स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार देश की 13 फीसदी आबादी 6 साल से कम उम्र के बच्चों की है और उन में से 12.7 लाख बच्चों की पोषण की कमी के चलते रोजाना मौत होती है. इन गंभीर तथ्यों में यह जोड़ना भी जरूरी है कि जिस शुरुआती दौर में शिशुओं को प्रचुर मात्रा में माइक्रोन्यूट्रिएंट की सब से ज्यादा जरूरत होती है, उसी दौर में 75 फीसदी शिशुओं की मृत्यु का कारण पोषक तत्त्वों की कमी पाया गया है.

6 माह की उम्र के बाद ज्यादातर बच्चों में पोषक तत्त्वों की कमी उन के लिए घातक साबित हो रही है. आइए, जानते हैं इस समस्या से निपटने के तरीके…

विटामिन और मिनरल की कमी

किसी भी शिशु के शुरुआती 1000 दिन उसके जीवन का आधार होते हैं. इसी समय के पोषण से उस के भविष्य की नींव बनती है. लेकिन भारत में बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य को लेकर काफी सुधार होने के बावजूद लाखों बच्चे अपने 5वें जन्मदिन से पहले विटामिन और मिनरल की कमी से जूझ रहे होते हैं.

विटामिन और मिनरल की कमी को माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी भी कहा जाता है और यह शिशुओं में बीमारियां होने व मृत्यु दर बढ़ने का सब से बड़ा कारण है.

पोषक तत्त्वों की कमी

स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, विटामिन व मिनरल की कमी का सबसे भयावह परिणाम यह है कि प्रतिवर्ष पैदा होने वाले 26 लाख मिलियन बच्चों में से 7 लाख से ज्यादा शिशु शुरुआती समय तक भी जीवित नहीं रह पाते.

स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार देश की 13 फीसदी आबादी 6 साल से कम उम्र के बच्चों की है और उन में से 12.7 लाख बच्चों की पोषण की कमी के चलते रोजाना मौत होती है. इन गंभीर तथ्यों में यह जोड़ना भी जरूरी है कि जिस शुरुआती दौर में शिशुओं को प्रचुर मात्रा में माइक्रोन्यूट्रिएंट की सब से ज्यादा जरूरत होती है, उसी दौर में 75 फीसदी शिशुओं की मृत्यु का कारण पोषक तत्त्वों की कमी पाया गया है.

शारीरिक विकास के लिए

दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के नियोनेटोलौजिस्ट, डा. सतीश सलूजा के अनुसार, ‘‘6 से 24 महीने की उम्र के बीच के शिशुओं में कमजोर विकास और संक्रमण होने के मामले सब से ज्यादा आते हैं और इस का कारण उन्हें सही पोषण न मिलना है.

शिशुओं के सामान्य विकास के लिए सही मात्रा में विटामिन और मिनरल डाइट देना बहुत जरूरी है. 5 साल से कम उम्र के शिशुओं में निमोनिया, डायरिया, खसरा और मलेरिया होने की मुख्य वजह कुपोषण है.’’

अगर किसी भी शिशु को शुरुआती 1000 दिनों के दौरान पोषक तत्त्वों से युक्त आहार दिया जाए तो उस का बेहतर शारीरिक विकास होता है और उस की सोचने व याद करने की क्षमता में भी वृद्धि होती है. इतना ही नहीं वह बच्चा वयस्क होने पर कम बीमार होता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि जब शिशु स्तनपान से ठोस आहार की ओर बढ़ता है तो उसे माइक्रोन्यूट्रिएंट देने का गैप सब से ज्यादा होता है, क्योंकि उस की जरूरतें बढ़ती हैं, पर उसी दौरान उसे पोषक आहार देना कम होता जाता है.

ध्यान दें

डा. सतीश सलूजा के अनुसार, ‘‘6 महीने की उम्र के बाद शिशुओं में पोषक तत्त्वों की कमी न हो, इसके लिए जरूरी है कि इस उम्र में उन्हें भरपूर पोषक तत्त्व दिए जाएं. इस उम्र में शिशओं के स्तनपान के साथ पोषक तत्त्वों से युक्त आहार (विटामिन, मिनरल, फोर्टीफाइड अनाज/भोजन, आयरन, मल्टी विटामिन ड्रौप सप्लिमैंट) दिया जाना चाहिए.’’