गृहशोभा विशेष

नन्ही चीचू चुहिया बहुत चुलबुली और शैतान थी. वह कभी किसी से डरती नहीं थी. सीना फुला कर उछलती, कूदती हुई इधर से उधर निडर हो कर दौड़ती रहती. वह बिन्नो बिल्ली के सामने भी जब आंखें तरेर कर दौड़ लगाती, तो अशोक पेड़ के नीचे रहने वाली पिंपू गिलहरी डर कर सहम जाती. एकदिन बिन्नो बिल्ली ने जब चीचू पर झपट््टा मारा तो पिंपू गिलहरी डर से कांप गई कि यह नादान चुहिया बिन्नो के चंगुल में अब फंसी कि तब. पर चीचू फुर्ती से दौड़ कर अपने बिल में घुस गई और अपनी जान बचाने में सफल हो गई. पिंपू को राहत मिली. पिंपू को चीचू का बेखौफ दौड़ना पसंद था, पर उस का फालतू में समय बरबाद करने के लिए इधरउधर चक्कर लगाना बिलकुल पसंद नहीं था.

एक दिन दौड़ती चीचू को पिंपू गिलहरी ने आवाज दे कर बुलाया और बोली, ‘‘चीचू, तुम रोज इधरउधर भाग कर अपना समय बरबाद करती हो. क्या तुम्हारे पास कोई काम नहीं है?’’ ‘‘अरे, जब काम की जरूरत ही नहीं है तो मैं काम क्यों करूं? मेरे मम्मीपापा बहुत अच्छे हैं और मुझ से बहुत प्यार करते हैं. वे मुझ से कोई काम कराते ही नहीं हैं,’’ चीचू गर्व से बोली.

‘‘अरे, सभी मम्मीपापा अपने बच्चों को प्यार करते हैं. इस में नया क्या है? पर एक बात बताओ, मैं तुम्हें कभी खाना ढूंढ़ते हुए नहीं देखती. तुम खाना कब ढूंढ़ती हो?’’ पिंपू ने पूछा. चीचू की अकड़ कम नहीं हुई थी इसलिए वह उसी शान से बोली, ‘‘मैं ने तुम्हें अभी बताया था कि मैं पापामम्मी की दुलारी बेटी हूं इसलिए जब मैं खेलकूद कर घर पहुंचती हूं तो मां मेरे लिए ढेर सारी खाने की चीजें सजा कर रखती हैं, जिन्हें मैं आराम से खाती हूं और पैर पसार कर सो जाती हूं.’’

‘‘चीचू, क्या तुम्हें ये नहीं लगता कि अब तुम बड़ी हो गई हो इसलिए तुम्हें अपना भोजन स्वयं ढूंढ़ना चाहिए.’’ पिंपू सलाह देती हुई बोली. ‘‘अरे, जब मैं ने बता दिया कि मेरी मां मेरी चिंता करती हैं तो फिर तुम्हें क्यों दिक्कत हो रही है? मुझे मां के हाथ का खाना ही पसंद है.’’ यह कह कर चीचू वहां से भाग जाना चाहती थी.

पिंपू ने भी उस दिन सोच लिया था कि वह चीचू को छोड़ेगी नहीं इसलिए उस ने उसे झट से रोक लिया और बोली, ‘‘अरे, जरा रुको और मेरी बात सुनो. तुम तो बहुत जल्दी नाराज हो गई. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मैं तुम्हें दोस्त बनाना चाहती हूं इसलिए मैं तुम से अपने मन की बात कह रही थी.’’ ‘‘लो, यह बात थी तो तुम सीधे कहती कि तुम मेरी दोस्त बनना चाहती हो. मेरी भी कोई दोस्त नहीं है. मुझे भी अकेले खेलना पड़ता है. आज से हम दोस्त हुए. अब हम साथसाथ ही खेलेंगे.’’

‘‘ठीक है, तो फिर चलो हम अभी से ही खेलते हैं.’’ पिंपू उत्साहित हो कर बोली. ‘‘अभी नहीं दोस्त, अभी मैं मां के हाथ का खाना खाने घर जा रही हूं. लौट कर आऊंगी तब खेलूंगी.’’ यह कह कर चीचू उछलती हुई अपने बिल की तरफ चली गई.

लंच के बाद पिंपू अशोक पेड़ की खोह में जा कर लेट गई, तभी चीचू आ गई. पिंपू को खेलना पसंद था इसलिए वह तुरंत खेलने को तैयार हो गई. दोनों मिल कर खूब खेले. थक जाने के बाद दोनों अपनेअपने घर चली गईं. अब चीचू और पिंपू रोज मिलते और खेलते. खेल के बीच में पिंपू जब दाना चुगने लगती तो चीचू को बहुत गुस्सा आता पर पिंपू उस की नाराजगी को टाल जाती और कहती, ‘‘दोस्त, मेरी तो मां नहीं हैं,

जो मेरे भोजन का इंतजाम करतीं. मुझे तो खुद ही अपनी मेहनत से भोजन इकट्ठा करना और खाना है और मैं भी तो बुरा नहीं मानती जब तुम खेल को बीच में छोड़ कर खाने के लिए घर भाग जाती हो.’’ ‘‘दोस्त, गलती हो गई. अब बुरा नहीं मानूंगी, लेकिन अब सचमुच मुझे भूख लगी है जल्दी से घर से खा कर आती हूं,’’ चीचू ने कहा.

‘‘आराम से आना क्योंकि मैं भी थक गई हूं इसलिए सोने जा रही हूं,’’ पिंपू बोली. चीचू के जाते ही पिंपू अपनी खोह में आराम करने लगी. पिंपू को नींद आ गई.

