सीख

9 January 2017
सीख

जया नहा धो कर तैयार हुई, माथे तक घूंघट किया, फिर धीरेधीरे सीढि़यां उतर कर नीचे आ गई. आते ही मम्मीजी के पैर छूने के लिए जैसे ही झुकी, वैसे ही मम्मीजी ने हाथ पकड़ कर ऊपर उठा लिया.

‘‘पैर छूना पुरानी बातें हैं, दिल में इज्जत होनी चाहिए, इतना ही काफी है और ये घूंघट क्यों बना लिया है?’’ और मम्मीजी ने जया के सिर से घूंघट उठा दिया.

‘‘मेज पर नाश्ता लग गया है, सब लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. चलो, नाश्ता कर लो,’’  मम्मीजी ने प्यार से कहा.

जया ने अपनी भाभियों को ससुर व जेठ के साथ बराबर बैठ कर खातेपीते नहीं देखा था. पहले तो वह थोड़ी सी झिझकी फिर जा कर एक कुरसी पर बैठ गई.

पापाजी ने एक पकौड़ी का टुकड़ा मुंह में रखा और कहने लगे कि शंभू ने पकौडि़यां ठंडी कर दी हैं.

 

जया कुरसी से उठी और पकौडि़यों की प्लेट किचन में ले गई. कड़ाही आंच पर चढ़ा कर पकौडि़यां गरम कर लाई. पापाजी खुश हो गए.

‘‘घनश्याम घंटा भर पहले पानी फ्रिज से निकाल कर जग भर के रख देता है, जब तक खाओपियो पानी गरम होने लगता है,’’  विपिन ने कहा.

जया ने पानी का जग उठाया, उस का पानी बालटी में उड़ेल कर फ्रिज से बोतल निकाल कर जग में ठंडा पानी भर मेज पर रख दिया.

‘‘भाभी, इतने नौकर घूम रहे हैं, किसी नौकर को आवाज दे देतीं, आप खुद क्यों दौड़ रही हैं?’’ विभा ने भौंहें सिकोड़ कर कहा.

सुधीर पहले दिन से ही जया को मिडिल क्लास मेंटैलिटी का मान कर कुपित था और आज जया के बारबार खुद उठ कर नौकरानी की तरह भागने से मन ही मन क्रोधित हो रहा था. अत: विभा की बात समाप्त करते ही सुधीर फूट पड़ा, ‘‘अपने घर में  नौकरचाकर देखे हों तो नौकरों से काम लेना आए.’’

जया सहम गई, उसे याद आया मां ने चलतेचलते समझाया था, ‘‘घर में चाहे कितने भी नौकरचाकर हों, अपने परिवार वालों का अपने हाथों से परोसनेखिलाने से प्यार बढ़ता है, बड़ों का सम्मान होता है.’’

सुधीर का ताना सुन कर जया की आंखों में आंसू आ गए. उसे पता ही नहीं चला कि उस ने क्या खाया. सब लोग उठे तो वह भी धीरे से उठ कर कमरे में चली गई.

जया को ब्याह कर ससुराल आए 2 हफ्ते हो गए थे. वह अपने पति सुधीर के साथ एडजस्ट नहीं कर पा रही थी. एक दिन सुधीर के कुछ दोस्त आने वाले थे. जया ने किचन में जा कर मठरियां सेंक कर रख दीं. हलवा बना कर हौटकेस में रख दिया. नौकर से समोसे बाहर से लाने को कह कर जैसे ही बाहर निकली, वैसे ही एकसाथ कई आवाजें सुनाई दीं कि भाभीजी हम लोग आप से मिलने आए हैं, आप कहां छिप कर बैठ गईं?

जया धीरे से बाहर निकली और नमस्ते कर के सीटिंगरूम में एक कुरसी पर बैठ गई.

‘‘वाह भाभीजी, हम लोग यह सोच कर आए थे, कुछ अपनी कहेंगे, कुछ आप की सुनेंगे, मगर आप तो छुईमुई की तरह सिमटीसिकुड़ी चुपचाप बैठी हैं,’’ सुनील ने कहा.

‘‘छुईमुई तो हाथ लगने से सिकुड़ती है, भाभीजी तो हमारी आवाज से ही सिकुड़ गईं,’’ जतिन ने हंसते हुए जोड़ा.

‘‘भाभीजी नईनवेली दुलहन हैं, इतनी जल्दी कैसे खुल जाएंगी?’’  ललित हंस कर बोला. तभी घनश्याम ने चायनाश्ते की ट्रे ला कर मेज पर रख दी.

‘‘हलवा कितना लजीज बना है,’’  सुनील ने 1 चम्मच हलवा मुंह में रखते ही कहा, ‘‘और मठरियां कितनी खस्ता है, लगता है सारा सामान भाभीजी ने ही बनाया है,’’ ललित ने मठरी तोड़ते हुए कहा.

परंतु सुधीर ने अपने मन की भड़ास निकालते हुए जया को ताना दिया, ‘‘इन्हें चौकाचूल्हे के सिवा और आता ही क्या है?’’

