रूस में होने वाले फीफा विश्व कप की तरह लेक झील के चारों ओर के 12 जंगलों के जानवरों ने फुटबौल विश्वकप का आयोजन किया था. फाइनल मैच रविवार को सोनावन और हरितवन के बीच होना था.

दोनों ही टीमों में खिलाडि़यों का अच्छा समूह था और सभी जानते थे कि मैच कांटे की टक्कर की होगी. मैच सुंदरवन के अंडाकार मैदान में होने जा रहा था और टिकट बिक चुके थे. हर जगह मैच के बारे में बोर्ड लगे हुए थे. डिंपी बंदर जो सोनावन में रहता था, बोला, ‘‘सोनावन मैच जीतेगा क्योंकि हमारे पास जौनी जिराफ है जो एक बहुत अच्छा खिलाड़ी है. अपने

लंबे पैरों के कारण वह तेजी से?भाग सकता है और बौल को गोलपोस्ट में सीधे किक मार कर पहुंचा सकता है.’’ रिंकू खरगोश ने डिंपी का समर्थन किया और

बोला, ‘‘जौनी के कारण ही हम सभी फाइनल में पहुंच सके हैं. उस ने अंतिम मैच में बहुत ही अच्छा गोल किया था.’’ ‘‘हमारी टीम भी बहुत अच्छी है. खिलाडि़यों के साथ कोच बिग पांडा ने काफी मेहनत की थी और इसी कारण हम फाइनल में आ सके,’’ जंबो हाथी ने कहा जो हरितवन से था.

‘‘तुम ठीक कह रहे हो जंबो. अब तो मैं बहुत ही उत्साहित हूं. मैं ने सिर्फ टैलीविजन पर मैच देखे हैं, लेकिन आज हम मैदान में मैच का सीधा लाइव देख सकेंगे,’’ डिंगी लोमड़ी ने उत्साहित हो कर कहा. ‘‘तुम सही बोल रही हो. हमारा मैच बिलकुल ही फीफा की तरह है जिस ने विश्वकप आयोजित किया, जिस में बहुत से देशों ने भाग लिए. हम ने भी फुटबौल कप आयोजित किया है, ताकि हम इस खेल का मजा ले सकें,’’ रिंकू खरगोश ने कहा.

‘‘अब हम रविवार को देखेंगे कि कौन सी टीम जीतेगी,’’ सभी ने कहा और अपनेअपने घर लौट आए.

सोनावन टाइम्स के पहले पृष्ठ पर जौनी के बारे में ही खबर छपी हुई थी कि वह एक बड़ा खिलाड़ी है. यहां तक कि न्यूजचैनल वाले भी उस के बारे में खबर चलाए हुए थे. अपनी प्रशंसा से जौनी सुस्त हो गया और प्रैक्टिस पर ध्यान देना बंद कर दिया. अन्य खिलाड़ी हर सुबह प्रैक्टिस करने के लिए जाते थे लेकिन जौनी सोता रहता था.

सोनावन टीम का कोच डैनी जौनी को समझाने की कोशिश करता, लेकिन वह उस की बातों पर ध्यान नहीं देता था क्योंकि उसे स्वयं पर बहुत ज्यादा भरोसा हो गया था. वह कहता, ‘‘मुझे किसी प्रैक्टिस की जरूरत नहीं है. आप किसी और को दौड़ना क्यों नहीं सिखाते हो?’’ फाइनल में अब कुछ ही दिन रह गए थे और दोनों ही टीमें कठिन मेहनत कर रही थीं, सिर्फ जौनी को छोड़ कर. रविवार का दिन आ गया और हजारों प्रशंसकों के बीच फाइनल शुरू हुआ. मैदान में भीड़ जमा हो गई थी और दोनों ही ओर से नारे गूंजने लगे थे.

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जैसे ही रैफरी डेजी हिरण ने सीटी बजाई, खिलाड़ी भागने लगे और बौल से खेलने लगे. जौनी भी दौड़ने लगा. लेकिन वह जल्दी ही बेदम हो गया और दूसरे का साथ देने में असमर्थ हो गया. उस के दोस्तों और प्रशंसकों को उस के ऐसे खेल से चिंता होने लगी. मैच बहुत ही मजेदार हो गया था. हर कोई अपनी सीट के बिलकुल आगे की छोर पर आ गया था क्योंकि दोनों टीमें बिलकुल ही एकदूसरे के सामने आ गई थीं. हालांकि हरितवन ने पहले ही दो गोल कर दिए थे, सोनावन को तीन गोल मिला था. मैच के अंतिम समय में सोनावन को एक अतिरिक्त गोल मिल गया और गोल्डेनकप ट्रौफी उस के द्वारा जीत ली गई.

हर कोई चीखचीख कर सोनावन की तारीफ करने लगा और टीवी चैनल वाले भी विजयी टीम के बारे में चर्चा करने लगे. बीचबीच में वे जौनी के कमजोर खेल की भी चर्चा कर रहे थे और यह भी बता रहे थे कि उस का खेल कितना निराशाजनक था. जौनी बहुत परेशान हुआ और अपने दोनों हाथों के बीच सिर रख कर बैठ गया. हालांकि वह खुश भी था कि उस की टीम जीत गई थी, लेकिन वह अपने कमजोर खेल और सहयोग से दुखी था.

कोच डैनी उस के पास आ कर बोला, ‘‘जौनी, तुम ने खेल पर अपनी पकड़ खो दी है. क्योंकि तुम ने प्रैक्टिस पर ध्यान नहीं दिया. हर खिलाड़ी को अपने खेल के लिए समर्पित होना पड़ता है ताकि वह अच्छा परफौर्म कर सके.’’ ‘‘आप ठीक कह रहे हैं. मुझे भी प्रैक्टिस में भाग लेना चाहिए था. यह महत्वपूर्ण नहीं था कि मैं कितना अच्छा खिलाड़ी हूं. मैं अब हमेशा इस बात को याद रखूंगा,’’ जौनी ने कहा.

‘‘बहुत अच्छा. अब चलो, सब के साथ खुशियां मनाते हैं,’’ एक मुसकान के साथ डैनी ने कहा और जौनी को गले से लगा लिया. जौनी अब हल्का महसूस कर रहा था. वह अपनी टीम के अन्य खिलाडि़यों के साथ जीत की खुशी में शामिल हो गया.