सीख

9 January 2017
सीख

जया नहा धो कर तैयार हुई, माथे तक घूंघट किया, फिर धीरेधीरे सीढि़यां उतर कर नीचे आ गई. आते ही मम्मीजी के पैर छूने के लिए जैसे ही झुकी, वैसे ही मम्मीजी ने हाथ पकड़ कर ऊपर उठा लिया.

‘‘पैर छूना पुरानी बातें हैं, दिल में इज्जत होनी चाहिए, इतना ही काफी है और ये घूंघट क्यों बना लिया है?’’ और मम्मीजी ने जया के सिर से घूंघट उठा दिया.

‘‘मेज पर नाश्ता लग गया है, सब लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. चलो, नाश्ता कर लो,’’  मम्मीजी ने प्यार से कहा.

जया ने अपनी भाभियों को ससुर व जेठ के साथ बराबर बैठ कर खातेपीते नहीं देखा था. पहले तो वह थोड़ी सी झिझकी फिर जा कर एक कुरसी पर बैठ गई.

पापाजी ने एक पकौड़ी का टुकड़ा मुंह में रखा और कहने लगे कि शंभू ने पकौडि़यां ठंडी कर दी हैं.

 

जया कुरसी से उठी और पकौडि़यों की प्लेट किचन में ले गई. कड़ाही आंच पर चढ़ा कर पकौडि़यां गरम कर लाई. पापाजी खुश हो गए.

‘‘घनश्याम घंटा भर पहले पानी फ्रिज से निकाल कर जग भर के रख देता है, जब तक खाओपियो पानी गरम होने लगता है,’’  विपिन ने कहा.

जया ने पानी का जग उठाया, उस का पानी बालटी में उड़ेल कर फ्रिज से बोतल निकाल कर जग में ठंडा पानी भर मेज पर रख दिया.

‘‘भाभी, इतने नौकर घूम रहे हैं, किसी नौकर को आवाज दे देतीं, आप खुद क्यों दौड़ रही हैं?’’ विभा ने भौंहें सिकोड़ कर कहा.

सुधीर पहले दिन से ही जया को मिडिल क्लास मेंटैलिटी का मान कर कुपित था और आज जया के बारबार खुद उठ कर नौकरानी की तरह भागने से मन ही मन क्रोधित हो रहा था. अत: विभा की बात समाप्त करते ही सुधीर फूट पड़ा, ‘‘अपने घर में  नौकरचाकर देखे हों तो नौकरों से काम लेना आए.’’

जया सहम गई, उसे याद आया मां ने चलतेचलते समझाया था, ‘‘घर में चाहे कितने भी नौकरचाकर हों, अपने परिवार वालों का अपने हाथों से परोसनेखिलाने से प्यार बढ़ता है, बड़ों का सम्मान होता है.’’

सुधीर का ताना सुन कर जया की आंखों में आंसू आ गए. उसे पता ही नहीं चला कि उस ने क्या खाया. सब लोग उठे तो वह भी धीरे से उठ कर कमरे में चली गई.

जया को ब्याह कर ससुराल आए 2 हफ्ते हो गए थे. वह अपने पति सुधीर के साथ एडजस्ट नहीं कर पा रही थी. एक दिन सुधीर के कुछ दोस्त आने वाले थे. जया ने किचन में जा कर मठरियां सेंक कर रख दीं. हलवा बना कर हौटकेस में रख दिया. नौकर से समोसे बाहर से लाने को कह कर जैसे ही बाहर निकली, वैसे ही एकसाथ कई आवाजें सुनाई दीं कि भाभीजी हम लोग आप से मिलने आए हैं, आप कहां छिप कर बैठ गईं?

जया धीरे से बाहर निकली और नमस्ते कर के सीटिंगरूम में एक कुरसी पर बैठ गई.

‘‘वाह भाभीजी, हम लोग यह सोच कर आए थे, कुछ अपनी कहेंगे, कुछ आप की सुनेंगे, मगर आप तो छुईमुई की तरह सिमटीसिकुड़ी चुपचाप बैठी हैं,’’ सुनील ने कहा.

‘‘छुईमुई तो हाथ लगने से सिकुड़ती है, भाभीजी तो हमारी आवाज से ही सिकुड़ गईं,’’ जतिन ने हंसते हुए जोड़ा.

‘‘भाभीजी नईनवेली दुलहन हैं, इतनी जल्दी कैसे खुल जाएंगी?’’  ललित हंस कर बोला. तभी घनश्याम ने चायनाश्ते की ट्रे ला कर मेज पर रख दी.

