गृहशोभा विशेष

आज भी बहुत से ऐसे बेमेल विवाह देखने को मिलते हैं, जिन में पतिपत्नी की आयु में अत्यधिक खटकने वाला अंतर होता है या पति अनपढ़ या कम पढ़ालिखा होता है या पत्नी नौकरीशुदा होती है और पति बेरोजगार. हालांकि हर मांबाप और लड़कालड़की यही चाहते हैं कि पति अधिक पढ़ालिखा हो और पत्नी उस से कम पढ़ीलिखी हो. पति घर के लिए व्यवसाय या नौकरी कर के उपार्जन करे और पत्नी घर संभाले. लेकिन कभीकभी ऐसी मजबूरियां हो जाती हैं, जिन से बेमेल विवाह भी संपन्न हो जाते हैं. ऐसा ही कुछ नीलम के साथ भी हुआ. नीलम सुंदर और पढ़ीलिखी युवती थी तथा रक्षा मंत्रालय में कार्य करती थी. मातापिता ने उस के विवाह के लिए अनेक लड़के देखे, किंतु नीलम को हर लड़के में कोई न कोई दोष दिखाई देता था.

धीरेधीरे नीलम की उम्र बढ़ती गई और वह अपनी उम्र का 35वां वर्ष भी पार कर गई. फिर लड़कों ने नीलम को नकारना आरंभ कर दिया. हार कर नीलम को एक अधेड़ व्यक्ति से विवाह करना पड़ा. वह सजातीय तो था, लेकिन वह 12वीं कक्षा पास था और आमदनी के नाम पर मकान से आने वाला थोड़ाबहुत किराया था. उस में भी भाइयों का हिस्सा अलग था.

नीलम को बताया गया था कि लड़का प्रौपर्टी डीलर है, जबकि वास्तव में उस के कुछ दोस्त प्रौपर्टी डीलर थे और वह केवल शाम को उन के पास शराब पीने बैठता था. अकसर ऐसा भी देखा गया है कि लड़की के मांबाप केवल सजातीय लड़के की खोज में लगे रहते हैं और लड़की पढ़ाई की सीढि़यां चढ़ती चली जाती है.

फिर उस जाति में उतने पढ़ेलिखे लड़के नहीं मिलते जितनी लड़की पढ़लिख जाती है. तब मजबूरन कम पढ़ेलिखे लड़के से विवाह करना पड़ता है.

मनोवैज्ञानिक दबाव

यदि लड़का लड़की से कम पढ़ालिखा हो या लड़की नौकरी करती हो और लड़का बेरोजगार हो तो ऐसे पति और पत्नी दोनों ही मनोवैज्ञानिक दबाव में जीते हैं. मैरिज काउंसलर एवं वकील नलिन सहाय बताते हैं कि प्राय:ऐसे मामले मध्यवर्गीय परिवारों में ही पाए जाते हैं और वे कभीकभार ही सलाह लेने आते हैं.

न्यायालय की नीति

सर्वोच्च न्यायालय के एडवोकेट आर.के. सिंह का मानना है कि इस तरह के बेमेल विवाह की जड़ आधुनिक भौतिकवादी जीवनशैली ही है. उन्होंने बताया कि पंजाब उच्च न्यायालय के एक लीडिंग केस तीरथ कौर बनाम किरपाल सिंह के मामले में पहले तो गरीब और बेरोजगार पति ने अपनी पत्नी को प्रशिक्षण दिलवाया और फिर जब उस की नौकरी लग गई तो उसे नौकरी छोड़ कर गांव में आ कर अपने साथ रहने के लिए जोर देने लगा. पत्नी उसे तलाक भी नहीं देना चाहती थी और नौकरी भी नहीं छोड़ना चाहती थी.

सुरिंद्र कौर और गुरदीप सिंह का मामला भी ऐसा ही था. मगर इस मामले में पत्नी ने पति को तलाक दे दिया, लेकिन अपनी नौकरी नहीं छोड़ी. न्यायालय हिंदू पतिपत्नी के एक ही जगह रहने के पक्ष में है, क्योंकि हिंदू विधि के अनुसार पत्नी मात्र एक पत्नी न हो कर धर्मपत्नी है और धर्म के अनुसार पत्नी का धर्म पति के संरक्षण में एक छत के नीचे रह कर पति की गृहस्थी को संभालना है. ऐसे में बदले आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जब पति और पत्नी की भूमिकाएं बदल रही हैं, क्या न्यायालय भी हिंदू विधि में बदलाव के पक्ष में होंगे?

पतिपत्नी यथार्थ को समझें

आज अर्थोपार्जन सब से महत्त्वपूर्ण है, चाहे यह कार्य पति करे या पत्नी अथवा दोनों. यदि घर में धन का अभाव होता है तो अनेक परेशानियां उठ खड़ी होती हैं. इसलिए यदि पति कम पढ़ालिखा है या बेरोजगार है तो अपने परिवार की भलाई के लिए अपने अहं को ताक पर रख कर, जो कार्य पत्नी घर के लिए करती है उन्हें वह स्वयं करे ताकि पत्नी को घर और बाहर दोनों का बोझ न उठाना पड़े.

पति संभाले घर की जिम्मेदारी

पति चाहे तो घर के बहुत से काम अपने जिम्मे ले सकता है जैसे, बच्चों को स्कूल छोड़ना व लाना, उन का होमवर्क करवाना, पत्नी को औफिस छोड़ना व ले जाना, सुबह और शाम चाय बना देना, सब्जी, चावल आदि बना लेना, बाजार की खरीदारी कर लेना. चूंकि ये सभी काम वह अपने परिवार के लिए ही कर रहा है, इसलिए इस में किसी भी प्रकार के अहं को बीच में न आने दें.

दूसरी ओर पत्नी का भी दायित्व है कि वह किसी भी बात में पति के कम पढ़ालिखा होने या नौकरीव्यवसाय न करने का जिक्र न करे ताकि पति हीनभावना से ग्रस्त न हो. इस तरह की भावनाएं आगे चल कर मनोग्रंथि का रूप धारण कर लेती हैं और पति छोटीछोटी बातों पर घर के वातावरण को कलहपूर्ण बना देता है.

प्रेम और साहचर्य

एक मुसकराहट सभी परेशानियों से मुक्त कर देती है. नौकरी पर जाते समय और थकेहारे वापस आने पर एक मुसकराहट सारे दुखों और पीड़ाओं को हर लेती है. साथ खाना खाने और रात को एक ही बिस्तर पर सोने से कौन बड़ा है कौन छोटा है की भावना खत्म हो जाती है. इस से पति और पत्नी दोनों ही समानता के स्तर पर आ जाते हैं. यही नहीं वे एकदूसरे के पूरक भी बन जाते हैं. उन्हें कोई भी परिस्थिति अलग नहीं कर सकती है.

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