गृहशोभा विशेष

शहर के बीच में एक आम का पेड़ था. उस पर नीलू मैना का घोंसला था. एक दिन एक अजनबी चिड़िया शहर में आई. उस का नाम था, सोफी. उस दिन धूप तेज थी. सोफी उड़तेउड़ते उस पेड़ के पास पहुंची. एक डाल पर बैठ कर आराम करने लगी. पेड़ की ठंडी छांव में उसे बहुत आराम महसूस हुआ. वह उड़ कर ऊपर की डाल पर जा बैठी.

‘‘इस पेड़ पर घर बनाना सही रहेगा. जगह भी अच्छी है.’’ सोफी ने सब से ऊंची डाल पर अपना घोंसला बनाने का फैसला किया. पत्तों की आवाज सुन कर नीलू अपने घर से बाहर निकली. उस ने सोफी के पास जा कर पूछा, ‘‘क्या तुम नई आई हो?’’

‘‘हां, मैं दूसरे शहर से आई हूं. मेरा नाम सोफी है.’’ सोफी ने अपना परिचय दिया. ‘‘मेरा नाम नीलू है. मैं भी इसी पेड़ पर रहती हूं. नीचे की डाल पर मेरा घोंसला है,’’ नीलू बोली.

‘‘यह जगह मुझे बहुत पसंद आई. मैं इस पेड़ की सब से ऊपर वाली डाल पर अपना घोंसला बनाऊंगी,’’ सोफी ने मुसकरा कर कहा. ‘‘यह तो बहुत खुशी की बात है. मुझे एक नया पड़ोसी भी मिल जाएगा, पर मेरा एक सुझाव है,’’ नीलू खुश हो कर बोली. ‘‘कैसा सुझाव?’’ सोफी ने पूछा.

‘‘ऊपर की डाल कमजोर होती है. वहां घोंसला बनाना सही नहीं है. तेज हवाओं से घोंसले पर खतरा हो सकता है. तुम चाहो तो मेरे घोंसले के पास अपना घोंसला बना सकती हो,’’ नीलू ने समझाया. सोफी ने नीलू की बात तुरंत काटते

हुए कहा, ‘‘नहीं, घर तो मैं सब से ऊपर की डाल पर बनाऊंगी. वहां ठंडी, ताजी हवा आएगी. पूरे शहर का नजारा भी दिखेगा.’’

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी. वैसे अगर कोई मदद चाहिए, तो जरूर बताना,’’ नीलू अपने घोंसले में जाते हुए बोली. सोफी ने तिनका जोड़ कर घोंसला बनाना शुरू किया. कुछ ही दिनों में घोंसला बन कर तैयार हो गया.

एक दिन नीलू अपने घर में आराम कर रही थी, तभी उस के घोंसले में फल का छिलका आ गिरा. नीलू ने बाहर झांका. सोफी के घोंसले से कुछ छिलके दोबारा उस पर आ कर गिरे.

नीलू चिल्लाई, ‘‘ सोफी, गंदगी डस्टबिन में जा कर फेंको, मेरे घर पर नहीं. मेरा घोंसला गंदा हो रहा है.’’

‘‘मैं तो छिलका नीचे फेंक रही हूं. अगर वह छिलका तुम्हारे घोंसले में गिर रहा है तो मैं क्या करूं,’’ सोफी बोली. नीलू ने सोफी को समझाने की कोशिश की तो सोफी उस के ऊपर ही भड़क उठी, ‘‘नीलू, मुझे समझाने की जरूरत नहीं. तुम अपना घोंसला कहीं और बना लो. मैं तो रोज फल खाती हूं, छिलका तो नीचे गिरेगा ही.’’

सोफी का व्यवहार देख कर नीलू को बहुत दुख हुआ. वह चुपचाप अपने घोंसले में चली गई. अगले दिन सोफी के घोंसले से गंदा पानी नीलू के घर पर टपकने लगा.

