शायद ही ऐसी कोई पत्नी होगी जो अपनी शादी पर 2-4 आंसू न बहाती हो. शादी के कुछ साल गुजरने के बाद पति में तो अपनी भावनाएं व्यक्त करने की काबिलीयत जैसे कुम्हला सी जाती है और पत्नी अपने पति को दिनबदिन नीरस बनता देखती रहती है, जिस से उस का मन व्यग्रता और हताशा से भरने लगता है. ये दूरियां एक ऐसी कशमकश पैदा करती हैं जिस की शिकायत पत्नियां बरसों से करती आई हैं, उन्हें रविवार की दोपहर को क्रिकेट मैच में, अखबार के पन्नों में या फिर चुप्पी में सिमटा या लिपटा पति मिलता है.

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार पतिपत्नी के बीच बढ़ती दूरियों के लिए उन की स्वभावगत कमियां इतनी जिम्मेदार नहीं होतीं जितनी दंपती की आपसी बातचीत में आई कमी. स्टेट यूनिवर्सिटी औफ न्यूयार्क के मैरिटल थेरैपी क्लीनिक के निदेशक व क्लीनिकल साइकोलोजिस्ट के. डेनियल ओ लैरी के अनुसार, दांपत्य में जो सब से बड़ी व आम समस्या देखने को मिलती है वह पति के द्वारा अपनेआप को दूर रखने या अपने को समेट लेने से आई दूरियोें के कारण होती है. यह सब से ज्यादा नुकसानदेह होती है. इस समस्या का समाधान भी सब से मुश्किल होता है. ये दूरियां गुजरते समय के साथ ज्यादा गंभीर बनती जाती हैं, क्योंकि पति समय के साथसाथ अपने व्यवसाय और कैरियर में अधिक उल झता जाता है.

बढ़ती दूरियां

यह कैसी विडंबना है कि जहां पुरुष ने पहले की तुलना में अपनी भावुकता को खुली छूट देते हुए भावनाओं को व्यक्त करने से जुड़ी  िझ झक त्यागी है, वहीं अपनेआप में सिमटे रहने का उस का अपना अलग ही अंदाज दांपत्य में मुश्किलें खड़ी करने लगा है. मैगी ने अपनी मशहूर पुस्तक ‘इंटीमेट पार्टनर्स : पैटर्न इन लव एंड मैरिज’ में लिखा है कि जहां तक मैं सम झती हूं, क्लीनिकल साहित्य में किसी भी प्रकार के वैवाहिक संबंध में इतना उल झाव नहीं देखा जाता जितना उल झाव तब पैदा होता है, जब पति अलगथलग रहने लगे व अपनेआप में सिमटने लगे. यही बात अगर बेबाकी से कही जाए तो हताश पत्नी के लिए पति अलभ्य और अप्राप्य बन जाता है.

हताश पत्नी, जो कि भावनात्मक रूप से जिस पतिरूपी पुरुष में विश्वास के साथ यह आशा रखती है कि वह उसे प्यार करता है और उसे हमेशा सहारा देगा, वही उसे एकदम गैर जैसा लगने लगता है, क्योंकि पति की तरफ से उसे ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता, जो पत्नी को यह महसूस कराए कि वह उस की भावनाओं के प्रति कैसा महसूस करता है. पति ऐसे हालात में पत्नी की बातों का जवाब सपाट तरीके से देता है. उसे बांहों में भरता भी है तो महज अपनेआप से जुड़ी सेक्स की इच्छा के लिए. वह पत्नी को यह महसूस नहीं कराता कि वह उस के करीब रहना चाहता है.

इस तरह की दूरियां किसी  झगड़े, तनाव या नाराजगी से नहीं होतीं. इन दूरियों का जिम्मेदार स्वयं पति होता है, क्योेंकि ये उस के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्तर पर सिमटने के कारण होती हैं. जया गुप्ता के अनुसार, जब अचानक उन का गर्भपात हुआ तो उस के बाद उन के पति उन से दूरदूर रहने लगे. पति का शरीर उन के पास बैठा होता था और मन कहीं दूर रहता.