‘‘हलवा कितना लजीज बना है,’’  सुनील ने 1 चम्मच हलवा मुंह में रखते ही कहा, ‘‘और मठरियां कितनी खस्ता है, लगता है सारा सामान भाभीजी ने ही बनाया है,’’ ललित ने मठरी तोड़ते हुए कहा.

परंतु सुधीर ने अपने मन की भड़ास निकालते हुए जया को ताना दिया, ‘‘इन्हें चौकाचूल्हे के सिवा और आता ही क्या है?’’

‘‘अच्छा भाभीजी, आप को चौकाचूल्हे के सिवा और कुछ नहीं आता?’’ कहतेकहते सब लोग ठहाका मार कर हंस पड़े. जया का मन झनझना उठा.

माहौल को सामान्य बनाने के उद्देश्य से प्रियंक बोला, ‘‘भाभीजी, सुना है आप के गांव के पास शारदा डैम बन गया है और वह बहुत रमणीय स्थल बन गया है. आप हम लोगों को बुलाइए, हम लोग पिकनिक मनाएंगे, डैम में जल विहार करेंगे, बड़ा मजा आएगा. सुधीर, चलने का प्रोग्राम बनाओ.’’

‘‘हां, इन के पिताजी के खेतखलिहान भी देख लेना,’’ सुधीर को जया पर कटाक्ष करने की आदत सी पड़ गई थी.

‘‘हांहां, आप लोग अवश्य आइए. आप लोग बड़े शहर में रहते हैं, आप ने गांव नहीं देखे होंगे. आप को वे अजीबोगरीब लगेंगे,’’ जया का स्वर हलका सा कठोर हो गया था.

‘‘क्या भाभीजी आप के गांव में बैलगाड़ी से आतेजाते हैं?’’ सुनील ने कुछ अज्ञानतावश तो कुछ व्यंग्यपूर्वक पूछा.

‘‘नहीं भाई साहब, हम लोग कसबे में रहते हैं, गांव में हमारा फार्म है, पिताजी के पास जीप है, पिताजी जीप से फार्म देखने जाते हैं, अगर खुद जा कर न देखें तो नौकरचाकर भट्ठा बैठा दें,’’ जया के स्वर में दृढ़ता थी.

थोड़ी देर गपशप कर के दोस्त तो चले गए, परंतु सुधीर का असंतोष उस के चेहरे से साफ झलक रहा था.

जया अपने कमरे में चली गई, जहां से उस ने सुना, सुधीर मां के पास बैठा  बड़बड़ा रहा था, ‘‘मां, आप ने कितने दकियानूसी परिवार की लड़की मेरे गले बांध दी. आखिर मुझ में क्या कमी है? स्मार्ट हूं, ऊंची पोस्ट पर हूं, मेरे कालेज की कितनी लड़कियां मुझ से शादी करने को तैयार थीं, परंतु आप की जिद के आगे मैं झुक गया.

जया कितनी पिछड़ी है, न उठनेबैठने की तमीज है न बोलने का सलीका, चार लोग आए तो सिमटसिकुड़ कर बैठ गई. बोली तो ऐसे बोली मानो पत्थर मार रही हो.

‘‘उस दिन एक दोस्त के बेटे के बर्थडे में गया, तो सब लड़कियां तालियां बजाबजा कर हैप्पी बर्थडे गा रही थीं, यह मुंह लटकाए चुपचाप खड़ी थी. कपड़े पहनने की तमीज नहीं, सर्दी में शिफान और गरमियों में सिल्क पहन कर चल देती है. एक हाई हील के सैंडल ला कर दिए तो पहन कर चलते ही गिर पड़ी. मुझे तो बहुत शर्म आती है. मेरे दोस्त अरुण की शादी अभी हाल ही में हुई है, उस की बीवी कितनी स्मार्ट है, फर्राटे से अंगरेजी बोलती है अरुण बता रहा था, लेडीज संगीत में उस की छोटी बहन ने उसे जबरदस्ती खड़ा कर दिया तो उस ने इतना अच्छा डांस किया कि सब लोग वाहवाह कर उठे.’’

 

सुधीर गुस्से से कहता चला जा रहा था कि मां ने बीच में टोका, ‘‘बेटा, वे लड़कियां फर्राटे से अंगरेजी बोल लेती हैं, बढि़या डांस कर लेती हैं, परंतु घरगृहस्थी के काम में अकसर उन्हें कुछ नहीं आता है. अंगरेजी बोल लेना, नाच लेना थोड़े दिनों की चकाचौंध है, बाद में घरगृहस्थी ही काम आती है. सामने त्रिपाठीजी के बेटे की बहू को देखते हो, स्मार्ट है, फर्राटे की अंगरेजी बोलती है, संगीत में प्रभाकर की डिगरी ले रखी है, परंतु मिसेज त्रिपाठी दिन भर काम में जुटी रहती हैं, बहूरानी कमरे में पलंग पर लेट कर स्टीरियो सुनती रहती हैं- न सास की लाज न ससुर की इज्जत. जया सुंदर है, पढ़ीलिखी है, घरेलू वातावरण में पलीबढ़ी है, शहर में रह कर सब सीख जाएगी,’’ मां ने सुधीर को समझाते हुए कहा.

