गृहशोभा विशेष

अनुसंधान तथा सर्वेक्षण से यह ज्ञात हो गया है कि 5% पुरुष एजुस्पर्मिक होते हैं, यानी उन के वीर्य में शुक्राणु होते ही नहीं. इस स्थिति को एजुस्पर्मिया कहा जाता है. दूसरी ओर, जब शुक्राणु की संख्या सामान्य से कम होती है, तो उसे ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है. इन दोनों परिस्थितियों वाले पुरुषों के जरिए सामान्यतया प्रैग्नैंसी की संभावना नहीं होती, क्योंकि वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या 60-120 मिलियन प्रति मि.ली. के बीच होनी चाहिए.

यहां यह बता दें कि वीर्य परीक्षण में शुक्राणुओं के नहीं पाए जाने का यह अर्थ कदापि नहीं होता कि अंडकोष में स्पर्म का निर्माण हो ही नहीं रहा है या कभी होगा ही नहीं. वीर्य में स्पर्म की कमी या नहीं पाए जाने के कई कारण हो सकते हैं. अधिकतर स्थितियों में उन के कारणों का इलाज करा देने के बाद शुक्राणुओं की संख्या सामान्य हो जाती है और पुरुष पिता बनने की स्थिति में आ जाता है.

शुक्राणुओं की कमी के कई कारण हो सकते हैं. जैसे, ऐसा हो सकता है कि अंडकोष की कोशिकाओं में शुक्राणु निर्माण की पर्याप्त क्षमता हो पर सहायक हारमोन के स्राव में कमी से निर्माण नहीं हो पा रहा हो या यह भी हो सकता है कि अंडकोष में इन का निर्माण पर्याप्त संख्या में हो रहा हो, पर संवहन नलिकाओं में गड़बड़ी या अवरोध के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे हों और अंडकोष या संग्राहक थैली में ही जमा हो जाते हों. एक तीसरी संभावना यह भी हो सकती है कि सहवास के दौरान लिंग द्वारा स्खलन के बजाय वीर्य पीछे की ओर स्थित मूत्र थैली में चला जाता हो और शुक्राणु गर्भाशय में जाने से वंचित रह जाते हों.

ऐसा क्यों होता है

शुक्राणुओं के निर्माण में आने वाली इन बाधाओं के कई कारण हो सकते हैं, जिन में हारमोन के स्राव की समस्या, टेस्टिकुलर फेल्योर, टेस्टिस में सप्लाई करने वाली रक्त नलियों में सूजन तथा संक्रमण आदि प्रमुख हैं.

मस्तिष्क में स्थित एक विशेष ग्रंथि, जिसे पिट्यूटरी ग्लैंड कहते हैं, से एक विशेष हारमोन, जिसे फौलिकल स्टिमुलेटिंग हारमोन कहते हैं, का स्राव होता है जो रक्त के माध्यम से टेस्टिस में पहुंच कर उस की कोशिकाओं को शुक्राणुओं का निर्माण करने के लिए प्रेरित करता है. इस में किसी तरह की गड़बड़ी या इस के स्राव में कमी हो जाने की वजह से शुक्राणुओं का निर्माण प्रभावित होता है. अंडकोष को सप्लाई करने वाली रक्त नलियों में किसी कारणवश सूजन हो जाने की स्थिति में भी कई बार स्पर्म का निर्माण प्रभावित होता है.

जननांगों में संक्रामक रोग, जैसे मंप, टी.बी. गुप्त रोग की वजह से भी टेस्टिस की सामान्य क्रियाशीलता प्रभावित होती है. यह सिकुड़ कर छोटा हो जाता है, जिस से शुक्राणुओं का निर्माण बाधित हो जाता है. अत्यधिक धूम्रपान, खैनी, जरदा, सिगरेट, शराब, गुटका आदि का सेवन करने वालों में भी इस तरह की कमी आमतौर पर देखने को मिलती है. जननांगों में संक्रमण से भी प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है. ई.कोलाई, टी.बी., विषाणु, गुप्त रोग के कारण भी प्रजनन तथा शुक्राणु निर्माण की क्षमता प्रभावित होती है.

पर्याप्त संख्या में शुक्राणुओं के निर्माण के लिए यह भी जरूरी है कि अंडकोष अपनी सही पोजिशन में हो तथा उस का तापमान शारीरिक तापमान से कम हो. इस में थोड़ी सी भी गड़बड़ी होने से इस से शुक्राणु निर्माण में बाधा होती है. वे पुरुष, जो गरम जगहों पर काम करते हैं, जैसे ब्लास्ट फर्नेस, फायर एरिया, अंडरग्राउंड खदान, जहां का तापमान ज्यादा होता है, उन में इस तरह की शिकायत आमतौर पर देखने को मिलती है. जो पुरुष टाइट अंडरपैंट पहनते हैं या जिन्हें रक्त नलियों में सूजन की बीमारी होती है, उन में भी इस तरह की शिकायत देखने को मिल सकती है. टेस्टिस में रचनागत खराबी, टी.बी., गुप्त रोग, चोट लगने, संक्रमण या फिर सूजन हो जाने की स्थिति में भी इस तरह की समस्या देखने को मिल सकती है. शुक्राणुओं को वहन करने वाली नालियों में अवरोध या विकृति आ जाने की स्थिति में, जैसे हर्निया के औपरेशन के बाद उस से बनने वाले निशान से भी कई बार इस तरह की दिक्कतें आ सकती हैं.

