भावना दिल्ली की थीं, पर इटली में काम करती थीं. वहीं उन्होंने एक रैस्टोरैंट के मालिक से प्रेम विवाह किया. अब दोनों मिल कर अपना काम करते हैं. भावना कहती हैं, ‘‘मुझे शुरूशुरू में बड़ा अचरज हुआ जब पता चला कि यहां इटली में भी सासबहू की बातें भारत जैसी ही हैं. मैं काफी सांवली हूं जबकि मेरे पति आंद्रयै काफी गोरेचिट्टे, लंबेचौड़े और हैंडसम हैं. मेरी सास ने जब मुझे पहली बार देखा तो वे खुश नहीं थीं. अपने बेटे को उन्होंने समझाने की भरसक कोशिश की. उन का कहना था कि बहू ऐसी तो होनी चाहिए, जो आंखों को अच्छी लगे. तुम इतने मूर्ख होगे यह मुझे मालूम न था. जब इस के जैसे सांवले और नाटे बच्चे हमारे घर में घूमेंगे तो मैं उन्हें प्यार नहीं कर पाऊंगी. इस ने कोई काला जादू कर के तुम्हें फंसा तो नहीं लिया? तुम ढंग से सोच लो…

‘‘इत्तफाक से मेरे दोनों बच्चे प्यारे, सुंदर और उन लोगों जैसे हैं तो गाड़ी चल रही है. फिर भी मेरी सास ने अपने बेटे का मुझ से प्यार देख कर मुझे काफी तराशा और निखारा. जिम जौइन कराया. 10 किलो वजन कम कराया. हेयरस्टाइल और ऐसे ही तमाम नुसखों से मुझे निखारा. वे आज भी यानी शादी के 11 साल बाद भी मेरे प्रति मुस्तैद और चौकन्नी रहती हैं. वे देखती रहती हैं कि मैं पति का ध्यान रखती हूं कि नहीं. उस की कमाई फालतू तो नहीं उड़ाती और उन के पोतेपोतियों की परवरिश कैसी है वगैरह.

‘‘वहां भी नईपुरानी किसी भी उम्र की बहुएं मिलती हैं तो सास, ननद, देवर की खूब बातें करती हैं. वहां के पतियों की भी अपेक्षा रहती है कि उन के घर वालों का ध्यान रखा जाए.’’

लेनदेन भी है मुद्दा

ऐलियाना (बदला हुआ नाम) विदेश प्रसारण सेवा में हैं. वे कहती हैं, ‘‘मैं वैसे तो इंगलैंड की हूं पर इधर 4 साल से दिल्ली में हूं. मैं कई देशों में सेवाएं दे चुकी हूं और इस क्षेत्र से जुड़ी होने के कारण किसी भी देश के समाज को मुझे नजदीक से देखने का अवसर मिलता है. हालांकि भारत जैसी दहेज प्रथा विदेशों में नहीं है फिर भी वहां काफी लेनदेन है.

‘‘मेरी सास अपना स्टेटस खूब ऐंजौय करती है. मैं हिंदुस्तान में रहने के कारण कई बार वहां के त्योहार या स्पैशल डेज भूल जाती हूं, तो वे बाकायदा फोन या मेल के जरीए एतराज जताती हैं. वे मदर्स डे, क्रिसमस या ऐसे ही किसी मौके पर दिए जाने वाले उपहार खुद साथ चल कर खरीदना चाहती हैं. वहां भी बेटे द्वारा दिए गए उपहार की चर्चा आम बात है और बहू के कारण बेटे की नजरें बदल गई हैं, यह माना जाना भी आम है.

‘‘मैं भारत से अपनी सास के लिए छोटीछोटी चीजें ले कर जाती हूं तो वे बच्चों की तरह चहक उठती हैं. ससुर भी घर में आनेजाने वालों को गर्व से बताते हैं कि ये चीजें उन की बहू ले कर आई है. वे मुझ से और मेरे पति से उम्मीद करती हैं कि हम क्रिसमस जैसे बड़े मौके पर पार्टी करें और इन के कजिन्स को भी उपहार दें. हर बहू की तरह मैं ने भी ससुराल वालों से अपनी सास के बहू रूप में बिताए समय की पड़ताल की तो जाना कि वे अपनी सास की काफी अच्छी बहू रही हैं. दोनों साथसाथ घूमनाफिरना, सिनेमा देखना, बाहर खाना ऐंजौय करती रही हैं. शायद इसीलिए वे मुझे भी ऐसी बहू के रूप में देखना चाहती हैं. पर मैं थोड़ी रिजर्व हूं जिस की कमी मेरे पति अपनी उदारता से पूरी करते हैं.’’