अभिव्यक्ति का अभाव

कई बार ग्लानि का शिकार हो कर अपने द्वारा बुनी गई शंकाओं में पति खुद ही उल झते जाते हैं और उन्हें अपने अंदर पनपती ठंडक और रूखेपन का खुद ही एहसास नहीं होता. डा. चंदन गुप्ता के अनुसार, ज्यादातर पुरुष ऐसे ही होते हैं. वे महिलाओं की तरह अपनी भावनाओं को खुल कर नहीं दर्शाते. पुरुषों को बचपन से यही सिखाया जाता है कि उन्हें अपनी भावनाओं को जाहिर नहीं करना है, जबकि महिलाओं को अपनी भावनाएं व्यक्त करने की पूरी छूट होती है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक सैमुअल ओशेरसन का मानना है कि अपनेआप में सिमटने की पुरुष की प्रवृत्ति के पीछे उस की किशोरावस्था के हादसों से जुड़े कुछ गहरे दुखदायी घाव होते हैं, जो समय के लंबे अंतराल के बावजूद मनोवैज्ञानिक स्तर पर नहीं भरते. मनोवैज्ञानिक स्तर पर आहत ऐसे व्यक्ति मानसिक  अकेलेपन से बहुत कम उबर पाते हैं. फ्रायड के अनुसार, पुत्र जब पिता की स्वीकृति या प्रशंसा पाने के लिए मां के प्रति अपने आकर्षण को  झटक देता है तो मां से भावनात्मक दूरी उस पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ती है, जिस से उबरने के लिए वह सारी उम्र जू झता रहता है. वह जो खो बैठता है उसी की आदर्शमय कल्पना को थामे रहता है और दृढ़ता के साथ अपनी भावनात्मक आवश्यकताओं के लक्षणों को छिपा जाता है. फ्रायड द्वारा इसे पुरुष में उत्पन्न ईडियस अंतर्द्वंद्व का नाम दिया गया है. ऐसी स्थिति में पति जब बालसुलभ इच्छाओं और आवश्यकताओं से घिरता है तो पत्नी को उसे एक छोटे बच्चे की तरह सम झने की आवश्यकता होती है.

कई पति, पत्नी से मिले अनुराग और उस की दिलचस्पी का गलत अर्थ निकालते हैं. उन्हें लगता है कि भावनात्मक रूप से कमजोर पलों में पत्नी उन के मन की गहराइयों में छिपे राज या अनकही अनुभूतियों तक पहुंचना चाहती है. इस तरह का पत्नी में अविश्वास उन के संबंधों की दूरियां बढ़ाता है. पत्नी के प्यार को मात्र रि झाने और मन की थाह लेने की प्रक्रिया न सम झें, क्योंकि पत्नी प्यार में राजनीति नहीं करती.

भावनाओं को जानें

जैविक रूप से भी पुरुष अपनी भावनाएं छिपाता है. कोरनेल मेडिकल सेेंटर, न्यूयार्क के मनोवैज्ञानिक विश्लेषक जौन मुंडेर रौस के कथनानुसार, महिलाओंकी अपेक्षा पुरुष ज्यादा आक्रामक प्रवृत्ति के होते हैं और पुरुष से जुड़ी यही विशेषता हर जाति और हर संस्कृति के पुरुषों में समान पाई जाती है. पुरुष जितना ज्यादा आक्रामक प्रवृत्ति का होगा उस में संवेदनशीलता और भावनात्मक रूप से जुड़ने की प्रवृत्ति की उतनी ही कमी पाई जाएगी. पुरुष बचपन से ही मां के जरिए संवेदनशीलता और भावनात्मकता का अनुभव करता है. पिता का व्यक्तित्व कठोरता, दृढ़ता और गंभीरता सिखाता है. वह यही सब देखते हुए बड़ा होता है तो उसे अपनी भावनात्मक कमजोरियां और डर छिपाने की आदत पड़ जाती है. यही कारण है कि वह अपने डर व परेशानियां पत्नी से छिपाता हुआ उस से दूर होने लगता है.

