एल्सा एक नन्ही और सुंदर मछली थी. एल्सा के शरीर पर सतरंगी धारियां थीं. सूरज की रोशनी में एल्सा की खूबसूरती और निखर जाती. वह चंदनझील में रहती थी. झील के आसपास इंसानों के घर थे. वहां के निवासी शाम को झील किनारे सैर के लिए आते.

एल्सा की सहेली थी, डोरी. दोनों सहेलियां भोजन की खोज में दूर दूर तक चली जातीं. एक दिन एल्सा और डोरी झील के किनारे आ गए. वहां कुछ लोग टहल रहे थे.

‘‘डोरी, मैं तो इस झील में रह कर बोर हो गई हूं. सारा दिन भोजन की तलाश में पानी में भटकते रहना पड़ता है. क्यों न हम भी बाहर की दुनिया का मजा लें,’’ एल्सा ने कहा. ‘‘एल्सा, तुम कैसी बातें कर रही हो? यहां क्या कमी है, जो तुम बोर होती हो? मुझे तो झील में रहना काफी पसंद है. इस साफ पानी में हम इधरउधर घूमने के लिए स्वतंत्र हैं. हमारे कई दोस्त हैं,’’ डोरी बोली.

‘‘भला यह भी कोई जीना है? न खाने का ठीक, न रहने के लिए अच्छा घर. सारा दिन मेहनत करने पर रूखासूखा खाना मिलता है.’’ एल्सा ने मुंह बनाते हुए कहा. ‘‘कम से कम हम यहां आजादी से रह तो सकते हैं. पूरी झील ही तो हमारा घर है. जहां चाहो जाओ, जो चाहो करो,’’ डोरी ने कहा.

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‘‘मैं तो अब यहां एक पल भी नहीं रहना चाहती. अगर मुझे मौका मिले, तो बाहर की दुनिया में जरूर जाऊंगी,’’ एल्सा बोली. कुछ दिन ऐसे ही गुजर गए. एक दिन एल्सा और डोरी झील की सैर कर रहे थे, तभी एक किनारे 2 युवकों को देख कर एल्सा रुक गई.

‘‘डोरी, देखो वहां, दोनों क्या कर रहे हैं? चलो, चल कर देखते हैं,’’ एल्सा बोली. ‘‘बेककूफ, वहां लोग मछलियां पकड़ने के लिए जाल डाल रहे हैं. जल्दी से यहां से निकल चलो, नहीं तो हम भी जाल में फंस जाएंगे.’’ डोरी ने समझाया.

‘‘मछलियां पकड़ कर इंसान क्या करेंगे?’’ एल्सा ने हैरानी से पूछा. ‘‘इंसान सुंदर रंगीन मछलियों को घर के एक्वेरियम में सजावट के लिए रखते हैं.’’ कह कर डोरी तैरने लगी.

‘‘मैं भी खूबसूरत और सतरंगी हूं. अगर मैं जाल में आ गई तो इंसान मुझे भी अपने घर मे एक्वेरियम में रखेंगे?’’ एल्सा ने खुश हो कर पूछा. ‘‘पागल मत बनो. अगर इंसान के हाथों में पड़ गई तो सारी आजादी खत्म हो जाएगी. भलाई इसी में है कि यहां से?भाग चलो.’’ डोरी ने वहां से जाते हुए कहा.

डोरी के समझाने पर भी एल्सा नहीं मानी. वह जाल की ओर बढ़ गई. वह हर हल में झील से बाहर निकलना चाहती थी. एल्सा जानबूझ कर जाल के पास जा कर तैरने लगी. मौका देख कर वह जाल में कूद गई.

जाल में नन्ही सतरंगी एल्सा को देख कर दोनों युवक खुश हुए. एक युवक ने उसे अपने घर के एक्वेरियम के लिए ले लिया. घर आ कर युवक ने एल्सा को एक सुंदर एक्वेरियम में रख दिया. एक्वेरियम पानी से भरा था. उस में काफी सजावट थी. कुछ छोटे पौधे लगे थे. नीचे गोल पत्थर रखे थे. एक्वेरियम में लाइट लगी थी, जिस से नीली रोशनी निकल रही थी.

