स्कीवी गिलहरी ने बरगद के पेड़ पर नया घर खरीदा था. वहां से पूरा वन दिखता था. घर तक जाने के लिए पेड़ पर सीढि़यां भी बनी हुई थीं.

स्कीवी को अपने घर से बहुत प्यार था. उसी पेड़ पर पौली बंदर का भी घर था. उस का स्वभाव बहुत अच्छा था. जल्दी ही दोनों दोस्त बन गए.

एक दिन स्कीवी का दोस्त रस्टी गिलहरी उस से मिलने आई, वह बहुत बुरी स्थिति में थी.

‘‘अरे रस्टी, इतने दिनों कहां रहीं?’’ उसे देखते ही स्कीवी ने पूछा.

‘‘क्या बताऊं, मैं ने बहुत मुश्किल में दिन गुजारे हैं. मेरे पास कोई काम नहीं है.’’ रोंआसी हो कर रस्टी ने कहा, तो स्कीवी को उस पर दया आ गई. स्कीवी ने उसे अपने दोस्त जंबू हाथी से मिलवाया. उस ने रस्टी को अपनी दुकान पर काम दे दिया.

रस्टी के पास रहने के लिए घर नहीं था, इसलिए वह स्कीवी के घर पर ही रहने लगी. घर काफी बड़ा था, इसलिए कोई दिक्कत नहीं होती थी. रस्टी घर का खूब खयाल रखती थी.

एक दिन स्कीवी को कुछ दिनों के लिए अपने मामा के घर जाना पड़ा. ‘‘तुम चिंता मत करो. मैं घर की देखभाल करूंगी.’’ रस्टी ने उसे भरोसा दिया, तो स्कीवी को काफी राहत महसूस हुई.

उस की गैरमौजूदगी में रस्टी ने घर की अच्छी तरह से देखभाल की. उस ने कोयल रानी की मदद से पूरे घर को पेंट करवाया. फिर जीतू जिराफ की दुकान से कई फर्नीचर मंगवाए. घर की साफसफाई की.

कुछ दिन बाद जब स्कीवी लौटी, तो घर की रंगत बदली हुई देख कर दंग रह गई. रस्टी की मेहनत से वह काफी खुश हुई.

एक दिन बाजार से लौटते समय स्कीवी को लपटू लोमड़ मिल गया. लपटू को जानवरों में झगड़ा लगाने की आदत थी.

लोमड़ ने उसे रस्टी के खिलाफ भड़का दिया.? स्कीवी भी उस के झांसे में आ गई.

‘‘तुम अपना बोरियाबिस्तर बांधो और यहां से चलती बनो,’’ घर पहुंचते ही स्कीवी ने कहा, तो रस्टी हैरान रह गई.

‘‘मतलब?’’ उस की समझ में कुछ नहीं आया.

‘‘यह मेरा घर है. मैं यहां किराएदार रखूंगी. इसलिए तुम यहां से दफा हो जाओ.’’ स्कीवी ने कहा, तो रस्टी की आंखों में आंसू आ गए.

वह भी तैश में आ गई. बोली, ‘‘मैं ने भी इस घर के लिए बहुत कुछ किया है.’’

जब स्कीवी नहीं मानी, तो रस्टी भी अड़ गई. बोली, ‘‘मैं यहां से नहीं जाऊंगी.’’

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पौली यह तमाशा देख रहा था. उस ने दोनों को समझाया, ‘‘देखो, आपस में लड़ना अच्छी बात नहीं है. ऐसा न हो कि तुम्हारी लड़ाई से कोई तीसरा फायदा उठा ले.’’

लेकिन दोनों नहीं मानी. तूतू, मैंमैं करते हुए बाजार की ओर चल दीं.

दूर झाडि़यों में पूसी बिल्ली धूप सेंक रही थी. दोनों गिलहरियों को उधर से गुजरते देख कर वह खूब खुश हुई.

‘‘क्या बात है? तुम दोनों झगड़ क्यों रही हो?’’ उस ने पूछा, तो स्कीवी और रस्टी की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

‘‘कुछ नहीं मौसी,’’ रस्टी ने बहाना बनाया, ‘‘हम ऐसे ही तेज आवाज में बातें करती हैं.’’

‘‘अरे, सबकुछ बताती क्यों नहीं?’’ तैश में आ कर स्कीवी बोली, ‘‘दरअसल, हम घर के लिए लड़ रही हैं.’’

और फिर स्कीवी गिलहरी ने पूरी बात बता दी. उस ने पूछा, ‘‘अब बताओ मौसी, वह घर किस का हुआ?’’

पूसी सोचने का नाटक करने लगी. उस की तो किस्मत खुल गई थी. आंखों के सामने 2 गिलहरियां और एक घर नाचने लगा. ‘अभी तक तो मैं चूहे खाती थी. आज गिलहरियों का स्वाद भी चखूंगी.’ वह दोनों को पकड़ने की योजना बनाने लगी. वह मीठी आवाज में बोली, ‘‘इस का फैसला तो बहुत आसान है. लेकिन मैं अपना फैसला तुम दोनों के कानों में धीरे से बताना चाहती हूं, ताकि तुम से कोई नाराज न हो जाए. अगर मंजूर है तो बोलो, नहीं तो मैं चली, मुझे कई काम हैं.’’

‘‘नहीं मौसी, हमें तुम पर पूरा भरोसा है,’’ दोनों गिलहरियां जब उस के काफी करीब जा कर बोलीं, तो पूसी की लार टपकने लगी. झट से उस ने दोनों को पकड़ लिया.

‘‘मूर्ख गिलहरियो, अब मैं तुम्हारे घर पर ही तुम दोनों की सब्जी बनाऊंगी.’’ दांत पीसते हुए पूसी बोली, तो स्कीवी और रस्टी को अपनी गलती का एहसास हुआ.

अचानक रस्टी ने स्कीवी को कुछ इशारा किया.

दोनों ने एकसाथ बिल्ली के पैर में अपने नुकीले दांत गड़ा दिए. दर्द के मारे पूसी बिलबिला उठी, ‘‘हाय, मैं मर गई…’’

वह गिलहरियों को छोड़ कर अपना पैर पकड़ कर चिल्लाने लगी. इधर पकड़ से छूटते ही स्कीवी और रस्टी वहां से तुरंत घर की ओर भागीं.

घर पहुंचते ही स्कीवी बोलीं, ‘‘मुझे माफ कर दो, रस्टी. मैं भी बेकार ही उस लोमड़ की बातों में आ कर तुम्हें यहां से निकालने की सोचने लगी. यहां बहुत जगह है. हम दोनों आराम से रह सकते हैं.’’

‘‘हां स्कीवी, हमारी लड़ाई में उस दुष्ट बिल्ली का फायदा होता. जान भी जाती और यह प्यारा घर भी.’’ रस्टी ने भी अपनी गलती मानी. फिर दोनों मिलजुल कर रहने लगीं. पौली बंदर भी अब बहुत खुश था.