गृहशोभा विशेष

18 साल के राजीव का वजन जब 85 किलोग्राम हुआ, तो उस के मातापिता घबरा गए. बचपन से ही राजीव ओवरवेट था, लेकिन मातापिता को लगा था कि उम्र बढ़ने पर वह पतला हो जाएगा. पर ऐसा नहीं हुआ. होस्टल में रह कर भी उस का वजन बढ़ रहा था. वह बहुत आलसी हो गया था. उसे नींद भी बहुत आती थी. उस के मातापिता उसे कई डाक्टर्स के पास ले गए. कुछ ने सर्जरी करवाने की सलाह दी, लेकिन वे सर्जरी के लिए तैयार नहीं थे.अंत में वे उसे डाइटिशियन और न्यूट्रिशनिस्ट डा. नेहा चांदना रंगलानी के पास ले गए. उन के द्वारा जांच के बाद पता चला कि उस की जीवनशैली ठीक नहीं थी. उसे बचपन से जंक फूड खाने की आदत थी. उसे जब भी भूख लगती थी वह कुछ भी खा  लेता था. ऐसा करतेकरते उसे मोटापे ने घेर लिया. जबकि उस के परिवार में कोई भी ओवरवेट नहीं था. राजीव ने उन के द्वारा दी गई डाइट चार्ट को 4 महीने तक फौलो कर अपना 25 किलोग्राम वजन कम किया. वह अब पहले से काफी अच्छा लगने लगा है.

ऐसे बढ़ती है खाने में रुचि

डा. नेहा बताती हैं कि खाने की आदत लर्निंग बिहेवियर से आती है, अंतर्ज्ञान से नहीं. इसलिए बचपन से ही बच्चे में यह आदत डालने की आवश्यकता होती है कि उसे कब और क्या खाना चाहिए. आजकल लोग खाना बनाने में रुचि कम रखते हैं. ऐसे में बाजार से ला कर खाने की प्रथा चल पड़ी है. बाजार की खाने की चीजें अधिकतर स्वाद के आधार पर बनाई जाती हैं. उन की पौष्टिकता पर कम ध्यान दिया जाता है. ऐसे में बच्चा जब खुद कुछ उठा कर खाना सीखता है, तो किचन में चीजें रखते वक्त निम्न बातों को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है:

कभी भी क्रीम बिस्कुट, चिप्स और चीज के पैकेट रसोई में न रखें.

हैल्दी स्नैक्स के बारे में सोचें और मुरमुरा, पीनट्स व ऐसे बिस्कुट रखें जिन में ओट्स हो. सैंडविच भी रख सकती हैं.

कोल्ड ड्रिंक्स, कैन पैक्ड ड्रिंक्स फ्रिज में रखने के बजाय ताजा नीबूपानी, जलजीरा व फ्रैश फलों के जूस आदि रखें, जिन में विटामिन और मिनरल अधिक मात्रा में होते हैं. वे बच्चे के विकास में काफी सहायक होते हैं.

मूंग की दाल व भुने हुए चने वगैरह आजकल बाजार में मिलते हैं, जो स्वाद के अलावा फायदेमंद भी होते हैं उन्हें रखें लेकिन हमेशा वैरायटी को बनाए रखें, क्योंकि एक जैसे फूड से बच्चा ऊब जाता है और बाहर का खाना खाने की सोचता है.

फलों को काट कर उन्हें कटोरी, प्लेट या ट्रे में सजा कर इस तरह फ्रिज या अलमारी में रखें ताकि बच्चा सहज ही उन की ओर आकर्षित हो.

जो भी उत्पाद रसोई में रखें, उसे खरीदते वक्त उस में वसा की मात्रा और पोषक तत्त्वों की जांच करें.

खाने की आदत को अच्छा बनाने के लिए उस का तरहतरह के व्यंजनों से परिचय कराएं.

बच्चे जब टीनएज में आते हैं तो वे अकसर स्कूल से आते ही किचन की ओर जाते हैं. अगर घर में मां हो तो वह उन्हें खाने के लिए कुछ निकाल कर दे सकती है. लेकिन आजकल अधिकांश मांएं कामकाजी हैं, इसलिए बच्चों को खुद ही कुछ निकाल कर खाना पड़ता है.

नेहा कहती हैं कि इस उम्र में बच्चे कुछ बना कर भी खा सकते हैं, इसलिए उस तरह की चीजें भी रसोई में रखें जिन से बच्चे कुछ बना कर खा सकें. जैसे दही, हरी चटनी, सलाद आदि. इन्हें फ्रिज में रखें ताकि बच्चा इन से खुद सैंडविच बना कर खा ले. इस के अलावा टीनएज बच्चों के लिए निम्न चीजें रसोई में होनी चाहिए:

मल्टीग्रेन व ब्राउन ब्रैड, इडली आदि.

मुरमुरा, कटे हुए प्याज, टमाटर व हरी धनियापत्ती. इन्हें अलगअलग कटोरी में रखें, बच्चा सभी को मिला कर खा सकता है.

इन के अलावा खाखरा, चकली, भुने हुए चने, दाल आदि जिन्हें वे तुरंत निकाल कर खा सकें.

इस उम्र में बच्चों की ग्रोथ जल्दी होती है, इसलिए उन्हें बारबार भूख लगती है. अगर बच्चा नौनवेज खाता है, तो अंडे उबाल कर रख सकती हैं.

आजकल बच्चे बाहर जा कर अधिक नहीं खेलते. उन का अधिकतर समय कंप्यूटर, लैपटौप या मोबाइल के साथ बीतता है. इसलिए उन्हें ब्रैड पर मक्खन की कम मात्रा लगाने की सलाह दें. साथ ही यह भी समझा दें कि जब भी वे पैक्ड फूड खरीदें उस में फैट और शुगर की मात्रा कम हो.

खानपान का व्यवहार पर प्रभाव

दरअसल, सही खानपान न होने से बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है. उस का मन किसी काम में नहीं लगता और वह उदास रहता है. लड़कियों के लिए तो संतुलित आहार बहुत जरूरी है. संतुलित आहार के बिना उन का हारमोनल बैलेंस बिगड़ता है और उन के मासिकधर्म पर इस का प्रभाव पड़ता है. बच्चों में शुगर लेवल बढ़ जाने पर वे कई बार जिद्दी हो जाते हैं और तोड़फोड़ तक कर सकते हैं. नूडल्स या जंकफूड सप्ताह में एक बार खिलाना काफी होता है, इसलिए किचन में सामान हमेशा वैसा रखें जो बच्चों के लिए आकर्षक, स्वादिष्ठ और हैल्दी हो, जिस से उन की खाने में रुचि बढ़े और उन का ग्रोथ अच्छा हो.

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