गृहशोभा विशेष

माहवारी को यौवन की शुरुआत कहा जाता है. महिलाएं इस का अनुभव किशोरावस्था से ले कर मध्य आयु तक करती हैं. फिर भी अभी तक हमारे समाज में इस के बारे में खुल कर बात नहीं की जाती है. यहां तक कि कुछ लोगों की तो मान्यता है कि माहवारी के समय महिलाएं बीमार और अछूत हो जाती हैं.

इस तरह की बातें दकियानूसी होती हैं. माहवारी कोई बीमारी नहीं है. माहवारी महिलाओं को प्रकृति का एक अनमोल तोहफा है, जो महिलाओं को पूर्ण बनाता है. महिलाओं को माहवारी के दौरान शर्म की जगह गर्व महसूस करना चाहिए, क्योंकि वे पूर्ण हैं.

जानकारी जरूरी

हर लड़की को माहवारी की समस्या से जूझना पड़ता है. लेकिन यह समस्या तब और बड़ी लगने लगती है जब बिना किसी जानकारी के इस से निबटना पड़े. अकसर लड़कियां झिझक के कारण किसी से माहवारी के विषय में बात नहीं करतीं. नतीजा यह होता है कि अचानक पीरियड्स शुरू हो जाते हैं और वे घबरा जाती हैं. इस घबराहट में वे अपनी तबीयत खराब कर लेती हैं. जबकि उन्हें पहले से ही माहवारी की जानकारी हो तो इस स्थिति से निबटना उन के लिए आसान हो जाता है.

सभी मांओं को अपनी बेटियों को उन के शरीर में होने वाले प्राकृतिक बदलावों के बारे में पहले से बताना चाहिए. ऐसा करने से मांएं अपनी बेटियों को बेवजह तनाव का शिकार बनने से रोक पाएंगी.

उपेक्षित महसूस न करें

पुरानी रीतियों और रिवाजों के तहत माहवारी के दौरान लड़कियों पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी जाती हैं. जैसे रसोई में न जाओ, बिस्तर में न बैठो, पेड़पौधों को न छुओ. इस तरह की टोकाटाकी से लड़कियां खुद को उपेक्षित महसूस करने लगती हैं. माहवारी के दिन आते ही वे खुद को अपराधी सा महसूस करने लगती हैं.

कई लड़कियां तो माहवारी  के दिनों में अवसादग्रस्त हो जाती हैं. इस तरह के मानसिक बदलाव के कारण रक्तस्राव में फर्क पड़ता है. किसी को रक्तस्राव अधिक होने लगता है तो किसी को बहुत कम. लेकिन इस स्थिति में बिलकुल भी तनाव नहीं लेना चाहिए, क्योंकि माहवारी होना एक प्राकृतिक क्रिया है.

साफसफाई है जरूरी

कई महिलाओं को भ्रम होता है कि माहवारी के समय केशों को नहीं धोना चाहिए. इस से माहवारी ठीक से नहीं हो पाती और रक्तस्राव भी कम होता है. कुछ महिलाएं तो माहवारी के समय नहाने तक को सही नहीं समझतीं और जब तक रक्तस्राव होता है तब तक वे नहीं नहातीं. दरअसल, उन का मानना होता है कि नहाने से माहवारी के समय अधिक दर्द होता है. लेकिन यह सिर्फ भ्रम है. उलटे माहवारी के समय नहाना बेहद जरूरी है. इस समय तो शरीर की साफसफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए खासकर योनि व उस के आसपास की सफाई बेहद जरूरी है.

सैनिटरी नैपकिन का रखरखाव

कई महिलाएं सैनिटरी नैपकिन को कहीं भी रख देती हैं. जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए. खासतौर पर खुले और इस्तेमाल किए जाने वाले सैनिटरी नैपकिन को हमेशा साफसुथरे स्थान पर रखना चाहिए. यदि इस्तेमाल किए जा रहे नैपकिन को गंदे स्थान पर रखा जाए तो उस में कीटाणु पनपने लगते हैं, जिस से संक्रमण फैलने का खतरा रहता है.

इतना ही नहीं इस्तेमाल किए जा चुके पैड को फेंकने में भी सावधानी बरतनी चाहिए. खुले स्थान पर पैड कभी नहीं फेंकना चाहिए. पैड को हमेशा कागज में लपेट कर कूड़े के ढेर में फेंकना चाहिए.

सैनिटरी नैपकिन का चुनाव

माहवारी की जानकारी तब तक अधूरी है जब तक आप सही सैनिटरी नैपकिन के चुनाव के बारे में नहीं जानतीं. आजकल मार्केट में कई साइजों और वैराइटी में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध हैं. लेकिन आप को अपनी बेटी को कौटन लेयर वाले स्लिम सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल करने की सलाह देनी चाहिए.

