मई का महीना था. गरमी की छुट्टियां शुरू हो गईं थीं. इस साल की छुट्टियां जाह्नवी के लिए विशेष थीं. वह अपने दोस्तों श्रुति, निखिल और राजीव को अपने गांव रामपुर ले जाने वाली थी. परीक्षा खत्म होने के दूसरे ही दिन जाह्नवी बस से अपने दोस्तों के साथ रामपुर के लिए चल पड़ी. यात्रा हंसते, खेलते पूरी हुई. शाम को वे लोग रामपुर पहुंच गए. जाह्नवी का घर बस स्टेशन से नजदीक ही?था. बच्चे दौड़ते हुए घर पहुंच गए. जाह्नवी के मातापिता भी पीछेपीछे थे. जाह्नवी के दादाजी घर पर ही थे. उन्होंने जाह्नवी और उन के दोस्तों का स्वागत किया.

जाह्नवी की दादी ने सभी मेहमानों को पानी और आमरस पीने के लिए दिया. ‘‘वाह दादी, मजा आ गया. मुझे तो आमरस बहुत पसंद है. क्या इसे आप ने घर में ही बनाया है?’’ जाह्नवी ने पूछा.

‘‘हां,’’ दादी बोलीं, ‘‘यह आमरस मैं ने अपने बगीचे के आमों से बनाया है. मैं ने तुम्हारे लिए आमों का अचार भी बनाया है.’’ ‘‘इसलिए तो आप मुझे पसंद हो,’’ जाह्नवी ने मुसकराते हुए कहा.

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‘‘कल सुबह बच्चों को आम का बगीचा घूमने के लिए जाना चाहिए,’’ जाह्नवी के दादाजी ने कहा.

‘‘बहुत मजा आएगा,’’ श्रुति ने कहा. ‘‘हम लोगों ने कभी एक जगह कई आम के पेड़ नहीं देखे हैं.’’ दूसरे दिन सुबह बच्चे जल्दी जग गए. वे नहाधो कर तैयार हो गए.

दादी ने उपमा बनाया था. जाह्नवी और उस के दोस्तों ने उपमा खा कर चाय पी और दादाजी के साथ बगीचे की ओर चल पड़े. जल्दी ही सभी बगीचे में पहुंच गए.

‘‘अरे वाह, यहां तो कई आम के पेड़ हैं,’’ निखिल हैरानी से बोला. ‘‘और इन आमों को देखो, कुछ पके हुए हैं और कुछ नहीं,’’ राजीव बोला.

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‘‘दादाजी, आप इन आमों को कैसे तोड़ते हैं?’’ श्रुति ने पूछा. दादाजी ने बताया, ‘‘यह काम 2 लोगों द्वारा किया जाता है. वे आमों को तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ जाते हैं. मैं ने आज उन्हें बुलाया है. तुम्हारी दादी चाहती हैं कि तुम्हें आमरस और अचार बनाना सिखाया जाए. हम अचार के लिए हरे आम लेंगे और आमरस के लिए पके हुए आम.’’

‘‘यह बगीचा कितना पुराना है?’’ जाह्नवी ने पूछा. ‘‘और आप इन पेड़ों का ध्यान कैसे रखते हैं?’’ जाह्नवी के दादाजी ने जवाब दिया, ‘‘यह आम का बगीचा लगभग 25 साल पुराना है. इस की शुरुआत मेरे पिताजी ने की थी. हमें इन पेड़ों का बहुत ध्यान रखना पड़ता है. इन में संतुलित मात्रा में पानी और खाद डालना पड़ता है.

‘‘लेकिन कभीकभी बारिश के जल्दी आ जाने से आम का फसल खराब भी हो जाता है.’’ जब दादाजी बच्चों से बात कर रहे थे, उस समय 2 आदमी कच्चे और पके आम तोड़ कर अलगअलग थैलों में रख रहे थे. जल्दी ही वे लोग घर की ओर वापस चल पडे़.

घर पहुंचते ही दादी ने पूछा, ‘‘आम का बगीचा कैसा लगा?’’ ‘‘बहुत अच्छा.’’ बच्चों ने कहा.

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दादी बोलीं, ‘‘कल तुम्हें अचार और आमरस बनाना सिखाऊंगी.’’ ‘‘ठीक है, दादी.’’ सभी ने एकसाथ कहा.

दूसरे दिन दादी बच्चों के साथ बैठ गईं. उन्होंने कहा, ‘‘सब से पहले हम आम का अचार बनाएंगे. जाह्नवी, सारे हरे आम धो लो.’’ जाह्नवी ने आम धो लिए. फिर दादी ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें बताती हूं कि अचार बनाने के लिए आम को कैसे काटा जाना है.’’ दादी ने आम काट कर दिखाए. बच्चे दादी के कहने के अनुसार सबकुछ करने लगे.

दादी ने आम के टुकड़ों पर सरसों के दाने के साथसाथ कई तरह के मसाले और नमक भी डाल दिए. उन्होंने बताया, ‘‘नमक इसे संरक्षित करता है. अब हम इसे शीशे की जार में डालेंगे और सूरज की रोशनी में रख देंगे. यह 15 दिनों में तैयार हो जाएगा.’’ आचार बनाने के बाद दादी ने कहा, ‘‘आओ, अब हम आमरस बनाते हैं. यह बहुत आसान है. हम इस के लिए पके हुए आमों का उपयोग करेंगे. निखिल, पके हुए आमों को धो लो.’’

निखिल ने पके हुए आमों को धो कर दादी को दे दिए. दादी ने कहा, ‘‘अब हम इस आम का जूस अपने हाथों से निकालेंगे. हम इस जूस को एक बरतन में जमा करेंगे और फिर इस में चीनी मिला देंगे.’’

बच्चों ने भी दादी के कहे अनुसार आमरस खुद ही बनाए. आमरस और आम का अचार बनाने के बाद बच्चों को लगा कि उन्होंने गरमी की छुट्टियों का सही उपयोग किया है. जल्दी ही एक महीना गुजर गया. जाह्नवी और उस के दोस्त वापस मुंबई लौटने की तैयारी करने लगे. दादी ने हर बच्चे को आम के अचार का 1-1 जार दिया. साथ में कुछ आम भी दे दिए. बच्चे बहुत खुश थे.

दादाजी ने कहा, ‘‘अगले साल फिर आना.’’ ‘‘जी, बिलकुल दादाजी,’’ बच्चों ने कहा.