‘‘मां, घरगृहस्थी का काम तो एक अनपढ़ लड़की भी कर लेती है. इतना तो मैं कमा ही लेता हूं कि घरगृहस्थी के काम के लिए एक नौकर रख सकता हूं. आजकल शहरों में जगहजगह रेस्टोरेंट व होटल खुल गए हैं, फोन कर दो, मनपसंद खाना घर बैठे आ जाएगा. कुछ सोशल लाइफ भी तो होती है.’’

सुधीर की बातें जया कमरे से सुन रही थी.  उस का एकएक शब्द उस का मन चीरता चला जा रहा था. जया को अपनी मां पर भी क्रोध आया कि उन्होंने कितने पुराने संस्कारों में उसे ढाल दिया. उस ने महिला कालेज से बी.ए. पास किया था और साइकोलोजी से एम.ए. करना चाहती थी. साइकोलोजी केवल क्राइस्टचर्च कालेज में पढ़ाई जाती थी, जहां सहशिक्षा थी. लड़केलड़कियां एकसाथ पढ़ते थे. मां कितनी मुश्किल से क्राइस्टचर्च में एडमिशन के लिए तैयार हुई थीं.

जया कालेज जाती थी मां तो हिदायतों की पूरी की पूरी लिस्ट उसे दे देती थी. कि लड़कों के पास मत बैठना, लड़कों से बात मत करना, अगर कुछ पूछना जरूरी हो तो नीचे नजर डाल कर धीरे से बोलना.

मां ने कितने उदाहरण दे डाले थे कि सीधीसादी लड़कियों को कालेज के लड़के बरगला कर गलत रास्ते पर ले जाते हैं. लाइब्रेरी में लड़कों के साथ बैठ कर पढ़ने की इजाजत मां ने कभी नहीं दी. इसी कारण उस का एम.ए. का डिवीजन बिगड़ गया था. मां ने घर से अकेले कभी निकलने ही नहीं दिया.

एक दिन मां के साथ वह पिक्चर देखने गई थी. उस के पास एक लंबी लड़की बौय कट बालों में जींस पहने बैठी थी. अंधेरे में मां को शक हुआ कि यह लड़का है. मां उचकउचक कर देखने लगीं तो उसे थोड़ा गुस्सा आ गया और ‘यह लड़का नहीं लड़की है’, उस के मुंह से चिल्लाहट भरे स्वर ऐसे निकले कि आसपास के लोग उन्हें घूरघूर कर देखने लगे.

मां तो आश्वस्त हो कर बैठ गई थीं, परंतु उस का मन पिक्चर में फिर न लग सका था. अगर इतने पुराने संस्कारों में पाला था तो इतने एडवांस घर में उस की शादी क्यों कर दी, जहां शालीनता को मूर्खता समझा जाता?

एक दिन मां कह रही थी कि तुम्हारे पिताजी चाहते थे कि उन की बेटी की शादी बड़े घर में हो, जहां नौकरचाकर, कार व बंगला जाते ही मिल जाए.

मां की कितनी निर्मूल धारणा है. ऐसे बड़े घर का क्या करना, जहां भौतिक सुख की सारी सुविधाएं हों, परंतु मन को एक पल भी चैन न मिले.

एक शाम कपड़े पहन कर तैयार हो कर सुधीर कहीं जा रहा था. उस ने इतना ही पूछ लिया था, ‘‘कहां जाने की तैयारी है?’’

सुधीर कितनी जोर से बिगड़ पड़ा था,

‘‘मैं कहां जाता हूं, कहां उठताबैठता हूं, किस से बात करता हूं, इस में तुम हर समय टांग अड़ाने वाली कौन होती हो? तुम्हें हाई सोसाइटी में उठनेबैठने की तमीज नहीं है, तो क्या मैं भी उठनाबैठना बंद कर दूं?’’

 

जया के संस्कार परंपरागत अवश्य थे, परंतु उस का व्यक्तित्व स्वाभिमानी था. रोजरोज का अपरोक्ष तिरस्कार तो वह किसी प्रकार सहन कर लेती थी, पर इस अनावश्यक प्रताड़ना से उस के मन में विद्रोह जाग उठा. उस ने सोच लिया कि वह अपने को बदल कर सुधीर को सीख जरूर देगी.