डाक्टरों और हाल ही में की गई स्टडीज के अनुसार माहवारी के दौरान हर 6 घंटे के अंतराल पर नैपकिन बदलते रहना चाहिए. फिर चाहे रक्तस्राव कम हो रहा हो या अधिक. इस के अतिरिक्त उसे यह भी बताएं कि वही सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल करे, जो गीलेपन को अच्छी तरह सोख कर जैल में परिवर्तित कर दे.

अपनी परेशानी बेझिझक बताएं

कई बार मांएं बेटियों की बातों को यह कह कर अनसुनी कर देती हैं कि पीरियड्स में ऐसा तो होता ही है. लेकिन ऐसा करना गलत है, क्योंकि माहवारी की शुरुआत में लड़कियों को कई प्रकार की तकलीफें होती हैं, जिन्हें बताने में वे हिचकिचाहट महसूस करती हैं. जबकि अपनी मां को अपनी तकलीफ बता कर बेटी निश्चिंत हो जाती है.

इसलिए समयसमय पर मांओं को खुद भी बेटियों से पूछते रहना चाहिए कि उन्हें किस तरह की समस्या आ रही है. साथ ही बेटियों को भी बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी मांओं को अपनी परेशानी बतानी चाहिए ताकि समय रहते उस का इलाज करवाया जा सके.

आज भी भारत में महिलाओं के बीच माहवारी के दौरान सैनिटरी नैपकिन की जगह कपड़ा इस्तेमाल करने से जुड़ी कई भ्रांतियां हैं. एक सर्वे के अनुसार भारत में केवल 12% महिलाएं ही माहवारी के दौरान साफसुथरे नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं. बाकी महिलाएं इन दिनों घर में पड़े पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं. कुछ महिलाएं कपड़े के अंदर रुई भर कर उसे पैडनुमा आकार दे कर इस्तेमाल करती हैं. जरूरत पड़ने पर दिन में 2-3 बार वे इसी तरह पैड बना कर उस का इस्तेमाल कर लेती हैं.

कई महिलाएं तो इतना भी नहीं करतीं. वे सिर्फ गंदे कपड़े को हटा कर उस की जगह साफ कपड़ा लगा लेती हैं. लेकिन ऐसा करना अपने  स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना है. महिलाएं ऐसा 2 वजहों से करती हैं. पहली वे महंगे सैनिटरी नैपकिन नहीं खरीदना चाहतीं, दूसरी उन में भ्रांति है कि नैपकिन का इस्तेमाल करने से रक्तस्राव ज्यादा होता है और संक्रमण फैलने का खतरा रहता है. जबकि ऐसा नहीं है.

सैनिटरी नैपकिन खरीदने में थोड़ा पैसा जरूर लगता है, लेकिन वे बेहद स्वच्छ होते हैं. उन के इस्तेमाल से किसी तरह का संक्रमण नहीं फैलता. वहीं कपड़े के इस्तेमाल से युरिन इन्फैक्शन, योनि के आसपास की त्वचा में खुजली आदि का खतरा हो जाता है. कपड़े औैर रुई के इस्तेमाल से त्वचा को औक्सीजन मिलने में दिक्कत होती है, जिस से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है. इस तरह के संक्रमण से बचने के लिए सैनिटरी नैपकिन से बेहतर कोई विकल्प नहीं है.

महिलाओं में ऐनीमिया

ऐनीमिया भारतीय महिलाओं में एक आम बीमारी है. ऐनीमिया शरीर में 2 जरूरी पोषक तत्त्वों-विटामिन बी 12 और आयरन की कमी से होता है. महिलाओं की शारीरिक रचना इस तरह की होती है कि मासिकस्राव, गर्भावस्था एवं प्रसव में बहुत अधिक रक्त उन के शरीर से बाहर निकल जाता है. ये सारी स्थितियां उन्हें ऐनीमिया का शिकार बना देती हैं.

ऐनीमिया किसी भी आयुवर्ग एवं शारीरिक बनावट की महिला को हो सकता है. लेकिन इस का पता सिर्फ रक्त की जांच से ही चल सकता है.

क्या है ऐनीमिया

हमारे शरीर के सैल्स को जिंदा रहने के लिए औक्सीजन की जरूरत होती है. शरीर के अलगअलग हिस्सों में औक्सीजन रैड ब्लड सैल्स में मौजूद हीमोग्लोबिन पहुंचाता है. आयरन की कमी और दूसरी वजहों से रैड ब्लड सैल्स और हीमोग्लोबिन की मात्रा जब शरीर में कम हो जाती है, तो उस स्थिति को ऐनीमिया कहते हैं.

आरबीसी और हीमोग्लोबिन की कमी से सैल्स को औक्सीजन नहीं मिल पाती. कार्बोहाइड्रेट और फैट को जला कर ऐनर्जी पैदा करने के लिए औक्सीजन जरूरी है. औक्सीजन की कमी से हमारे शरीर और दिमाग की काम करने की क्षमता पर असर पड़ता है.

