गृहशोभा विशेष

बबलू अचानक रोड की ओर देख कर चिल्लाया, ‘‘पापा, भूत.’’ ‘‘कहां?’’ कहते हुए पापाजी ने मोटसाइकिल रोक दी.

‘‘वहां.’’ बबलू ने एक ओर इशारा करते हुए कहा. पापा ने सामने देखा तो सुनसान और अंधेरी रात में मानव हड्डियों का एक ढांचा खड़ा था. लोग उसे देख कर दूसरी तरफ चुपचाप चले जा रहे थे. ‘‘यह वाकई भूत है या हम लोगों की कल्पना?’’ पापाजी ने गौर से देखते हुए कहा.

‘‘पापाजी, चलिए, हम भी दूसरी ओर से निकल जाते हैं?’’ बबलू ने डर कर कहा. लेकिन पापाजी गौर से उस हड्डी के ढांचे को देख रहे थे. पापा बोले, ‘‘बबलू, मोटरसाइकिल और भूत.

यह बात नहीं जमी. चल कर पास से देखते हैं भूत को?’’

यह सुन कर बबलू की हिम्मत बढ़ गई. वह भी सोच रहा था कि वाकई मोटरसाइकिल पर भूत नहीं हो सकता है.

पापाजी ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की और कुछ ही देर में वे भूत के पास पहुंच गए. ‘‘अरे भाई, क्या हुआ?’’ पापा ने उस हड्डी के ढांचे वाले भूत से पूछा.

‘‘कुछ नहीं भाई साइब, मोटरसाइकिल बंद हो गई?’’ वह बोला. यह सुन कर बबलू चौंका. यह भूत तो बोलता भी है. बबलू को हिम्मत आ गई. ‘‘आप उड़ कर चले जाइए. भूत तो उड़ते भी हैं,’’ बबलू बोला.

‘‘उड़ कर?’’ भूत चौंका, ‘‘क्यों मजाक करते हो, बेटा? यदि मैं उड़ना जानता तो मोटरसाइकिल पर यहां नहीं होता?’’ उस ने मोटरसाइकिल की ओर देख कर कहा, ‘‘यह स्टार्ट नहीं हो रही है?’’ ‘‘अच्छा.’’ कहते हुए पापा भूत की मोटरसाइकिल के पास गए. फिर उसे ध्यान से देखा. चाबी घुमाई, किक मारी. मोटरसाइकिल स्टार्ट नहीं हुई.

तब पापा ने पूछा, ‘‘आप किधर जा रहे हो?’’ भूत ने जवाब दिया, ‘‘मुझे एक नाटक में भाग लेने के लिए पास के गांव जाना था. मैं वहीं जा रहा हूं.’’

तभी पापाजी ने मोटरसाइकिल की ओर देख कर कहा, ‘‘मोटरसाइकिल तीन कारणों से नहीं चलती है. चाबी सही न लगी हो? गाड़ी में पेट्रोल न हो? या वह करंट पैदा कर रही हो? दो चीजें मैं ने देख लीं.’’ फिर पापा ने उस भूत से पूछा, ‘‘इस में पेट्रोल है?’’ ‘‘जी हां. मैं अभीअभी एक लीटर पेट्रोल डलवा कर लाया था.’’ भूत ने जवाब दिया.

‘‘फिर स्टार्ट क्यों नहीं हो रही है?’’ पापाजी ने पूछा. बबलू बोला, ‘‘यह मोटरसाइकिल आप के भूत को देख कर डर गई है, इसलिए स्टार्ट नहीं हो रही है.’’

‘‘क्या?’’ वह हड्डियों का ढांचा चौंकते हुए बोला. ‘‘हां, यह सही कह रहा है,’’ पापाजी ने कहा, ‘‘देखो, तुम्हें देख कर लोग डरडर कर दूसरे रास्ते से भाग रहे हैं?’’

‘‘क्यों?’’ भूत की समझ में नहीं आया. बबलू ने कहा, ‘‘अपनी शक्ल मोटरसाइकिल के शीशे में देखिए.’’

उस ने मोटरसाइकिल के शीशे में देखा. वह स्वयं चौंक कर डर गया. वह दो कदम पीछे हट गया. ‘‘क्या हुआ?’’ बबलू ने पूछा.

‘‘भूत.’’ कहते हुए उस ने डिक्की से पानी की बोतल निकाली और अपने चेहरे को पानी से धोया. वह बोला, ‘‘अंधेरी रात में तो बिलकुल भूत लग रहा हूं. दरअसल, उस गांव में मेकअप के लिए ग्रीन रूम नहीं है. इसलिए मैं अपने घर में ही तैयार हो कर मोटरसाइकिल पर निकला था. लेकिन मैं ने अपने भूत वाली ड्रैस पर ध्यान नहीं दिया था. यह तो सचमुच भूत जैसा ही लगता है. लेकिन आप लोगों को डर नहीं लगा?’’

‘‘डरा था,’’ पापा ने कहा, ‘‘फिर सोचा कि भूत मोटरसाइकिल पर नहीं हो सकता है? इसलिए सोचा कि जरूर कोई बात है. चल कर देखना चाहिए. इसलिए हिम्मत कर के यहां चला आया.’’ ‘‘ओह,’’ भूत ने कहा.

अचानक पापा बोले, ‘‘अरे, तुम ने तो पेट्रोल की चाबी बंद कर रखी थी. मोटरसाइकिल बिना पेट्रोल के नहीं चलती है.’’ कहते हुए पापा ने पेट्रोल की चाबी चालू कर के मोटरसाइकिल स्टार्ट कर दी. मोटरसाइकिल स्टार्ट होते ही भूत ने अपनी ड्रैस उतारी और झोले में रख दी.

‘‘धन्यवाद, मैं चला.’’ वह मोटरसाइकिल को स्टार्ट करते हुए बोला. ‘‘किधर चल दिए, नाटक करने नहीं जाना?’’ पापा ने उस से पूछा.

‘‘नहीं, धन्यवाद. जिस भूत से मैं डर जाऊं ऐसा भूत मुझे नहीं बनना.’’ कहते हुए वह भूत वापस अपने घर की ओर चल दिया. बबलू बोला, ‘‘पापा, हम बिना बात के ही भूतों से डरने लगते हैं. कुछ लोग हमारे इसी डर का फायदा उठा कर हमें डराते हैं. यदि आज हम डर जाते तो सदा के लिए मेरे मन में भूत का डर बैठ जाता.’’

‘‘हां, बबलू, इसी तरह के अनजान भूत हमें डराते हैं. हम उस के पीछे की सचाई को जानने की कोशिश नहीं करते.’’ कहते हुए पापा ने गाड़ी स्टार्ट की और घर की ओर चल दिए. बबलू बहुत खुश था. उस ने एक भूत से मुलाकात की थी. वह यह बात अपनी मम्मी को बताना चाहता था. इसलिए वह पापा से बोला, ‘‘पापा, जल्दी घर चलिए. मम्मी को भूत से मुलाकात की कहानी सुनाऊंगा.’’ कहते हुए बबलू सड़क की ओर देखने लगा. मोटरसाइकिल पूरी रफ्तार से चल दी.

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