अगले जाड़ों में दिल्ली में उस की सहेली लता की बहन की शादी थी. उस ने शादी के निमंत्रणपत्र के साथ मम्मीजी के नाम एक विनयपूर्वक पत्र भी लिखा था, जया को इस विवाह समारोह में सम्मिलित होने की आज्ञा दे दें.

मम्मीजी ने पत्र सुधीर को दिखाया. सुधीर के पास छुट्टी नहीं थी और जया के

प्रति उस के मन में ऐसी खटास थी कि उसे जया से कुछ दिन दूरी की बात राहत देने वाली ही लगी. उस ने उसे अकेले चले जाने को तुरंत कह दिया. जाने के लिए निश्चित हुए दिन सुधीर जया को फर्स्ट क्लास एसी में ट्रेन में बैठा आया. ट्रेन के चलते ही जया ने भी एक स्वतंत्रता की सांस ली. उस के मन में स्फूर्ति भरती जा रही थी. रास्ते के दृश्य उसे बहुत सुहावने लग रहे थे.

नई दिल्ली स्टेशन पर उस की सहेली लता व उस के पति शैलेंद्र उसे लेने आए थे. जया के ट्रेन से उतरते ही लता जया से लिपट गई. कालेज छोड़ने के एक अरसे बाद दोनों सहेलियां आपस में मिल रही थीं.

लता के घर पहुंच कर जया को लगा कि वह किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गई है. विवाह हेतु घर की सज्जा सुरुचिपूर्ण थी.

दूसरे दिन बरात आने वाली थी. केले के पत्तों व फूलों से सजाया गया था. बाहर पंडाल में बरातियों के बैठने व खानेपीने की व्यवस्था थी. मेहमानों से घर भरा था, बरात मेरठ से दिल्ली आ रही थी.

दूसरे दिन शाम को बरात खूब धूमधाम से चढ़ी. दूल्हा पक्ष के लड़कों व कन्या पक्ष की लड़कियों में खूब हंसीमजाक चल रहा था. हंसी के फुहारे छूट रहे थे. जया इस प्रकार के खुलेपन को आश्चर्य से देख रही थी. रात में विवाह हुआ, दूसरे दिन अपराह्न को बरात विदा होने वाली थी. सुबह चायनाश्ते के बाद वर पक्ष की कुछ चुलबुली लड़कियों ने कन्या पक्ष के कुछ मनचले लड़कों को घेर लिया. लच्छेदार मीठीमीठी बातें कीं और शहर घुमाने का प्रोग्राम बना डाला.

लड़कियां लड़कों के साथ खूब घूमीं, पिक्चर देखी और रेस्टोरेंट में खायापिया.

बाद में लड़कों को अंगूठा दिखा कर बरातियों में आ मिलीं. जया ने आश्चर्यपूर्वक सुना कि लड़कियां आपस में ठहाके लगा रही थीं, ‘बड़े मजनू बनने चले थे, 2-4 हजार रुपयों के चक्कर में तो आ ही गए होंगे. सब को याद रहेंगी मेरठ की लड़कियां.’ अब जया सुधीर की तथाकथित स्मार्टनेस का मतलब समझ रही थी.

बरात विदा होने के दूसरे दिन जया का वापस जाने का प्रोग्राम था, परंतु लता ने मम्मीजी को फोन कर के जया को कुछ दिन रोकने का आग्रह किया तो मम्मीजी मान गई. दो दिन में सब मेहमान विदा हो गए.

अब जया को सुधीर के कटाक्ष रहरह कर याद आने लगे थे और उन्हें सीख देने

की उस की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. लता के साथ जया ने कनाट प्लेस जा कर जींस, ट्राउजर, लो कट टौप, कमीज आदि खरीदे. सैलून में जा कर फेशियल कराया और बाल सेट कराए.

 

लता ने उसे बताया कि जींसटौप पहन कर जया खूब सुंदर व मौडर्न लग रही थी. शाम को लता के साथ जया क्लब गई. क्लब में जब स्त्रीपुरुष एकदूसरे के गले में बांहें डाल कर उन्मुक्त डांस करने लगे, तो कुछ लड़कों ने जया के साथ डांस करने की इच्छा प्रकट की. तब सिरदर्द होने का बहाना बना कर जया अपनी कुरसी पर बैठी रही, परंतु वह डांस करते हुए जोड़ों के हावभाव एवं पदसंचालन को भलीभांति देखती रही. जरूरत पड़ने पर वह सुधीर के सामने डांस भी कर सकने हेतु अपने को तैयार कर रही थी. यह काम लगभग प्रतिदिन चलता रहा.