ऐलियाना की एक कुलीग ओलिविया कहती हैं, ‘‘बच्चे के बड़े हो जाने पर भी मां का दिल उसे बच्चा ही मानता रहता है. मेरी सास मुझ में अपना रूप खोजती हैं. वे चाहती हैं मैं उन के बेटे की देखरेख उन की तरह ही करूं. उन्हें यह अच्छा नहीं लगता कि उन का सुबह जल्दी उठने वाला बेटा मुझ से शादी के बाद देर से उठने वाला बन गया है. मैं ने पाया है कि सासबहू के रिश्ते में लेनदेन कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. मुद्दा भावनाओं का है कि आप किस तरह अपना प्यार जताते हो.

‘‘मैं कुर्ग, चिकमगलूर और ऐसे ही प्रसिद्ध जगहों की कौफीचाय वगैरह ले कर जाती हूं तो वे बागबाग हो जाती हैं. कई लोगों को वे ये चीजें बना कर पिलाती हैं. कई बार तो इन छोटी सी चीजों के लिए वे अपनी ओर से पार्टी रख लेती हैं. वे अपनी ओर से भी मुझे कभी खाली हाथ विदा नहीं करतीं. मैं अब समझ पाई हूं कि आप को प्यार जताना भी आना चाहिए. गिफ्ट तथा फोन आदि के जरीए उसे जल्दी व ज्यादा आसानी से जताया जा सकता है.’’

अपेक्षाएं भी खूब

अकसर सास चाहती है कि बहू उस से कुछ हुनर सीखे. मार्टिना अमेरिकन बहू हैं. वे कहती हैं, ‘‘मेरी सास मेरे मां बनने के बाद मेरी देखरेख के लिए आईं, तो उन्हें बच्चे को बौटल से दूध पिलाना नहीं रुचा. इसी तरह मेरा किचन में जा कर मनपसंद खाना खाना भी नहीं रुचा. इस कारण पति की और मेरी अनबन होने लगी. जब पति ने मेरा ध्यान इस ओर दिलाया कि 60 की उम्र में भी लोग मेरी मम्मी को 30 का समझते हैं, जिस का कारण उन का हुनरमंद होना ही है, तो मैं ने कुछ दिनों के लिए उन की बात मान ली. पर अगली बार मां बनने पर मैं ने अपनी मां को बुलाया. मेरे पति को दुख है कि मैं उन की मां को नहीं समझ पाई. साथ ही उम्र से पहले मैं अधेड़ दिखने लगी हूं.’’

दिल्ली के एक परिवार की नीदरलैंड की बहू केन्यूसी कहती हैं, ‘‘वहां तो सासें अपने बेटों से ही नहीं बहुओं से भी पर्सनल बातें पूछ लेती हैं. वहां भी सासससुर चाहते हैं कि उन का आदर व लिहाज किया जाए. दुखसुख के बारे में पूछा जाए. पोतेपोतियों को उन के पास छोड़ा जाए. उन के दूसरे बेटेबहू या बेटियों के प्रति भी प्यार रखा जाए. ‘पति का पैसा केवल मेरा है’ जैसी स्थितियां वहां भी झिकझिक व तलाक का कारण बनती हैं. अभी दुनिया भर में मंदी का दौर चला तो कई सासों ने बेटेबहुओं से अपने दूसरे बेटेबेटियों की मदद की अपेक्षाएं की. दूसरे देश, कल्चर और नस्ल की बहू आने पर भी वहां अपेक्षा की जाती है कि बहू उन के बेटे व उस के देश तथा कल्चर के अनुरूप ढले. उन के बेटे को ऐसा न करना पड़े. जब कभी मौका आए तो वह परिवार के और लोगों का भी सहयोग करे तथा उदारता का परिचय दे.’’

