सवाल
मेरी उम्र 34 वर्ष है. मेरा एक 5 साल का बेटा भी है. मुझे पीरियड्स के बाद हलका गाढ़ा सफेद पानी जैसा डिस्चार्ज होता था. बारबार पेशाब के लिए जाना पड़ता था. डाक्टर को दिखाने पर पता चला कि चावल के दाने बराबर पथरी की शिकायत है, जिस का इलाज चल रहा है. इस के ठीक होने के बाद मैं दोबारा मां बनना चाहती हूं. लेकिन जब मेरा बेटा डेढ़ साल का था तब मैं ने गर्भपात करा लिया था. तभी से गर्भधारण नहीं हुआ. मैं जल्द दूसरा बच्चा चाहती हूं. दोबारा मां बनने के लिए मैं किस तरह का इलाज करा सकती हूं? मेरा पहला बच्चा औपरेशन से हुआ था.

जवाब
आप अभी गर्भधारण कर सकती हैं. लेकिन बेहतर होगा कि पहले पथरी निकल जाए ताकि सुरक्षित गर्भधारण हो सके. हो सकता है कि आप की फैलोपियन ट्यूब ब्लौक हो गई हो. जिस की वजह से आप गर्भपात के बाद गर्भधारण नहीं कर पा रही हैं. इसलिए आप को एक एक्सरे, जिसे एचएसजी कहते हैं, कराना चाहिए. इस से पता चल जाएगा कि आप को लैप्रोस्कोपी की जरूरत है या आईवीएफ की.

अपने पति के सीमन की भी जांच करवाएं. यदि रिपोर्ट सामान्य है व आप की फैलोपियन ट्यूब पेटैंट है तो इंट्रायूट्रीन इंसेमिनेशन करवा सकती हैं. इस को करवाने में ज्यादा खर्च नहीं आता. 3 से 6 साइकिल में यह पूरा हो जाता है. यदि आईयूआई टैस्ट फेल हो जाए तब आप आईवीएफ की तरफ जा सकती हैं और एक खास बात कि आप अपना इलाज किसी अच्छे फर्टिलिटी सैंटर में ही करवाएं.

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मासिकधर्म से जुड़े अंधविश्वासों को दूर करना जरूरी है

कितनी हैरानी की बात है कि एक तरफ तो हम चांद तक पहुंच चुके हैं और दूसरी ओर आज भी मासिकधर्म पर अंधविश्वास का काला साया मंडरा रहा है. मासिकधर्म किसी भी लड़की या महिला के लिए प्राकृतिक रूप से स्वस्थ होने का संकेत है, लेकिन उसे शर्मसार होने की घटना माना जाता है. उस के बारे में खुल कर बात करने को बेशर्मी माना जाता है. उस के बारे में चोरीछिपे बात की जाती है.

खुल कर बात हो

मासिकधर्म से जुड़े इन्हीं टैबूज को दूर करने की जरूरत पर साथिया फाउंडेशन की फाउंडर डा. प्रीति वर्मा का कहना है कि औरत से जुड़ी इस समस्या पर खुल कर बात की जाए, उस के दर्द को महसूस किया जाए और चुप्पी को तोड़ा जाए. मासिकधर्म को अंधविश्वासों से निकालने के लगातार प्रयास करना जरूरी है.

आज भी समाज में इसे अपवित्र माना जाता है और इस के बारे में लोग बात करने तक से झिझकते हैं. अकसर लड़की को पहली बार मासिकधर्म शुरू होता है तो वह चुपचुप हो जाती है. उसे लगता है कि उसे कोई बीमारी हो गई है. तब उसे बताना होता है कि वह बीमार होने की नहीं वरन स्वस्थ होने की निशानी है. गांवों व पिछड़े क्षेत्रों की लड़कियां इस न एक दर्द, एक परेशानी से गुजरती हैं और कोई उन की उस परेशानी में साझीदार नहीं होता.

डरती हैं लड़कियां

प्रीति आगे बताती हैं कि मासिकधर्म को ले कर आज भी जागरूकता न के बराबर है. लड़कियां दाग से डरती हैं. इस दौरान स्कूल जाना तक छोड़ देती हैं, जिस से उन की पढ़ाईलिखाई का नुकसान होता है. उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 28 लाख किशोरियां मासिकधर्म के कारण स्कूल नहीं जाती हैं. इस दौरान अस्वच्छता के चलते वे पेरिवल संक्रमण, सूजन व दर्द से परेशान रहती हैं. जिन के बारे में उन्हें न तो कोई जानकारी देता है न उन की मदद करता है. उन के पास नैपकिन खरीदने तक के पैसे नहीं होते. वे ऐसे गंदे कपड़े का प्रयोग करती हैं, जिस का प्रयोग कोई साफसफाई के लिए भी नहीं करेगा. इस कपड़े को वे घर में छिपा कर रखती हैं. धूप में, खुले में सुखाए बिना कपड़ा इन्फैक्टेड हो जाता है और वैजाइनल फंगल इनफैक्शन व सर्वाइकल कैंसर का कारण बनता है, क्योंकि गीले कपड़े में मौइश्चर रहने से उस में बैक्टीरिया पनपने के अधिक चांसेज होते हैं.

परेशानी को सामने लाना

डा. प्रीति वर्मा का कहना है कि भारत में आज भी मासिकधर्म और इस से जुड़ी हर बात एक टैबू है. इस से जुड़े अनेक अंधविश्वास और मिथक हैं, जिन के बारे में लोग बात ही नहीं करना चाहते. पढ़ीलिखी लड़कियों, महिलाओं को आज भी वैजाइनल वाशिंग टैकनीक की जानकारी नहीं है. वे नहीं जानतीं कि सैनिटरी पैड कितने समय बाद बदलना चाहिए. वे नहीं जानतीं कि वाशिंग हमेशा आगे से पीछे की ओर करनी चाहिए ताकि ऐनस से बैक्टीरिया वैजाइना की तरफ न आए. कुछ लोग यह भी मानते हैं कि मासिकधर्म के दौरान सैक्स करने पर महिला प्रैगनैंट नहीं हो सकती. साथ ही मासिकधर्म के दौरान लड़कियों, महिलाओं के न नहाने, न पूजा करने, न खाना बनाने का अंधविश्वास अभी भी व्याप्त है. इस दौरान उन्हें अछूत माना जाता है.

साथिया फाउंडेशन का एकमात्र उद्देश्य महिलाओं, लड़कियों के उस दर्द, उस परेशानी को लोगों के सामने लाना है जो वे सैनिटरी नैपकिन के अभाव में झेल रही हैं.