थोड़ी देर बाद ही पिंपू को चीचू की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘पिंपू, तुम कहां हो? जल्दी बाहर आओ.’’ ‘‘क्या हुआ, चीचू? तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?’’ नींद से जागती हुई पिंपू ने खोह से बाहर निकल कर घबड़ाती हुई चीचू को देख कर पूछा.

‘‘पिंपू, बहुत गड़बड़ हो गया. मां के ऊपर अनाज की पोटली गिर गई है जिस से उन को काफी चोट लग गई है. वे चलफिर नहीं सकतीं, इसलिए आराम कर रही हैं. पापा भोजन की तलाश में गए हैं. अब तो उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी. मुझे तो भूख लगी है.’’ चीचू परेशान होते हुए बोली. ‘‘दोस्त, मेरे पास कुछ खाना है लेकिन मैं तुम्हारी आदत खराब नहीं करूंगी. आज तुम खुद ही अपना खाना खोजोगी और खाओगी. मैं तुम्हारे साथ खाना ढूंढ़ने में तुम्हारी मदद जरूर करूंगी,’’ पिंपू बोली.

चीचू को भूख लगी थी इसलिए उस ने पिंपू की बात का विरोध नहीं किया. पिंपू के साथ चीचू खाना ढूंढ़ने और खाने लगी. आज चीचू को बहुत मजा आया. पेट भरने के बाद चीचू बोली, ‘‘शुक्रिया दोस्त, आज तुम्हारे सहयोग से खाना खोज कर खाने में बहुत मजा आया. नींद आ रही है इसलिए घर जाती हूं,’’ चीचू बोली.

‘‘एक बात बताओ चीचू, क्या तुम्हें मां के सामने खाली हाथ जाने में अच्छा लगेगा?’’ पिंपू ने टोका. चीचू हैरानी से बोली, ‘‘क्यों, क्या हुआ? रोज ही तो ऐसे जाती हूं फिर आज जाने में नया क्या है?’’

‘‘पहले तुम्हारी मां ठीक थीं पर आज तुम्हारी मां बिस्तर पर हैं,’’ पिंपू शांत स्वर में समझाते हुए बोली. ‘‘तो मैं क्या करूं दोस्त? मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है? तुम ही कोई उपाय बताओ?’’ चीचू सोचते हुए बोली.

‘‘हमेशा मां तुम्हारे खाने का इंतजाम करती थीं, आज तुम मां के लिए कुछ खाने की चीज ले कर जाओ.’’ ‘‘मैं ने तो कभी कोई काम किया ही नहीं, फिर मैं कहां से लाऊं खाने की कोई चीज?’’ चीचू निराश और दुखी हो कर बोली.

‘‘चलो चीचू, मैं तुम्हारी मदद करती हूं, पिंपू उत्साहित हो कर बोली. दोनों मिल कर खाना इकट्ठा करने लगीं. जब पर्याप्त मात्रा में खाने की सामग्री इकट्ठी हो गई तब पिंपू बोली, ‘‘लो चीचू, तुम मां को ये दे आओ. मां के लिए यह काफी है.’’

चीचू घर पहुंच कर सब से पहले मां के पास जा कर बोली, ‘‘मां, आप की तबीयत कैसी है?’’ ‘‘मैं तो ठीक हूं, बेटी. तुझे भूख लगी होगी. तेरे पापा खाना ले कर आते ही होंगे. तुम थोड़ी देर और सब्र कर लो,’’ मां ने कहा.

‘‘मां, आज मैं अपना खाना अपनेआप ढूंढ़ कर खुद ही खा चुकी हूं और आप के लिए भी खाना लाई हूं. लीजिए, खा लीजिए.’’ चीचू ने मां के सामने खाना रखा.

मां की आंखों में आंसू आ गए. वे खुश हो कर बोलीं, ‘‘बेटी, तू कब से बड़ी और समझदार हो गई है. इस से पहले तो तुम ने ऐसी समझदारी वाली बात कभी की नहीं, फिर ऐसी बुद्धि तुझे कहां से मिली?’’ ‘‘मां, ये मेरे दोस्त पिंपू का कमाल है. उसी की सलाह मान कर मैं आप के लिए दाना

लाई हूं.’’ ‘‘बेटी, मुझे बहुत खुशी हुई कि तुम्हारी दोस्त बहुत अच्छी और समझदार है, ऐसे नेक और सच्चे दोस्त की दोस्ती बहुत अच्छी होती है. तुम अपने दोस्त को ले कर घर आना. मैं उस

से मिलना चाहती हूं.’’ मां खुश हो कर खाना खाते हुए बोलीं. मां के खाना खाने के बाद चीचू खुशीखुशी दौड़ती हुई पिंपू के पास गई और बोली, ‘‘दोस्त, मां के चेहरे पर खुशी की जो झलक मैं ने आज देखी, वह दिखाने वाली तुम ही थी. तुम ने मुझ में आत्मविश्वास भरा और मुझे आत्मनिर्भर बनाया. अब मैं अपने खाने के लिए मां पर निर्भर नहीं रहूंगी बल्कि मां का भी सहयोग करूंगी.’’

चीचू की ये बातें सुन कर और उस में आए परिवर्तन को देख कर पिंपू बहुत खुश हुई. अब वे दोनों रोज खुशीखुशी खाना खोजने जातीं. चीचू की मां को अपने बच्चों की ऐसी दोस्ती पर बहुत गर्व हुआ. इसी खुशी के उपलक्ष्य में उन्होंने एकदिन बच्चों को अपने घर बुलाया और उन्हें तरहतरह के उपहारों से सम्मानित किया.

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