‘‘आह, कितनी शांत और साफसुथरी जगह है यह.’’ एल्सा ने चक्कर लगाते हुए कहा. थोड़ी देर बाद युवक ने एक्वेरियम में खाना डाल दिया. एल्सा को खाना बहुत स्वादिष्ठ लगा. वह मुसकरा उठी. ‘कितना टेस्टी खाना है. यहां मुझे भोजन के लिए मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी,’ एल्सा सोचने लगी.

एक्वेरियम खिड़की के पास ही रखा था. एल्सा ने खिड़की के बाहर देखा तो दूर झील नजर आया. ‘‘काश, डोरी भी मेरे साथ यहां आती तो कितना मजा आता.’’ एल्सा को डोरी पर तरस आ रहा था.

एल्सा को एक्वेरियम में किसी बात की कमी नहीं थी. वहां सारा दिन एक कोने से दूसरे कोने का चक्कर लगाती. यहां समय पर उसे खाना मिल जाता. कभीकभी लोग घर आते तो वहां एल्सा की सुंदरता की खूब तारीफ करते. अपनी प्रशंसा सुन कर एल्सा फूली नहीं समाती.

एक दिन एल्सा चक्कर लगा रही थी. थोड़ी देर में वह हांफने लगी. ‘लगता है मेरा वजन बढ़ गया है. मैं मोटी हो गई हूं.’ एल्सा रुक कर सोचने लगी. उस ने अपने शरीर की ओर देखा. सतरंगी धारियां भी अब चमक खो रही थीं.

एक्वेरियम में पहली बार एल्सा को घुटन महसूस हुई. एल्सा ने खिड़की के बाहर झील की तरफ देखा और रोने लगी. एल्सा को डोरी की बातें याद आ रही थीं. एक्वेरियम से बाहर निकल कर वापस झील लौटना चाहती?थी. एल्सा ने एक्वेरियम की दीवार को धक्का देख कर तोड़ना चाहा, पर कोई फायदा नहीं हुआ. उस की मजबूत दीवार को तोड़ने में वह सफल नहीं हुई.

उस ने खाना भी छोड़ दिया. वह बाहर निकलने का उपाय सोच रही थी. एक दिन एल्सा एक्वेरियम के एक कोने में मायूस बैठी थी, तभी कमरे में किसी के आने की आहट हुई. एल्सा तुरंत एक्वेरियम की जमीन पर जा कर उलटे लेट गई. उस ने अपनी सांसें भी रोक ली थीं.

युवक ने ध्यान से एल्सा को देखा. उसे हिलायाडुलाया. एल्सा बिना किसी हलचल के चुपचाप पड़ी रही. युवक ने कहा, ‘‘लगता है यह मछली मर गई.’’ उस ने एल्सा को एक्वेरियम से बाहर निकाला और झील में जा कर फेंक दिया.

झील में गिरते ही एल्सा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने गहरी सांस ली फिर अपनी सहेली डोरी की तलाश में निकल पड़ी. ‘‘डोरी, कहां हो तुम? देखो, मैं वापस आ गई हूं.’’ एल्सा चिल्लाती जा रही थी.

एल्सा की आवाज सुन कर डोरी भी वहां आ गई. एल्सा को देख कर उसे विश्वास ही नहीं हुआ. वह उस के गले से लिपट गई. ‘‘एल्सा, तुम्हारे जाने के बाद मैं कितनी अकेली हो गई थी,’’ डोरी रोते हुए बोली.

‘‘हां, दोस्त, मैं ने तुम्हारी बात नहीं मान कर बहुत बड़ी गलती की. अब मुझे आजादी का महत्त्व समझ में आ गया है. झील की खुली हवा की

बात ही कुछ और है. मनुष्यों के एक्वेरियम में सारी सुविधा होने के बावजूद भी मेरा दम घुट रहा?था. आइंदा मैं यहां से जाने की बात कभी नहीं करूंगी,’’ एल्सा बोली. ‘‘मुझे खुशी है कि तुम वापस आ गई,’’ डोरी बोली.

दोनों सहेलियां मुसकराते हुए झील में सैर के लिए निकल पड़ीं.

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