पहले दिन से ही जया लता की फैमिली में घुलमिल गई थी और जल्द ही उस के भाइयों के साथ उस ने खुल कर बात करना सीख लिया था. जल्द ही आधुनिक सोशल लाइफ लीड करने को उस ने अपने को तैयार कर लिया.

लता के पति शैलेंद्र ने जया को लखनऊ वापस जाने के लिए एसी में बर्थ रिजर्व करा दी.

2 सप्ताह बीत जाने पर लता और शैलेंद्र जया को ट्रेन में बैठा आए.

जया ने बादामी ट्राउजर व मैचिंग टौप पहना हुआ था, उस के घुंघराले बाल कंधों तक लटक रहे थे. चेहरे पर हलका मेकअप था. इस ड्रैस में जया बेहद आकर्षक लग रही थी. ट्रेन में बर्थ पर अधलेटी सी वह इंगलिश का एक नावेल पढ़ने लगी कि दूसरी बर्थ पर एक नवयुवक कब आ गया, उस ने ध्यान ही नहीं दिया.

‘‘आप लखनऊ में ही रहती हैं?’’ आवाज सुन कर जया चौंक गई.

‘‘हां, मैं पिछले कई सालों से लखनऊ में ही हूं,’’ जया ने निर्भीक हो कर उत्तर दिया.

‘‘मेरा नाम विजयेंद्र कुमार शुक्ला है,

आप चाहें तो मुझे विजय कह सकती हैं.

मैं आर्मी में कैप्टन हूं. मेरी पोस्टिंग आजकल देहली में है. मैं 1 महीने की छुट्टी पर अपने घर जा रहा हूं. मेरा घर लखनऊ में गोमतीनगर में है,’’ कहतेकहते विजय ने अपना विजिटिंग कार्ड जया के आगे बढ़ा दिया.

‘‘धन्यवाद,’’ कह कर जया ने कार्ड ले लिया. कैप्टन शुक्ला उसे कुछ बातूनी तो लगा, परंतु उस का बेझिझक एवं निर्भीक व्यवहार अच्छा भी लगा.

‘‘क्या आप का परिचय जान सकता हूं?’’ विजय ने पूछा.

‘‘मैं सीतापुर की रहने वाली हूं, लखनऊ यूनिवर्सिटी से होस्टल में रह कर मैं ने एम.ए. पास किया है. इस समय अपनी बहन के पास निरालानगर में रह कर कंपिटिशन की तैयारी कर रही हूं. इसी सिलसिले में दिल्ली गई थी,’’ जया ने सफेद झूठ बोला था. आज उसे अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाने में बच्चों द्वारा किए जाने वाले खेल जैसा मजा आ रहा था.

‘‘आप से मिल कर बहुत खुशी हुई,’’ विजय ने प्रसन्न मुद्रा में कहा.

‘‘मुझे भी,’’ जया ने मन ही मन मुसकराते हुए उत्तर दिया.

फिर रास्ते में विजय तमाम बातें करता रहा और जया उत्सुकता से सुनती रही. जब लखनऊ स्टेशन आ गया, ट्रेन रुकी तो जया ने सिर उठाया. देखा कि सुधीर डब्बे के पास खड़ा है, उसे लेने आया था.

‘‘विजय, तुम्हारे साथ रास्ता कितनी जल्दी पार हो गया, पता ही नहीं चला,’’ जया ने इतनी जोर से कहा कि सुधीर सुन ले.

‘‘अभी तो 1 महीना लखनऊ में ही हूं, मुलाकातें होती रहनी चाहिए,’’ विजय ने अभी तक सुधीर की तरफ ध्यान नहीं दिया था.

‘‘हां, आप का फोन नंबर पास है, फोन करती रहूंगी, अब तो मिलनाजुलना होता ही रहेगा,’’ जया जानबूझ कर खूब जोरजोर से बोल रही थी.

 

जया ने बड़ी आत्मीयता प्रदर्शित करते हुए विजय से हाथ मिलाया और अटैची हाथ में ले कर खटाखट नीचे उतर गई. सुधीर आश्चर्य से कभी जया को तो कभी विजय को देख रहा था. उस के बोलने की शक्ति समाप्तप्राय हो गई थी.

‘‘अरे भई जल्दी चलो, क्या सोचने लगे? बड़ी गरमी है,’’ प्लेटफार्म पर आते ही जया ने सुधीर का हाथ खींचते हुए कहा.

सुधीर की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. जया के रंगढंग देख कर वह भौचक्का हो रहा था. चुपचाप चल दिया और जया के साथ कार में बैठ कर घर आ गया.