तुलना भी खूब

विदेशों में देवरानीजेठानी व बहूबेटी की तुलना भी खूब है. रेशम ने अपने ही कुलीग अमेरिकन युवक से शादी की. वे कहती हैं, ‘‘वहां 4 सासें मिलते ही बहुओं के लेनदेन तथा स्वागतसत्कार की तुलना करने लगती हैं. मेरी सास तो मुझ से मेरे मुंह पर ही कह देती हैं कि मैं सोचती थी कि भारतीय लड़की मेरा ज्यादा ध्यान रखेगी पर तुम्हारी तुलना में जरमन बहू ज्यादा अच्छी है. वह भले ही तुम्हारे जितना लेनादेना नहीं करती पर मुझे आदरमान देती है. जिंदगी के मेरे 70 सालों के अनुभव से लाभ उठाती है. कहीं जानेआने से पहले बताती है, शेयर करती है.

‘‘तब मैं ने सोचना शुरू किया कि दुनिया भर की मांएं एक जैसी हैं. अगर बेटों को बहू चुनने की और उस से छुटकारा पाने की आजादी है तो इस का मतलब यह नहीं कि वे मनमानी करते फिरें. वहां सासें बहुओं पर निगरानी रखती हैं कि उन का कहीं और अफेयर न हो जाए, वे उन के बेटों को ठग न लें, डाइवोर्स के मामलों में भी देवरानीजेठानी या आसपड़ोस के अच्छे रिश्तों का हवाला दे कर संबंधों को निभाने की कोशिशें करवाती हैं.’’ रशियन मूल की श्रीमती आला कहती हैं, ‘‘रशियन सासों को अभी भी बच्चों के पालने की पुरानी स्टाइल और नुसखों पर गर्व है. वे घरेलू बहू भी पसंद करती हैं और जरूरत पड़ने पर जितना हो सकता है बहुओं का घर भी संभालती हैं. इस कारण नई पीढ़ी की बहुओं और पुरानी पीढ़ी की सासों में बहस व द्वंद्व आदि आम हैं.’’

शोषण, दोहन तो नहीं

विदेशों में नौकर आसानी से नहीं मिलते. ऐसी स्थिति में काम को ले कर पतिपत्नी और घर के और लोगों में लड़ाइयां आम हैं. बच्चा होने पर बहुएं उम्मीद करती हैं कि सासें आ कर उन की सारसंभाल करें. सासों को लगता है कि बहू उन्हें केवल बेबी सीटर न समझे. अगर वे अपना घर छोड़ कर आएं तो अपने पति के साथ रहने खानेपीने व सोने की व्यवस्था भी आरामदायक हो. उन की सेवा का मोल भी बहू समझे. इसी तरह नौकरीशुदा बहू टूअर या किसी कारण से उन के पास बच्चा छोड़ जाए तो उन पर भरोसा करे. 2 पैसा भी हाथ पर रखे. उन के खर्चों और सुविधाओं का भी ध्यान रखें. दुनिया इस हाथ ले उस हाथ दे के सिद्धांत पर अच्छी चलती है. शोषणदोहन कर के कोई कितना ही खुश हो ले पर वह लंबी रेस का घोड़ा साबित नहीं हो सकता.

भारत मूल के जरमन काउंसलर प्रभु कई देशों का भ्रमण कर चुके हैं और कई सासबहुओं को परामर्श दे चुके हैं. वे कहते हैं कि पति और बेटे पर प्रभुत्व जमाने की चाह सासबहू रिश्ते का मूल है. चाहे नकारात्मक स्थिति हो चाहे सकारात्मक कई बहुएं मांबेटे की सहज आत्मीयता को गलत रिश्ते का नाम दे देती हैं, तो कहींकहीं सासें बहू को बेटे को लूटने, ठगने वाली के रूप में देखती हैं. भावात्मक रिश्ते पूरी दुनिया में एक जैसे हैं. उन्हें समझदारी, सूझबूझ तथा प्यार से हैंडल करना आना चाहिए या सीखना चाहिए वरना इन के बीच पुरुष 2 पाटों के बीच पिसने जैसा महसूस करता है.

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