पुरानी बीमारियों के कारण अंडकोष में कई बार अवांछित विषैले पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है, जिसे ऐंटीबौडी कहते हैं. यह शुक्राणुओं के साथ चिपक कर उन की गतिशीलता को प्रभावित करता है. इस की वजह से कई शुक्राणु आपस में चिपक कर बेकार हो जाते हैं.

कई बार ऐसा होता है कि टेस्टिस में कोई गड़बड़ी नहीं होती, फिर भी वीर्य में शुक्राणु नहीं पाए जाते. ऐसी स्थिति में यह पता लगाना जरूरी हो जाता है कि कहीं इस के संवहन के रास्ते में किसी तरह की गड़बड़ी तो नहीं है.

इस की मुख्यतया 2 वजहें होती हैं- डक्ट सिस्टम तथा इजेकुलेशन की प्रक्रिया में गड़बड़ी. स्पर्म कैरियर डक्ट नहीं होने या इस के ब्लाक होने के कारण स्पर्म आगे की ओर नहीं  बढ़ पाते हैं. ऐसा वास डिफरेंस नामक नली में जन्मजात खराबी होने या फिर इपिडिडाइमिस, प्रोस्टेट और सेमिनल वैजाइकल में संक्रमण के कारण होने वाली रुकावट की वजह से हो सकता है. कई बार हर्निया या फिर हाइड्रोसील के कारण भी इस में खराबी आ जाती है.

अब आइए जानें कि शुक्राणुओं के इजेकुलेशन की राह में कौनकौन सी समस्याएं हो सकती हैं? सहवास के दौरान इजेकुलेशन के पहले वीर्य को युरेथ्रा में जमा होना जरूरी है. लेकिन कई बार तंत्रिकातंत्र में गड़बड़ी होने के कारण ऐसा हो नहीं पाता. यह समस्या प्रजनन अंगों की सर्जरी, डायबिटीज या फिर रीढ़ की हड्डी में चोट लगने की वजह से हो सकती है. कई बार कई तरह की दूसरी समस्याएं आने के कारण वीर्य आगे की ओर न जा कर पीछे की राह पकड़ लेता है. वह मूत्र थैली में जमा होने लगता है और पेशाब के साथ बाहर निकल जाता है.

एजुस्पर्मिक पुरुष भी बन सकते हैं पिता

आज जमाना बदल चुका है और विज्ञान ने काफी तरक्की कर ली है. बांझपन को भी दूर करने के ऐसेऐसे उपाय निकल गए हैं, जिन की पहले कल्पना नहीं की जा सकती थी. इसलिए ऐसे लोगों को घबराने या निराश होने की जरूरत नहीं है. ऐसे दंपती को सब से पहले किसी अच्छे अस्पताल में अपनी पूरी जांच करानी चाहिए. पूरी तहकीकात कर उन्हें ऐसे संस्थानों में जाना चाहिए, जहां इस तरह की समस्या की जांच और इलाज की उच्च स्तरीय व्यवस्था हो.

जांच के दौरान यदि हारमोन संबंधी किसी भी तरह की गड़बड़ी होती है, तो इस के लिए दवा दे कर इस के लेवल को बढ़ाया जाता है. यदि टेस्टिस में किसी तरह का ट्यूमर, सिस्ट या किसी तरह की रचनागत खराबी होती है, तो औपरेशन द्वारा इसे ठीक किया जाता है. कई बार इस में संक्रमण होने के कारण भी कई तरह के विकार उत्पन्न हो जाते हैं, जिस को ऐंटिबायोटिक्स या दूसरी दवाएं दे कर ठीक किया जाता है. शुक्राणुओं को संवहन करने वाली नलियों में विकार होने की स्थिति में उसे रिप्रोडक्टिव सर्जरी के द्वारा ठीक किया जाता है.

कई बार ऐसा होता है कि वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या अत्यधिक कम होती है और वह टेस्टिस में ही जमा होता है. ऐसी स्थिति में माइक्रो सर्जरी के द्वारा वहां से निकाल कर लैब में कृत्रिम विधि से ओवम में इंजेक्ट कर के फर्टिलाइजेशन कराया जाता है और फिर उसे फैलोपियन ट्यूब में प्रतिस्थापित कर दिया जाता है. इस विधि को इंट्रा साइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंसेमिनेशन कहते हैं. कई बार वीर्य में अवांछित तत्त्व होने के कारण ट्यूब में फर्टिलाइजेशन की क्रिया संपन्न नहीं हो पाती है.ऐसी स्थिति में स्पर्मवाश कर इन विट्रो फर्टिलाइजेशन विधि से ट्यूब या यूटरस में प्रतिस्थापित कर दिया जाता है.

यदि किसी कारणवश किसी मरीज में शुक्राणु एकदम से बनता ही नहीं हो, तो उस के भी उपाय चिकित्सा विज्ञान ने ढूंढ़ निकाले हैं, जिस में डोनर स्पर्म की सहायता से आर्टिफिशियल इंसेमिनेशन विधि या फिर आई.वी.एफ. की सहायता से कृत्रिम गर्भाधान कराया जा सकता है और संतान की कमी को दूर किया जा सकता है.

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