नीलू जब शिकायत करने पहुंची तो सोफी बोली, ‘‘मैं तो अपने घोंसले की सफाई कर रही हूं. पानी तो नीचे गिरेगा ही. मैं ने तुम से पहले ही कहा था कि अपना घर कहीं और बना लो.’’ अब तो हर दिन सोफी नीलू से झगड़ने के कोई न कोई बहाने ढूंढ़ती.

रोजरोज के झगड़े से नीलू भी तंग आ गई थी. उस ने अपना घोंसला दूसरी डाल पर बना लिया. उस ने सोफी से बातचीत करना भी बंद कर दिया. कुछ दिनों बाद सोफी ने दो अंडे दिए. उस ने बाहर निकलना भी कम कर दिया था.

एक दिन सोफी अंडे से रही थी. अचानक तेज झटकों के साथ घोंसला हिलने लगा. सोफी ने सोचा भूकंप आया है. वह चिल्लाती हुई बाहर निकली, ‘‘बचाओ, बचाओ…’’

आवाज सुन कर नीलू भी वहां आ पहुंची. ‘‘क्या हुआ सोफी, इतनी घबराई हुई क्यों हो?’’ नीलू ने पूछा.

‘‘नीलू, पेड़ की डाल हिल रही है. जरूर भूकंप आया है. अगर घोंसला टूट गया तो मेरे अंडे गिर कर टूट जाएंगे,’’ सोफी रोती हुई बोली. नीलू ने इधरउधर देख कर कहा, ‘‘सोफी, शांत हो जाओ और रोओ मत. कोई भूकंप नहीं आया है. अगर भूकंप आता तो सारे पेड़ हिलते, सिर्फ ऊपर की डाल नहीं. माजरा कुछ और है. मैं ऊपर देख

कर आती हूं.’’ कह कर नीलू ऊपर की डाल की ओर उड़ चली. डाल अभी भी हिल रही थी. नीलू ने देखा कि ऊपर की डाल पर एक पतंग फंसी हुई है.

दूर छत से कुछ बच्चे उसे छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे. इसी वजह से डाल हिल रही थी. ‘‘सोफी, चिंता मत करो. डाल में बच्चों की पतंग फंस गई है, इसलिए हिल रही है,’’ नीलू ने कहा.

‘‘अगर घोंसला टूट गया तो अंडे गिर जाएंगे,’’ सोफी लगातार रोए जा रही थी. नीलू बोली, ‘‘सोफी, यह रोने का समय नहीं है. हिम्मत से काम लो. बच्चे पतंग की खोज में आते ही होंगे. तुम जल्दी से अपने घोंसले से अंडे ला कर मेरे घोंसले में रख दो.’’

सोफी ??सावधानी से घोंसले से अंडे निकाल कर नीलू के घोंसले में रख आई. इधर नीलू ने अपनी चोंच से पतंग में कई जगह छेद कर दिए. सोफी ने दूसरे अंडे को भी नीलू के घर में रख दिया.

कुछ ही देर में दो बच्चे वहां पहुंचे. नीलू और सोफी पत्तों के पीछे छिप कर उन्हें देखने लगे. ‘‘पतंग तो फट गई है. अब उसे उतार कर कोई फायदा नहीं. चलो, नई पतंग खरीद लेते हैं,’’ एक बच्चे ने दूसरे से कहा.

बच्चों के जाने के बाद दोनों ने राहत की सांस ली. सोफी ने नीलू से माफी मांगते हुए कहा, ‘‘नीलू, मैं ने तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार किया फिर भी तुम ने मेरी मदद की. मेरे अंडों को बचाया. तुम्हारी सूझबूझ की वजह से मेरे अंडे और घोंसला बच गया. अगर मैं अपना घोंसला ऊपर नहीं बनाती तो यह मुसीबत नहीं आती. मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगी.’’

‘‘तुम्हें अपनी गलती का एहसास हुआ. यही काफी है,’’ नीलू मुसकरा कर बोली. अगले दिन सोफी ने अपना घोंसला नीलू के घोंसले के पास ही बना लिया. उस ने एक अच्छे पड़ोसी की तरह मिलजुल कर रहने का वादा किया.

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