‘‘जया बेटी, 2 हफ्ते में तुम इतनी बदल गई?’’ मम्मीजी ने जया को देख कर आश्चर्य से कहा.

‘‘और मम्मी इन से पूछो कि ट्रेन में इन के साथ वह कौन युवक था, जिस से ये हंसहंस कर बातें कर रही थीं और हाथ मिला कर फिर मिलने का वादा कर के आई हैं,’’ सुधीर गुस्से में बोला.

‘‘अरे मम्मीजी, वे विजय थे, आर्मी में कैप्टन हैं और देहली में पोस्टेड हैं. यहां गोमतीनगर में अपने घर 1 महीने की छुट्टी पर आए हैं. मम्मीजी, वे एक चित्रकार भी हैं, अपनी बनाई हुई कितनी सुंदर पेंटिंग उन्होंने मुझे प्रैजेंट की है. वे प्रतिभावान होने के साथसाथ बहुत सोशल भी हैं, उन के साथ रास्ता कब कट गया, पता ही नहीं चला,’’ यह कहते हुए जया ने कनाट प्लेस से खरीदी हुई एक पेंटिंग मम्मीजी के सामने रख दी.

‘‘अच्छा तो अब आप उन का प्रैजेंट भी लेने लगीं?’’ सुधीर अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था.

‘‘अरे भई, पत्नी तो हम आप की ही रहेंगी. घड़ी दो घड़ी किसी से हंसबोल कर मन बहला लिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?’’ जया ने सुधीर द्वारा कहे शब्दों को दोहरा दिया.

सुधीर गुस्से से पागल हो रहा था, उस से आगे कुछ बोला नहीं गया, वह उठ कर दूसरे कमरे में चला गया.

‘‘जया बेटी, शंभू ने खाना मेज पर लगा दिया है, नहाधो कर कपड़े चेंज कर लो, फिर कुछ खापी लो,’’ मम्मीजी ने उस समय बात को टालते हुए कहा.

जया बाथरूम में चली गई. नहाधो कर साड़ी पहन कर बाहर निकली. तब मम्मीजी उस की ओर देख कर बोलीं, ‘‘जया, साड़ी पहन कर तुम कितनी सुंदर लगती हो, ये मौडर्न कपड़े अपनी बहूबेटियों को शोभा नहीं देते. अपने देश का पहनावा तो साड़ी ही है.’’

‘‘मम्मीजी, मेरी समझ में नहीं आता मैं उन को कैसे खुश करूं? इतने दिनों से वे मुझे दकियानूसी, अनसोशल कहते रहे और अब जब कुछ नया सीखा है तो भी खुश नहीं हैं,’’ जया ने अपने मन की बात कही.

सुधीर आज जया को विजय के साथ घुलमिल कर बोलते देख कर उद्विग्न था और बगल के कमरे में उस की और मम्मी की बातें सुन रहा था. जया की बातें सुन कर वह वहीं आ गया और अपनी सफाई देता हुआ और मम्मी की ओर देखते हुए बोला, ‘‘मम्मी, मेरा मतलब यह थोड़े ही था कि जया जींस और लो कट टौप पहन कर अल्ट्रा मौडर्न बन जाए और गैरमर्दों के साथ दोस्ती करती फिरे.’’

सुधीर का रोंआसा सा मुंह देख कर जया समझ गई कि सुधीर को अपनी गलती का एहसास हो रहा था, ‘‘अच्छा मम्मीजी, मुझे बड़ी भूख लगी है, थोड़ा खापी लूं, तब बात करेंगे,’’ कहतेकहते जया डाइनिंगरूम की ओर चल दी. वह अपनी सफलता पर मन ही मन फूली नहीं समा रही थी.                   

जया नहा धो कर तैयार हुई, माथे तक घूंघट किया, फिर धीरेधीरे सीढि़यां उतर कर नीचे आ गई. आते ही मम्मीजी के पैर छूने के लिए जैसे ही झुकी, वैसे ही मम्मीजी ने हाथ पकड़ कर ऊपर उठा लिया.

‘‘पैर छूना पुरानी बातें हैं, दिल में इज्जत होनी चाहिए, इतना ही काफी है और ये घूंघट क्यों बना लिया है?’’ और मम्मीजी ने जया के सिर से घूंघट उठा दिया.

‘‘मेज पर नाश्ता लग गया है, सब लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. चलो, नाश्ता कर लो,’’  मम्मीजी ने प्यार से कहा.

जया ने अपनी भाभियों को ससुर व जेठ के साथ बराबर बैठ कर खातेपीते नहीं देखा था. पहले तो वह थोड़ी सी झिझकी फिर जा कर एक कुरसी पर बैठ गई.