ऐनीमिया के प्रकार

माइल्ड: अगर बौडी में हीमोग्लोबिन 10 से 11 जी/डीएल के आसपास हो तो उसे माइल्ड ऐनीमिया कहते हैं. इस में हैल्दी और बैलेंस्ड डाइट खाने की सलाह के अलावा आयरन सप्लिमैंट्स दिए जाते हैं.

मौडरेट: अगर हीमोग्लोबिन 8 से 9 जी/डीएल से कम हो तो सीवियर ऐनीमिया कहलाता है, जो एक गंभीर स्थिति होती है. इस में मरीज की हालत को देखते हुए ब्लड भी चढ़ाना पड़ सकता है.

सीवियर: अगर हीमोग्लोबिन 8 जी/डीएल से कम हो तो सीवियर ऐनीमिया कहलाता है, जो एक गंभीर स्थिति होती है. इस में भी मरीज की हालत की गंभीरता को देखते हुए ब्लड भी चढ़ाना पड़ सकता है.

ऐनीमिया के लक्षण

ऐनीमिया से पीडि़त महिला को सुस्ती, सिर में दर्द, छाती में दर्द, त्वचा में पीलापन, शरीर का ठंडा रहना, मामूली कामकाज से थकान, शारीरिक शक्ति में कमी, हांफना, रुकरुक कर सांसें लेना, दिल की धड़कन का अनियमित होना आदि शारीरिक लक्षणों से गुजरना पड़ता है.

ऐनीमिया से खतरा

खून की कमी होने पर हृदय को अधिक काम करना पड़ता है. खून की कमी से हृदय की धड़कन बढ़ जाती है, जिस से हृदयाघात का खतरा रहता है. खून की कमी से ही शरीर के कई अंग अपनी पूर्ण क्षमता के साथ काम नहीं कर पाते. यह शरीर को अक्षम बना देता है. शारीरिक विकास की गति थम जाती है और जीवनकाल कम हो जाता है.

महिलाओं की सारी शारीरिक गतिविधियां खून की कमी के कारण प्रभावित हो जाती हैं. खासतौर पर गर्भस्थ शिशु का विकास पूर्णरूप से नहीं हो पाता. इस से किसी भी समय गर्भपात हो सकता है.

ऐनीमिया की जांच व निदान

ऐनीमिया का पता लगाने के लिए प्रयोगशाला में रक्त की जांच ही एकमात्र उपाय है. इस में महिला के कंप्लीट ब्लड काउंट की जांच होती है. महिलाओं में इस की संख्य 11 से 15 होती है. यदि ब्लड काउंट निर्धारित संख्या से कम होते हैं तो इस का मतलब महिला ऐनीमिया पीडि़त है. फिर इस का इलाज किया जाता है और संतुलित खानपान की सलाह दी जाती है. दरअसल, हमारे दैनिक खानपान में बहुत सी ऐसी वस्तुएं हैं जिन का सेवन रक्त बढ़ाने में सहायक होता है.

रक्त वृद्धि

हीमोग्लोबिन को बढ़ाने में आयरन, विटामिन सी एवं बी-12 प्रमुख व सहायक घटक हैं. हरी सब्जियां जैसे पालक, मेथी, चौलाई, मटर आदि रक्त बढ़ाने में सहायक होते हैं. साथ ही  मूंगफली, मसूर, बादाम, किशमिश, अंडा, मांस, मछली आदि में भी रक्त बढ़ाने की क्षमता होती है. लाल व बैगनी रंग के फल एवं सब्जियों में भी आयरन की मात्रा होती है.

रक्त नवनिर्र्माण में सहायक द्वितीय मुख्य घटक विटामिन सी है. यह शरीर को आयरन के अवशोषण में सहायता करता है. विटामिन सी सभी रसदार फलों जैसे नीबू, मौसमी, संतरा, आम, स्ट्राबैरी, तरबूज, खरबूजा, अमरूद, आंवला, कीवी आदि में पाया जाता है. यह टमाटर, गोभी और आलू में भी होता है. विटामिन बी-2 एवं मल्टी विटामिन अंकुरित अनाज, दलहन में पाया जाता है. ये सभी रक्त निर्माण में सहायक हैं.

किन्हें खतरा ज्यादा

जिन महिलाओं को किडनी में समस्या, डायबिटीज, बवासीर, हर्निया और दिल की बीमारी है, उन्हें ऐनीमिया होने का ज्यादा खतरा होता है. शाकाहारी महिलाओं या स्मोकिंग करने वाली महिलाओं को भी ऐनीमिया का खतरा रहता है. यदि पीरियड्स के दौरान बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हो तो फौरन डाक्टर को दिखाएं, क्योंकि इस से शरीर में आयरन तेजी से कम हो जाता है.

हाल ही में किए गए एक शोध में यह बात सामने आई है कि भारत में लगभग 50% महिलाएं ऐनीमिया की शिकार हैं. महिलाओं की शारीरिक संरचना के अनुसार माहवारी या अन्य कारणों से उन में रक्तस्राव होना स्वाभाविक है, पर जब यह ज्यादा मात्रा में होने लगे तो इस के रोकथाम के उपाय करना जरूरी है. 

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