पत्नियां पति को ले कर पनपती दूरियों से परेशान हो सकती हैं. लेकिन इस समस्या का हल पहचान नहीं पातीं. पत्नी को पति के मन की गहराइयों में छिपी चिंताओं और डरों को जानना होगा. तभी वह दांपत्य में पति की चुप्पी से पनपती दूरियों को पाट पाएगी. न्यूयार्क की वैवाहिक व सेक्स संबंधों की थेरैपिस्ट शिर्ले जुसमैन के अनुसार एक तरफ तो पत्नी चाहती है कि पुरुष अपने मन की सभी बातें उस के आगे खोल कर रख दे और दूसरी तरफ जैसे ही पुरुष ऐसा करता है तो वह सहम जाती है, क्योंकि उसे बचपन से यही सिखाया जाता है कि भावनात्मक कमजोरी पुरुष के लिए अच्छी नहीं. पति कई बार पत्नी को इसी डर से बचाए रखने के लिए अपनी भावनाएं, भय और शंकाएं पत्नी से नहीं बांटता. इसलिए अगर पत्नी चाहती है कि पति अपनी चिंताएं और परेशानियां बांटे, अकेले ही चुप्पी लिए दूर न होता चला जाए तो उसे यह बात पूरी तरह सम झनी होगी कि पुरुष को भी अपने भय और चिंताएं व्यक्त करने का हक है.

पति अपनी भावनाएं व्यक्त करें, इस के लिए पत्नी को जोर देते हुए पति के पीछे नहीं पड़ जाना चाहिए. इस से संबंधों में तनाव और बढ़ जाता है. पत्नियां कई बार बेबुनियादी तर्क देते हुए कहती हैं कि जब हम अपनी भावनाओं को ले कर बात कर सकती हैं तो पुरुष ऐसा क्यों नहीं कर सकता? लेकिन वे यह बात नहीं सम झ पातीं कि अगर वे अपनी भावनाएं व्यक्त करती रहती हैं तो यह जरूरी नहीं कि पुरुष भी ऐसा ही करें. लेकिन जहां पुरुष अब यह सोचने लगे हैं कि अपनी भावनाएं दर्शाने में कोई बुराई नहीं, वहीं वे यह नहीं सीख पाए हैं कि भावनाओं को दर्शाएं कैसे.

प्यार से जानें राज

शिर्ले जुसमैन के अनुसार, दांपत्य में भावनात्मक संबंधों से जुड़ी कई परतें होती हैं, जो परतदरपरत ही खुलती हैं. संवेदनशील सेक्स द्वारा पत्नियां पति के अंदर पनपती इन दूरियों को जीत सकती हैं, क्योंकि अगर पति सेक्स के माध्यम से पत्नी से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ महसूस करता है तो यह मात्र मशीनी प्रक्रिया न रह कर पति को भावनात्मक रूप से नजदीक ला सकती है. यही वे पल हैं जब वह अपना मन खोल कर पत्नी के सामने रख सकता है. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि पुरुषों में भावनात्मक तौर पर सिमटे रहना कूटकूट कर भरा होता है.

यह स्त्री की भी जिम्मेदारी होती है कि वह उसे खुलने में मदद करे. लेकिन स्त्री या पत्नी की सफलता तब बहुत सीमित हो जाएगी, जब वह पति की धीरेधीरे खुलने की प्रवृत्ति की आलोचना शुरू कर देगी. यही वह स्थिति है जहां उसे सावधानी के साथ पति के मन के खुलने की प्रक्रिया में उस का साथ देना है. पति को बिना रोकटोक के मन की बात कहने दें. उस समय पति द्वारा व्यक्त सभी भावनाओं को सम्मान की दृष्टि से देखते हुए तसल्ली के साथ सुनें. पत्नी द्वारा किसी भी प्रकार की गलत प्रतिक्रिया पति को वापस अपनेआप में समेट कर रख देगी, जहां से उसे वापस लाना और भी कठिन हो जाएगा. पुरुष को भावनात्मक स्तर पर दूर जाने से रोकने के लिए उस को भावनात्मक दृढ़ता, सुरक्षा और स्नेह दें व इतनी छूट दें कि वह अपने तरीके से खुल सके. पति को डंडे के जोर पर बोलने के लिए मजबूर न करते हुए उसे ऐसा माहौल दें, जहां वह अपनी भावनाओं का बो झ खुदबखुद आप के सामने हलका कर सके.