पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी स्टेशन के पास एक गांव था. कुंतल अपने परिवार के साथ उस गांव में रहता था. उस के पापा किसान थे.

वह गांव पहाड़ और वनों से घिरा था. वन से भटक कर हाथी अकसर गांव में आ जाते थे.

कुंतल के घर से थोड़ी दूर एक रेललाइन गुजरती थी. जब शोर करती हुई ट्रेन गुजरती तो कुंतल को बहुत अच्छा लगता. उसे भी ट्रेन से सफर करने की इच्छा होती.

एक दिन गांव में एक मेला लगा. कुंतल अपने दोस्त अमित के साथ मेला देखने पहुंचा.

वहां ऊंचे झूले थे. तरहतरह के व्यंजनों के स्टाल लगे थे.

‘‘कुंतल, चलो झूला झूलते हैं. बड़ा मजा आएगा.’’ अमित ने झूले के पास जा कर कहा.

‘‘नहीं, मुझे डर लगता है. अगर मैं ऊंचे झूले से गिर गया तो सारी हड्डियां टूट जाएंगी,’’ कुंतल बोला.

‘‘डरने की जरूरत नहीं. कुछ नहीं होगा,’’ अमित ने कहा और उसे खींच कर झूले की ओर ले गया.

अमित ने काफी जिद की तो कुंतल राजी हो गया. वह पहली बार इतने ऊंचे झूले में बैठा था. उसे डर लग रहा?था. जब झूला ऊपर से नीचे की ओर आया तो कुंतल को लगा जैसे वह हवा में उड़ रहा हो.

झूला झूलने के बाद दोनों दोस्तों ने चटपटे व्यंजनों का आनंद भी लिया.

रात को घर लौटा तो कुंतल बहुत थका हुआ था. वह जल्द ही सो गया. रात को कुंतल की नींद कुछ आवाजें सुन कर टूट गई.

वन में अकसर जानवरों की आवाजें आती रहती थीं. जंगली जानवर भटक कर गांव की ओर आ जाते थे.

पहले तो कुंतल ने सोचा कि आवाज किसी जंगली जानवर की है. पर काफी देर तक जब आवाजें आनी बंद नहीं हुईं तो उस ने खिड़की से बाहर झांक कर देखा. दूर रेललाइन के पास कुछ हाथी जमा थे. कुंतल ने घड़ी देखी. बारह बज रहे थे.

‘इतनी रात को हाथी रेललाइन के पास क्यों खड़े हैं? आधे घंटे बाद तो यहां से हावड़ा एक्सप्रैस गुजरती है,’ कुंतल ने मन ही मन सोचा.

पहले भी यहां कई बार ट्रेन की टक्कर से हाथियों की मौत हो चुकी थी. कुंतल की चिंता और बढ़ गई.

चारों ओर अंधेरा था. वह लालटेन ले कर रेललाइन की ओर बढ़ा. कुंतल लालटेन की रोशनी में देखने की कोशिश करने लगा. रेललाइन के पास 4 हाथी खड़े थे.

जंगली हाथियों के करीब जाना खतरनाक हो सकता था. कुंतल एक पेड़ के पीछे छिप कर देखने लगा.

लाइन के पास एक गड्ढे में एक हाथी का बच्चा फंसा हुआ था. चारों हाथी उसे ही घेर कर खड़े थे.

‘‘शायद हाथी का बच्चा गड्ढे में फंस गया है. मुझे जल्द ही कुछ करना होगा. अगर ट्रेन आ गई तो दुर्घटना हो सकती है.’’ खतरे को भांपते हुए कुंतल वापस घर की ओर दौड़ा.

उस ने सब से पहले मम्मीपापा को इस की सूचना दी. फिर स्कूलबैग से लाल रंग की कुछ प्लास्टिक निकाल कर लाइन की ओर भागा.

उस के मम्मीपापा बाकी गांव वासियों को बुलाने चले गए.

लालटेन ले कर कुंतल ट्रेन आने वाली दिशा की ओर बढ़ गया. उस ने लालटेन के सामने लाल प्लास्टिक रख दिया. अब लालटेन से लाल रोशनी निकल रही थी.

थोड़ी देर में ट्रेन की आवाज सुनाई पड़ी. कुंतल लालटेन हिला कर ट्रेन को रुकने का इशारा करने लगा.

वह लगातार चिल्लाता भी जा रहा?था, ‘‘ट्रेन रोको, ट्रेन रोका, लाइन पर आगे हाथी खड़े हैं.’’

टे्रेन के ड्राइवर ने लालटेन से लाल रोशनी को देख कर खतरा भांप लिया. ट्रेन की रफ्तार धीमी होने लगी. कुछ आगे ट्रेन रुक गई.

‘‘क्या बात है बच्चे, आगे कोई खतरा है क्या?’’ ड्राइवर ने कुंतल से पूछा.

‘‘हां, आगे हाथियों का एक झुंड रेललाइन पर खड़ा हैं,’’ कुंतल ने बताया.

ड्राइवर ने गार्ड और टे्रन में सवार रेल पुलिस के जवानों को सूचना दी. सभी उतर कर घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने वन विभाग के लोगों को भी बुला लिया.

हाथी अब भी वहीं खड़े थे. थोड़ी देर बाद वन विभाग के लोग पहुंचे. लाइन के पास गड्ढे में हाथी के बच्चे का पैर फंसा था. काफी प्रयास के बाद भी वह नहीं निकल पा रहा था.

वन विभाग के कर्मचारियों ने हाथी के बच्चे को रस्सियों के सहारे बाहर निकाला. उस के पांव से खून निकल रहा था. उस के घाव पर दवाई लगाई गई. थोड़ी देर बाद हाथियों का झुंड बच्चे के साथ वन में चला गया.

गांव वाले भी तब तक घटनास्थल पर आ गए थे. रेल के ड्राइवर ने कुंतल को धन्यवाद देते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी सूझबूझ से एक बड़ी दुर्घटना टल गई. अगर तुम लालटेन दिखा कर हमें रुकने का इशारा नहीं करते तो इन हाथियों की जान जा सकती थी और ट्रेन भी उलट सकती थी, जिस से कई सवारियों को नुकसान पहुंच सकता था.’’

कुंतल के मम्मीपापा और गांववाले ने भी उस की समझदारी की खूब प्रशंसा की.