गुनगुन गौरैया लंच के बाद एक पेड़ पर आराम करने लगी. तभी एक स्पीकर से तेज आवाज सुन कर वह कूद गई.

‘‘ओह, इस शहर के लोग बहुत शोर मचाते हैं. जोरजोर से गाने बजाते हैं और अपनी गाडि़यों के हौर्न भी बहुत बजाते हैं.’’

तभी कुछ लोगों को बातें करते देख, वह भी उन की बातें गौर से सुनने लगी.

‘‘हमारे ग्रह के जंगल प्रतिदिन गायब होते जा रहे हैं. ‘वन महोत्सव’ पर हमें भी अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए. हमें आपस में मिल कर यह शपथ लेनी चाहिए कि हम अधिक से अधिक पेड़ लगाएंगे, ताकि हमारी पृथ्वी की हरियाली बनी रहे,’’ एक आदमी दूसरे आदमी से कह रहा था.

यह सुन कर गुनगुन कुछ सोचने लगी. ‘पेड़ तो हमारे घर हैं. यदि ये काटे जा रहे हैं, तो फिर हम कहां रहेंगे.’ गुनगुन सोच रही थी.

यह बात सोच कर गुनगुन दूसरे पक्षियों को भी यह बात बताने उड़ गई.

शाम को जब सारे पक्षी अपनेअपने घोंसलों में लौट आए तो गुनगुन ने एक मीटिंग बुलाई और सब से बताया कि जंगल काटे जा रहे हैं.

‘‘यह बात सही है. अमरूद के बगीचे में जहां मैं अमरूद खाने जाता था, वहां पेड़ ही नहीं हैं.’’ तोतू तोते ने दुखी होते हुए कहा.

‘‘इस के लिए इनसान ही जिम्मेदार हैं. वे ही हमारे वनों को खत्म करते जा रहे हैं,’’

कालू कौआ चिल्लाया.

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‘‘तुम ठीक कह रहे हो. लेकिन हम क्या कर सकते हैं?’’ कूकू कबूतरी बोली.

‘‘क्यों न हम छोटेछोटे पौधे लगाएं, जो धीरेधीरे बड़े पेड़ बन जाएं?’’ गुनगुन ने सलाह दी.

‘‘हां… हां, क्यों नहीं? यह अच्छा आइडिया है. सब से पहले हम गड्ढे खोदें, उस में बीज डालें और फिर प्रत्येक दिन उन में पानी डालते रहें.’’ कालू बोला तो गुनगुन ने सहमति में अपना सिर हिला दिया. पर गुनगुन ने देखा कि कालू और दूसरे पक्षी तो उस का मजाक उड़ा रहे हैं.

वह दुखी हो गई. ‘‘गुनगुन, पेड़ों को काटने के लिए इनसान जिम्मेदार हैं इसलिए पौधों को लगाने की जिम्मेदारी भी उन की ही है. हम जैसे छोटे पक्षी यह काम नहीं कर सकते.’’ यह कह कर कूकू और दूसरे पक्षी अपनेअपने घोंसलों में चले गए.

खुद को अकेला और असहाय पा कर गुनगुन भी अपने घोंसले में लौट गई. वह इस बात से दुखी थी कि किसी भी पक्षी ने उस का साथ नहीं दिया. लेकिन वह अभी भी वन में पौधे लगाने की बात सोच ??रही थी.

उस दिन के बाद से गुनगुन जहां भी कोई अनाज देखती, उसे अपनी चोंच में ले आती और वन की बंजर जमीन में डाल देती. सभी पक्षी उसे ऐसा करते देख कर खूब हंसते. कालू तो उस का हर समय मजाक उड़ाता रहता.

‘‘गुनगुन, तुम शायद शहर से यह बीज खरीद कर ला रही हो. अब जरा खाद और पानी ले आओ,’’ कालू मजाक उड़ाता. पर गुनगुन उस की बातों पर ध्यान नहीं देती.

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कई दिन गुजर गए. जल्दी ही मानसून आ गया. जमीन के भीगने से कई बीजों में अंकुर आ गए. और बरसात के पूरी तरह आते ही अंकुरित बीज से पौधे निकल आए.

वन में कई तरह के पौधे और पेड़ देख कर सभी पक्षी हैरान थे. ‘‘अरे, यह अलगअलग तरह के पेड़पौधे कहां से आ गए? पहले तो नहीं थे,’’ कालू बोला.

‘‘यह तो वही जगह है जहां गुनगुन बीज ला कर डाला करती थी,’’ कूकू बोली.

‘‘इस का मतलब ये सारे पेड़पौधे उन्हीं बीजों के हैं, जो गुनगुन यहां ला कर डाला करती थी,’’ तोतू हैरानी से बोला.

‘‘हां, लगता तो ऐसा ही है. हम उस का मजाक उड़ाते रहे. लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी. उस की मेहनत का ही परिणाम है कि आज हमारे वन में हरियाली छा गई है,’’ कूकू ने कहा.

‘‘हमें गुनगुन से इस बात के लिए माफी मांगनी चाहिए कि हम ने पौधे लगाने की उस की सलाह नहीं मानी,’’ तोतू बोला.

सभी ने अपनी गलती मानी और गुनगुन से माफी भी मांगी. सभी ने वादा भी किया कि अब सभी मिल कर पौधे लगाएंगे और अपने वन में और हरियाली लाएंगे.