पापाजी ने एक पकौड़ी का टुकड़ा मुंह में रखा और कहने लगे कि शंभू ने पकौडि़यां ठंडी कर दी हैं.

 

जया कुरसी से उठी और पकौडि़यों की प्लेट किचन में ले गई. कड़ाही आंच पर चढ़ा कर पकौडि़यां गरम कर लाई. पापाजी खुश हो गए.

‘‘घनश्याम घंटा भर पहले पानी फ्रिज से निकाल कर जग भर के रख देता है, जब तक खाओपियो पानी गरम होने लगता है,’’  विपिन ने कहा.

जया ने पानी का जग उठाया, उस का पानी बालटी में उड़ेल कर फ्रिज से बोतल निकाल कर जग में ठंडा पानी भर मेज पर रख दिया.

‘‘भाभी, इतने नौकर घूम रहे हैं, किसी नौकर को आवाज दे देतीं, आप खुद क्यों दौड़ रही हैं?’’ विभा ने भौंहें सिकोड़ कर कहा.

सुधीर पहले दिन से ही जया को मिडिल क्लास मेंटैलिटी का मान कर कुपित था और आज जया के बारबार खुद उठ कर नौकरानी की तरह भागने से मन ही मन क्रोधित हो रहा था. अत: विभा की बात समाप्त करते ही सुधीर फूट पड़ा, ‘‘अपने घर में  नौकरचाकर देखे हों तो नौकरों से काम लेना आए.’’

जया सहम गई, उसे याद आया मां ने चलतेचलते समझाया था, ‘‘घर में चाहे कितने भी नौकरचाकर हों, अपने परिवार वालों का अपने हाथों से परोसनेखिलाने से प्यार बढ़ता है, बड़ों का सम्मान होता है.’’

सुधीर का ताना सुन कर जया की आंखों में आंसू आ गए. उसे पता ही नहीं चला कि उस ने क्या खाया. सब लोग उठे तो वह भी धीरे से उठ कर कमरे में चली गई.

जया को ब्याह कर ससुराल आए 2 हफ्ते हो गए थे. वह अपने पति सुधीर के साथ एडजस्ट नहीं कर पा रही थी. एक दिन सुधीर के कुछ दोस्त आने वाले थे. जया ने किचन में जा कर मठरियां सेंक कर रख दीं. हलवा बना कर हौटकेस में रख दिया. नौकर से समोसे बाहर से लाने को कह कर जैसे ही बाहर निकली, वैसे ही एकसाथ कई आवाजें सुनाई दीं कि भाभीजी हम लोग आप से मिलने आए हैं, आप कहां छिप कर बैठ गईं?

जया धीरे से बाहर निकली और नमस्ते कर के सीटिंगरूम में एक कुरसी पर बैठ गई.

‘‘वाह भाभीजी, हम लोग यह सोच कर आए थे, कुछ अपनी कहेंगे, कुछ आप की सुनेंगे, मगर आप तो छुईमुई की तरह सिमटीसिकुड़ी चुपचाप बैठी हैं,’’ सुनील ने कहा.

‘‘छुईमुई तो हाथ लगने से सिकुड़ती है, भाभीजी तो हमारी आवाज से ही सिकुड़ गईं,’’ जतिन ने हंसते हुए जोड़ा.

‘‘भाभीजी नईनवेली दुलहन हैं, इतनी जल्दी कैसे खुल जाएंगी?’’  ललित हंस कर बोला. तभी घनश्याम ने चायनाश्ते की ट्रे ला कर मेज पर रख दी.

‘‘हलवा कितना लजीज बना है,’’  सुनील ने 1 चम्मच हलवा मुंह में रखते ही कहा, ‘‘और मठरियां कितनी खस्ता है, लगता है सारा सामान भाभीजी ने ही बनाया है,’’ ललित ने मठरी तोड़ते हुए कहा.

परंतु सुधीर ने अपने मन की भड़ास निकालते हुए जया को ताना दिया, ‘‘इन्हें चौकाचूल्हे के सिवा और आता ही क्या है?’’

‘‘अच्छा भाभीजी, आप को चौकाचूल्हे के सिवा और कुछ नहीं आता?’’ कहतेकहते सब लोग ठहाका मार कर हंस पड़े. जया का मन झनझना उठा.

माहौल को सामान्य बनाने के उद्देश्य से प्रियंक बोला, ‘‘भाभीजी, सुना है आप के गांव के पास शारदा डैम बन गया है और वह बहुत रमणीय स्थल बन गया है. आप हम लोगों को बुलाइए, हम लोग पिकनिक मनाएंगे, डैम में जल विहार करेंगे, बड़ा मजा आएगा. सुधीर, चलने का प्रोग्राम बनाओ.’’

