गृहशोभा विशेष

दया अपने मातापिता के साथ हिलौक के एक छोटे से घर में रहती थी. उस के पिता किसान थे. दया का स्कूल घर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर था. वह खेतों और छोटे रास्तों से पैदल चलते हुए स्कूल जाती थी.

दया रास्ते में पेड़पौधों, पक्षियों, गिलहरियों और तितलियों से बातें करते हुए जाती थी. लेकिन कुछ दिनों से दया के मातापिता उसे चुपचाप और उदास देख रहे थे. उन लोगों ने उस की उदासी का कारण जानने की कोशिश की, पर कुछ पता न चला.????

खेतों में पूरे दिन काम करते हुए दया के मातापिता बहुत थक जाते थे, इसलिए दया से उस की उदासी का कारण पूछने का समय नहीं मिलता था.

दया पढ़ने के साथसाथ खेलों में भी बहुत अच्छी थी. उस के टीचर भी उसे बहुत प्यार करते थे. लेकिन कुछ दिनों से वह चुपचाप और उदास रहने लगी थी.

एक दिन दया के दादाजी ढ़ेर सारी मिठाइयां और फल ले कर घर आए. यह देख कर दया बहुत खुश हुई और दादाजी के गले से लिपट गई.

दादाजी गांव के प्रसिद्ध और बुद्धिमान व्यक्ति थे. वे गांव के लोगों की हर तरह से सहायता भी करते थे. दया के मातापिता ने दादाजी से दया की उदासी के बारे में बताया और इस का हल भी पूछा.

कुछ ही दिनों में दादाजी यह समझ गए कि दया की उदासी का कारण कहीं न कहीं उस के स्कूल और उस के दोस्तों से जुड़ा है. दादाजी ने यह बात दया के मातापिता को भी बताई.

दूसरे दिन दादाजी दया के साथ शाम को घूमने निकले. अभीअभी बारिश बंद हुई थी और आसमान में इंद्रधनुष छाया हुआ था. स्कूल के पास घास के ऊपर मोर के पंख बिखरे थे.stories for kids

दादाजी का हाथ पकड़ कर दया उछलती हुई चली जा रही थी. वह जब खुश होती थी, तो लगातार बोलती रहती थी. दादाजी प्यार से उस के स्कूल और दोस्तों के बारे में पूछ रहे थे.

अचानक दया ने दादाजी का हाथ छोड़ दिया और पास की एक चट्टान पर उदास हो कर बैठ गई. दादाजी उस के पास बैठ गए और चेहरे को चूम लिया. फिर बोले, ‘‘समझदार लड़की छोटीछोटी बातों पर नहीं रोती.’’

अपने आंसू पोंछते हुए दया बोली, ‘‘सोनू, चिंटू, ट्विंकल, पीटर, स्नेहा और लिली हमेशा मुझे चिढ़ाते रहते हैं. वे दूसरों से कहते हैं कि मैं टीचर का कोई काम इसलिए करती हूं ताकि वे अच्छे अंक और पुरस्कार दें. वे खुद न तो ठीक से पढ़ते हैं, न ही खेल और कला में उन की रूचि है. लेकिन मैं जब स्टेज पर डांस करती हूं तो वे तब तक सीटी बजाते रहते हैं, जब तक टीचर उन्हें नहीं रोकते. कल तो सोनू और पीटर ने मुझे धक्का मार कर गिरा दिया.’’

दया रोए जा रही थी. ‘‘स्कूल में चिंटू पक्षियों और तितलियों के पीछे भागता रहता है और लिली तथा स्नेहा फूल तोड़तोड़ कर इधरउधर रास्तों पर फेंक देती हैं, जबकि मैं इन बातों का बहुत ध्यान रखती हूं.’’

दादाजी अब दया की चुप्पी और उदासी का कारण समझ चुके थे. उन्हें यह पता चल चुका था कि दया प्रकृति और जीवजंतुओं से बहुत प्यार करती है. वे कुछ देर चुप बैठे रहे.stories for kids

दादाजी ने दया के आंसू पोंछे और जमीन पर कतार में खाना ले जाती चींटियों को दिखाया. उन्होंने दया से पूछा कि ये चींटियां क्या कर रही हैं. दया ने सुबकते हुए कहा कि ये चींटियां बरसात के मौसम के लिए अपना भोजन जमा कर रही हैं.

‘‘मैं अब एक छोटी सी शरारत करता हूं,’’ कह कर दादाजी ने अपनी उगलियों से चींटियों की कतार को तोड़ दिया.

चींटियां डर गईं और इधरउधर भागने लगीं. उन का जमा किया हुआ भोजन भी छूट गया. थोड़ी देर के लिए दादाजी भी डर गए, फिर वे खुद भी उन चींटियों को देखने लगे और दया से भी देखने के लिए कहा.

कुछ मिनटों बाद चींटियां फिर से वहां इकट्ठी हो गईं और अपना भोजन भी जमा करने लगीं. बिना समय गंवाए सभी भोजन ले कर फिर से अपने घर की ओर चल पड़ीं.

दया हैरानी से यह सब देख रही थी. उसे तो लगा था कि चींटियां डर कर वहां दोबारा नहीं आएंगी. दादाजी ने कहा, ‘‘दया, कुछ लोग किसी न किसी बहाने तुम्हें दुख पहुंचाएंगे, परेशान करेंगे. जो लोग दूसरों की सफलता और खुशियों से जलते हैं, वे कुछ न कुछ परेशानियां खड़ी करते रहते हैं. तुम्हें ऐसे बच्चों को सबक सिखाने के लिए न सिर्फ शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक और भावनात्मक रुप से भी मजबूत बनने का प्रयास करना चाहिए. लेकिन ऐसे बच्चों के बारे में तुम्हें अपने टीचर और मातापिता को भी जरूर बताना चाहिए. ताकि ऐसे बच्चों को उन के द्वारा की जा रही शरारतों के बारे में समझाया जा सके.’’

दादाजी ने आगे कहा, ‘‘तुम जब फूल तोड़ती हो, तो पेड़पौधे खिलना नहीं बंद कर देते. तुम्हारी मम्मी प्रत्येक दिन मुरगियों के अंडे लाती हैं लेकिन इस से मुरगियां अंडे देना बंद नहीं करतीं. शरारती बच्चे पत्थर मार कर आम के पेड़ से आम तोड़ लेते हैं, लेकिन आम का पेड़ फल देना कभी बंद नहीं करता. इसी तरह तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो और सफल होने का प्रयास करो. अपने काम में टांग अड़ाने वालों पर ध्यान मत दो.’’

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दादाजी की बात दया के दिल को छू गई. उस के चेहरे पर मुसकराहट आ गई. उस ने दादाजी के गले से लिपटते हुए कहा कि वह किसी के व्यवहार से प्रभावित हो कर अब कभी न तो रोएगी, न ही उदास होगी.

वे लोग चलतेचलते फिर से स्कूल के घास के मैदान तक पहुंच गए थे. उन्हें देख कर पास के जंगल में मोर नाचने लगे. दादाजी ने घास पर गिरे कुछ मोर पंख उठा कर दया को दे दिए.

दया मुसकराई. सुंदर तितलियां आसपास उड़ रही थीं. दादाजी भी धीरेधीरे मुसकराने लगे.

VIDEO : पीकौक फेदर नेल आर्ट

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