटवारा

जायदाद चल और अचल 2 तरह की होती है. चल संपत्ति में पैसा आता है. इस के बंटवारे का सब से अच्छा जरिया यह है कि जिसे आप देना चाहते हो उस के नाम पर बैंक में अपना सहखाता खोलें. कई बार बैंक खाते में नौमिनी बनाने के बाद भी उत्तराधिकार कानून के तहत विवाद खडे़ कर दिए जाते हैं. ऐसे में सब से सरल रास्ता यही है कि आप बैंक में सहखाता खोलें और उस के जरिए ही पैसों का बंटवारा करें.

अगर एक से अधिक संतान हैं तो यह रास्ता ही सब से सरल होगा, जिस में किसी भी तरह की वसीयत की समस्या नहीं रहेगी. कई बार पिता के न रहने के बाद मां बेटी या मां और बेटे के बीच भी संबंध खराब हो जाते हैं. पत्नी, पुत्र और पुत्री स्वाभाविक उत्तराधिकारी होते हैं. उन में से बिना सहमति के किसी एक को पैसा देना सरल नहीं है. सहखाते के जरिए ही बिना किसी विवाद के पैसा दिया जा सकता है. केवल बैंक बचत खाता ही नहीं, दूसरी बचत योजनाओं में भी सह खातेदार प्रक्रिया ही सब से सरल होती है.

अगर अचल संपत्ति यानी मकान, जमीन, फैक्टरी का बंटवारा करना हो तो उस का भी बंटवारा वसीयत के अनुसार सरलता से नहीं हो पाता. पैतृक  जायदाद में बेटा बेटी और पत्नी का स्वाभाविक अधिकार होता है. ऐसे में इन में अगर किसी एक को देना हो तो जायदाद की रजिस्ट्री कराना ही सब से सरल तरीका होता है.

वसीयत के जरिए अगर किसी एक को अपनी जायदाद देना चाहते हैं तो दूसरा पक्ष विवाद खड़ा कर सकता है. भारत में न्याय पाने के लिए सालोंसाल भटकना पड़ता है. ऐसे में अगर पूरी तरह से मजबूत बंटवारा न हो तो कानून की किसी न किसी धारा के तहत परिवाद यानी मुकदमा दर्ज हो ही जाता है.

ऐसे में जरूरी है कि आपसी बंटवारा सहमति से न हो रहा हो तो वसीयत से पहले ही उस का सही बंटवारा कर दें. सरकार को चाहिए कि इस तरह के बंटवारों के जरिए जो जायदाद परिवार में ही किसी और के नाम हो रही हो उस की स्टांप ड्यूटी में राहत दी जाए.

सरकार को इस दिशा में कुछ प्रभावी कदम उठाने चाहिए. अगर कोई व्यक्ति अपनी जायदाद उपहार भी देना चाहे तो दोनों तरफ से सरकार को टैक्स देना पड़ता है. यही वजह है कि लोग वसीयत से पहले जायदाद के बंटवारे की पहल नहीं करते जिस से उत्तराधिकार कानून के तहत ही उन की जायदाद का स्थानांतरण होता है.

अभी हमारे समाज में बेटियों को पिता की जायदाद में हक देने का रिवाज नहीं है. कानून से बेटियों को पिता की जायदाद में हक मिल गया है. यह पेंच भाईबहन के बीच आपसी रिश्तों को खराब करने वाला होता है.

ऐसे में जरूरी है कि बंटवारे को वसीयत के बाद के झगड़ों से दूर रखते हुए पहले ही निबटा दिया जाए. तभी भाईबहन के बीच स्वाभाविक संबंध बने रह सकते हैं. आम धारणा यह बन गई है कि  वसीयत अंतिम समय में किसी न किसी तरह के भौतिक दबाव के तहत तैयार कराई जाती है. उस समय यह फैसला वसीयत करने वाले के विवेक पर नहीं होता. जिस का लाभ कानून दूसरे पक्ष को देता है जहां से विवाद शुरू हो जाता है.

अगर वसीयत के पहले सामान्य कानून के तहत जायदाद का बंटवारा हो तो बाद में विवाद नहीं होगा. पिता अपनी बात बेटा और बेटी दोनों को समझा सकता है, जिस से उन के बाद के संबंध मधुर रह सकते हैं. इसलिए जरूरी है कि वसीयत करने के लिए रखे पैसों को पहले ही बेटाबेटी को दे दें.

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