‘‘हां, इन के पिताजी के खेतखलिहान भी देख लेना,’’ सुधीर को जया पर कटाक्ष करने की आदत सी पड़ गई थी.

‘‘हांहां, आप लोग अवश्य आइए. आप लोग बड़े शहर में रहते हैं, आप ने गांव नहीं देखे होंगे. आप को वे अजीबोगरीब लगेंगे,’’ जया का स्वर हलका सा कठोर हो गया था.

‘‘क्या भाभीजी आप के गांव में बैलगाड़ी से आतेजाते हैं?’’ सुनील ने कुछ अज्ञानतावश तो कुछ व्यंग्यपूर्वक पूछा.

‘‘नहीं भाई साहब, हम लोग कसबे में रहते हैं, गांव में हमारा फार्म है, पिताजी के पास जीप है, पिताजी जीप से फार्म देखने जाते हैं, अगर खुद जा कर न देखें तो नौकरचाकर भट्ठा बैठा दें,’’ जया के स्वर में दृढ़ता थी.

थोड़ी देर गपशप कर के दोस्त तो चले गए, परंतु सुधीर का असंतोष उस के चेहरे से साफ झलक रहा था.

जया अपने कमरे में चली गई, जहां से उस ने सुना, सुधीर मां के पास बैठा  बड़बड़ा रहा था, ‘‘मां, आप ने कितने दकियानूसी परिवार की लड़की मेरे गले बांध दी. आखिर मुझ में क्या कमी है? स्मार्ट हूं, ऊंची पोस्ट पर हूं, मेरे कालेज की कितनी लड़कियां मुझ से शादी करने को तैयार थीं, परंतु आप की जिद के आगे मैं झुक गया.

जया कितनी पिछड़ी है, न उठनेबैठने की तमीज है न बोलने का सलीका, चार लोग आए तो सिमटसिकुड़ कर बैठ गई. बोली तो ऐसे बोली मानो पत्थर मार रही हो.

‘‘उस दिन एक दोस्त के बेटे के बर्थडे में गया, तो सब लड़कियां तालियां बजाबजा कर हैप्पी बर्थडे गा रही थीं, यह मुंह लटकाए चुपचाप खड़ी थी. कपड़े पहनने की तमीज नहीं, सर्दी में शिफान और गरमियों में सिल्क पहन कर चल देती है. एक हाई हील के सैंडल ला कर दिए तो पहन कर चलते ही गिर पड़ी. मुझे तो बहुत शर्म आती है. मेरे दोस्त अरुण की शादी अभी हाल ही में हुई है, उस की बीवी कितनी स्मार्ट है, फर्राटे से अंगरेजी बोलती है अरुण बता रहा था, लेडीज संगीत में उस की छोटी बहन ने उसे जबरदस्ती खड़ा कर दिया तो उस ने इतना अच्छा डांस किया कि सब लोग वाहवाह कर उठे.’’

 

सुधीर गुस्से से कहता चला जा रहा था कि मां ने बीच में टोका, ‘‘बेटा, वे लड़कियां फर्राटे से अंगरेजी बोल लेती हैं, बढि़या डांस कर लेती हैं, परंतु घरगृहस्थी के काम में अकसर उन्हें कुछ नहीं आता है. अंगरेजी बोल लेना, नाच लेना थोड़े दिनों की चकाचौंध है, बाद में घरगृहस्थी ही काम आती है. सामने त्रिपाठीजी के बेटे की बहू को देखते हो, स्मार्ट है, फर्राटे की अंगरेजी बोलती है, संगीत में प्रभाकर की डिगरी ले रखी है, परंतु मिसेज त्रिपाठी दिन भर काम में जुटी रहती हैं, बहूरानी कमरे में पलंग पर लेट कर स्टीरियो सुनती रहती हैं- न सास की लाज न ससुर की इज्जत. जया सुंदर है, पढ़ीलिखी है, घरेलू वातावरण में पलीबढ़ी है, शहर में रह कर सब सीख जाएगी,’’ मां ने सुधीर को समझाते हुए कहा.

‘‘मां, घरगृहस्थी का काम तो एक अनपढ़ लड़की भी कर लेती है. इतना तो मैं कमा ही लेता हूं कि घरगृहस्थी के काम के लिए एक नौकर रख सकता हूं. आजकल शहरों में जगहजगह रेस्टोरेंट व होटल खुल गए हैं, फोन कर दो, मनपसंद खाना घर बैठे आ जाएगा. कुछ सोशल लाइफ भी तो होती है.’’

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