‘‘अच्छा भाभीजी, आप को चौकाचूल्हे के सिवा और कुछ नहीं आता?’’ कहतेकहते सब लोग ठहाका मार कर हंस पड़े. जया का मन झनझना उठा.

माहौल को सामान्य बनाने के उद्देश्य से प्रियंक बोला, ‘‘भाभीजी, सुना है आप के गांव के पास शारदा डैम बन गया है और वह बहुत रमणीय स्थल बन गया है. आप हम लोगों को बुलाइए, हम लोग पिकनिक मनाएंगे, डैम में जल विहार करेंगे, बड़ा मजा आएगा. सुधीर, चलने का प्रोग्राम बनाओ.’’

‘‘हां, इन के पिताजी के खेतखलिहान भी देख लेना,’’ सुधीर को जया पर कटाक्ष करने की आदत सी पड़ गई थी.

‘‘हांहां, आप लोग अवश्य आइए. आप लोग बड़े शहर में रहते हैं, आप ने गांव नहीं देखे होंगे. आप को वे अजीबोगरीब लगेंगे,’’ जया का स्वर हलका सा कठोर हो गया था.

‘‘क्या भाभीजी आप के गांव में बैलगाड़ी से आतेजाते हैं?’’ सुनील ने कुछ अज्ञानतावश तो कुछ व्यंग्यपूर्वक पूछा.

‘‘नहीं भाई साहब, हम लोग कसबे में रहते हैं, गांव में हमारा फार्म है, पिताजी के पास जीप है, पिताजी जीप से फार्म देखने जाते हैं, अगर खुद जा कर न देखें तो नौकरचाकर भट्ठा बैठा दें,’’ जया के स्वर में दृढ़ता थी.

थोड़ी देर गपशप कर के दोस्त तो चले गए, परंतु सुधीर का असंतोष उस के चेहरे से साफ झलक रहा था.

जया अपने कमरे में चली गई, जहां से उस ने सुना, सुधीर मां के पास बैठा  बड़बड़ा रहा था, ‘‘मां, आप ने कितने दकियानूसी परिवार की लड़की मेरे गले बांध दी. आखिर मुझ में क्या कमी है? स्मार्ट हूं, ऊंची पोस्ट पर हूं, मेरे कालेज की कितनी लड़कियां मुझ से शादी करने को तैयार थीं, परंतु आप की जिद के आगे मैं झुक गया.

जया कितनी पिछड़ी है, न उठनेबैठने की तमीज है न बोलने का सलीका, चार लोग आए तो सिमटसिकुड़ कर बैठ गई. बोली तो ऐसे बोली मानो पत्थर मार रही हो.

‘‘उस दिन एक दोस्त के बेटे के बर्थडे में गया, तो सब लड़कियां तालियां बजाबजा कर हैप्पी बर्थडे गा रही थीं, यह मुंह लटकाए चुपचाप खड़ी थी. कपड़े पहनने की तमीज नहीं, सर्दी में शिफान और गरमियों में सिल्क पहन कर चल देती है. एक हाई हील के सैंडल ला कर दिए तो पहन कर चलते ही गिर पड़ी. मुझे तो बहुत शर्म आती है. मेरे दोस्त अरुण की शादी अभी हाल ही में हुई है, उस की बीवी कितनी स्मार्ट है, फर्राटे से अंगरेजी बोलती है अरुण बता रहा था, लेडीज संगीत में उस की छोटी बहन ने उसे जबरदस्ती खड़ा कर दिया तो उस ने इतना अच्छा डांस किया कि सब लोग वाहवाह कर उठे.’’

 

सुधीर गुस्से से कहता चला जा रहा था कि मां ने बीच में टोका, ‘‘बेटा, वे लड़कियां फर्राटे से अंगरेजी बोल लेती हैं, बढि़या डांस कर लेती हैं, परंतु घरगृहस्थी के काम में अकसर उन्हें कुछ नहीं आता है. अंगरेजी बोल लेना, नाच लेना थोड़े दिनों की चकाचौंध है, बाद में घरगृहस्थी ही काम आती है. सामने त्रिपाठीजी के बेटे की बहू को देखते हो, स्मार्ट है, फर्राटे की अंगरेजी बोलती है, संगीत में प्रभाकर की डिगरी ले रखी है, परंतु मिसेज त्रिपाठी दिन भर काम में जुटी रहती हैं, बहूरानी कमरे में पलंग पर लेट कर स्टीरियो सुनती रहती हैं- न सास की लाज न ससुर की इज्जत. जया सुंदर है, पढ़ीलिखी है, घरेलू वातावरण में पलीबढ़ी है, शहर में रह कर सब सीख जाएगी,’’ मां ने सुधीर को समझाते हुए कहा.

‘‘मां, घरगृहस्थी का काम तो एक अनपढ़ लड़की भी कर लेती है. इतना तो मैं कमा ही लेता हूं कि घरगृहस्थी के काम के लिए एक नौकर रख सकता हूं. आजकल शहरों में जगहजगह रेस्टोरेंट व होटल खुल गए हैं, फोन कर दो, मनपसंद खाना घर बैठे आ जाएगा. कुछ सोशल लाइफ भी तो होती है.’’

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