गृहशोभा विशेष

अनोखी चींटी बहुत आलसी थी. बरसात का मौसम आने वाला था. जंगल के दूसरे सभी प्राणी अपना भोजन जमा करने की तैयारी कर रहे थे. वहीं अनोखी दिन भर सोती रहती.

एक दिन सोमू गौरैया ने अनोखी से कहा, ‘‘अनोखी, तुम भी अपना भोजन जमा कर लो, नहीं तो बरसात में तुम्हें परेशानी होगी.’’

अनोखी हंस कर बोली, ‘‘क्यों? जब तुम जैसी सहेलियां हैं, फिर मुझे क्या जरूरत?’’ और वह वहां से चली गई.

देखतेदेखते बरसात का मौसम आ गया. तीन दिन तक बारिश नहीं रुकी. सभी पशुपक्षी अपने घरों में बैठे थे क्योंकि उन्होंने बारिश से पहले ही अपना भोजन जमा कर लिया था इसलिए उन्हें कोई चिंता नहीं थी.

केवल अनोखी ही थी जिस के पास खाने के लिए कुछ नहीं था. उस ने भूखे रहते हुए ये तीन दिन कैसे काटे, वही जानती थी.

बारिश रुकते ही वह बाहर निकली तो उसे भोली मधुमक्खी मिली. अनोखी ने उस से कहा, ‘‘भोली, थोड़ा सा शहद खाने को दो न, बहुत भूख लगी है. तुम्हारे छत्ते में बहुत शहद है.’’

‘‘अरे, शहद ऐसे ही थोड़े न बनता है? मैं हर फूल पर जाती हूं, फूलों का रस जमा करती हूं, फिर रस को छत्ते में लाती हूं. फूलों से छत्ते तक और छत्ते से फूलों तक मुझे कितने चक्कर काटने पड़ते हैं ये मैं ही जानती हूं. बहुत मेहनत से शहद बनता है.

‘‘जो शहद बना है, वह मेरे बच्चों के लिए है. मुझे क्षमा करो.’’ यह कह कर भोली अपने काम में लग गई. अनोखी खड़ी की खड़ी रह गई.

वह किट्टू मकड़े के पास गई और उस से थोड़ा सा मीठा मांगा. किट्टू तो था ही मुंहफट, तुरंत बोला, ‘‘ये मीठा ऐसे ही नहीं आता. बहुत मेहनत करनी पड़ती है इस मीठे को लेने के लिए.

‘‘कई बार तो जान बचानी मुश्किल हो जाती है जब किसी का पैर मेरे ऊपर पड़ जाता है. तुझे मीठा खाना है तो खुद मेहनत कर. भला रोजरोज तुझे कौन खिलाएगा.’’

उस की बात सुन कर अनोखी बहुत दुखी हुई. एक तो वह भूखी, ऊपर से ऐसी बात. उस ने सोचा कि वह जंगल के साथ लगे गांव जाएगी, जहां उस के मित्र रहते हैं. वह उसी दिन गांव अपनी सहेली किरन बिल्ली के घर पहुंची. किरन कहीं से दूध ला कर पी रही थी. अनोखी ने उस से कहा, ‘‘मुझे बहुत भूख लगी है, थोड़ा सा दूध मुझे भी दो न.’’

किरन ने भी वही उत्तर दिया कि दूध लेने के लिए मेहनत करनी पड़ती है. जिस भी घर में जाती हूं, वहां के लोग मेरे पीछे ही पड़ जाते हैं. कोई डंडा मारता है तो कोई थपकी. एक बार तो जमींदार की बहू ने मेरे ऊपर पत्थर ही फेंक दिया था. घी और मलाई तो मुझे अब देखने को भी नहीं मिलती, बस अब यह दूध ही है. तुम ही सोचो, अगर दूध तुम्हें दे दूंगी, तो मैं क्या पीऊंगी.

अनोखी समझ गई कि यहां भी उस की बात बनने वाली नहीं है. वह दुखी हो कर वहीं बैठ गई. उस ने देखा सामने से जिम्मी कुत्ता चला आ रहा है. वह जिम्मी के पास गई. उसे पूरा विश्वास था कि जिम्मी उसे खाने के लिए कुछ न कुछ जरूर देगा. जिम्मी के मुंह में एक कचौरी थी.

अनोखी ने उस से कहा, ‘‘जिम्मी भाई, बहुत भूख लगी है, थोड़ी सी कचौरी मुझे भी दो न.’’

उस ने झट से कचौरी खा कर कहा, ‘‘यह कचौरी मैं हलवाई की दुकान से लाया हूं. इस के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती है.

‘‘मैं रातरात भर जाग कर दुकान की रखवाली करता हूं. कई घरों में जाता हूं. कोई रोटी दे देता है, कोई डंडा मार कर भगा देता है.

‘‘तुम खुद क्यों नहीं चली जाती उस हलवाई की दुकान पर.’’ जिम्मी ने सलाह दी.

अनोखी हलवाई की दुकान पर पहुंची. वहां जलेबी, कलाकंद और लड्डू का चूरा बिखरा पड़ा था. उस ने तुरंत खाना शुरू कर दिया और खूब पेट भर कर खाया.

आज उसे अच्छा लगा, क्योंकि एक तो उस का पेट भरा, दूसरा आज उस ने किसी से मांग कर नहीं खाया था बल्कि अपना भोजन खुद जुटाया था.

तब उस ने सोचा कि पेट भरने के लिए सब अपनेअपने तरीके से परिश्रम करते हैं. मैं इतनी आलसी थी कि दूसरों से मांग कर खाती रही थी.

कहते हैं कि तब से आज तक चींटी मेहनत से अपना भोजन जुटाने में लगी हुई है और कठोर मेहनत, समर्पण और सजगता की मिसाल बनी हुई है.

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