कल शाम अपनी पड़ोसिन नविता गुप्ता से मिलने गई तो उन के चेहरे पर परेशानी और झुंझलाहट साफ झलक रही थी. पूछने पर बेचारगी से बोलीं, ‘‘निकिता (उन की 13 वर्षीय बेटी) पिछले कुछ दिनों से खोईखोई, गुमसुम सी रहती है. न पहले की तरह चहकती है, न ही सहेलियों के साथ घूमने जाती है. पूछने पर कोई ढंग का जवाब भी नहीं देती.’’

आजकल ज्यादातर मांएं अपने टीनऐजर बच्चों को ले कर परेशान नजर आती हैं कि दोस्तों से घंटों गप्पें मारेंगे, इंटरनैट पर चैटिंग करते रहेंगे पर हमारे पूछने पर कुछ नहीं मम्मी कह कर चुप्पी साध लेंगे. मुझे अच्छी तरह याद है, अपने जमाने में कालेज के दिनों में मेरी मां मेरी सब से अच्छी दोस्त होती थीं. भलेबुरे का ज्ञान मां ही कराती थीं और मेरी सहेलियों के घर आने पर मम्मी उन से भी खूब घुलमिल कर हर विषय पर बातें करती थीं. इसीलिए आज की पीढ़ी का अपने मांबाप के साथ व्यवहार देख कर मुझे बेहद हैरानी होती है.

क्या है वजह

सचाई की तह तक पहुंचने के लिए मैं ने कुछ किशोरकिशोरियों से चर्चा की.  14 साल की नेहा छूटते ही बोली, ‘‘आंटी, मम्मी एक काम तो बहुत अच्छी तरह करती हैं और वह है टोकाटाकी कि यह न करो, वहां न जाओ, किचन का काम सीखो.’’  10वीं कक्षा की छात्रा स्वाति वैसे तो अपनी मम्मी की पूरी इज्जत करती है पर सारी बातें मम्मी के साथ शेयर करना पसंद नहीं करती.

17 साल की शैली को मलाल है कि मम्मी ने भाई को तो रात 9 बजे तक घर आने की छूट दे रखी है पर मुझ से कहेंगी कि लड़की हो, टाइम पर घर आ जाया करो. कहीं नाक न कटवा देना वगैरह.  कोई व्यक्तिगत समस्या या स्कूल की कोई समस्या आ जाने पर किस से डिस्कस करना पसंद करती हो, पूछने पर 17 वर्षीय मुक्ता बोली, ‘‘बीमार होने पर, अपसैट होने पर या कोई और बड़ी समस्या आने पर सब से पहले मां की याद आती है. वे न केवल बड़े धीरज से सुनती हैं, बल्कि कई बार तो मिनटों में समस्या हल कर के टैंशन फ्री कर देती हैं. मम्मी जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता.’’

इन सभी टीनऐजर्स से बातचीत करने पर यह साफ हो जाता है कि खेलने, फिल्म देखने, गपशप करने या मौजमस्ती के लिए भले टीनऐजर दोस्तों को ढूंढ़ें, किंतु जब किसी तरह की समस्या उन के समक्ष आती है, तो वे बेहिचक जिस तरह अपनी मां के पास जा सकते हैं, उस तरह पापा, बहन, भाई या फिर पक्के दोस्त के पास नहीं. ऐसे में मां ही उन की गाइड होती है और बैस्ट फ्रैंड भी.  तो फिर ज्यादातर किशोरकिशोरियां अपनी मां से दोस्ताना रिश्ता कायम क्यों नहीं कर पाते? सच तो यह है कि इस प्रभावात्मक अवस्था में आज के बच्चे यह मान कर चलते हैं कि आज के हिसाब से वे सब कुछ जानते हैं और उन की मांएं कुछ नहीं.

15 वर्षीय ऋतु का कहना है, ‘‘मम्मी जमाने के हिसाब से चलने को तैयार ही नहीं. अच्छे कपड़े पहन कर कालेज जाना, फोन पर दोस्तों से लंबीलंबी बातें करना, महीने में कम से कम  1 बार दोस्तों के साथ मूवी या रेस्तरां जाना कितना वक्त के अनुसार चलने के लिए जरूरी है, ये सब मम्मी नहीं समझतीं.’’

मेरा भानजा नवनीत कहता है, ‘‘पिज्जा और मैकडोनल्ड के बर्गर का स्वाद मम्मी क्या समझेंगी.’’

गलती मातापिता की भी

ईमानदारी से देखें तो आज की तेज रफ्तार जिंदगी में मांबाप शोहरत, रुतबा पूरा करने की होड़ में तो भाग रहे हैं पर अपने बच्चों के मन में संस्कारों के बजाय पैसे की प्रधानता और उम्र से पहले बड़प्पन पैदा कर रहे हैं. पुराने जमाने में बच्चे संयुक्त परिवार में पलते थे, हर चीज भाईबहनों से शेयर की जाती थी. आज एकल परिवारों में 1 या 2 बच्चे होते हैं. बच्चों पर मां का प्रभाव सब से ज्यादा पड़ता है. बेशक पहले के मुकाबले मां और बच्चे में लगाव बढ़ा है. पहले से ज्यादा इन्टैंस भी हुआ है. आज के किशोर यह जरूर चाहते हैं कि मांएं उन्हें समझें, उन की जरूरतें समझें पर मांओं की भी उन से कुछ अपेक्षाएं होती हैं, यह समझने के लिए वे तैयार नहीं होते.

मनोवैज्ञानिक स्नेहा शर्मा के अनुसार, ‘‘आज की पीढ़ी ने आंखें ही उपभोक्तावाद के माहौल में खोली हैं. आज के बच्चे जब मां को यह बताएं कि आप को किस तरह तैयार हो कर, कौन सी ड्रैस पहन कर हमारे स्कूल आना है, तो आप समझ सकते हैं कि बच्चों का मातापिता पर कितना दबाव है.’’  कालेज में लैक्चरर मोहिनी का मानना है, ‘‘नई पीढ़ी द्वारा अपनी बातें मांओं से शेयर न करने के लिए कुछ हद तक मांएं खुद ही जिम्मेदार हैं. नौकरीपेशा मांएं बच्चों को वक्त न दे पाने की मजबूरी को उन्हें ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं दे कर छिपाने की कोशिश करती हैं.’’

स्कूल टीचर निर्मला उदाहरण देते हुए कहती हैं, ‘‘मेरे स्कूल में 12वीं कक्षा की एक छात्रा रोज स्कूल 15-20 मिनट देर से आती थी. उस के मातापिता उस के देर से पहुंचने की पैरवी करते हुए कहते कि क्या हुआ, अगर थोड़ी देर से पहुंचती है? जब मांबाप खुद ही अनुशासन का महत्त्व भूल चुके हों, तो बेटी को क्या अनुशासन सिखाएंगे. अच्छी देखभाल का मतलब अब अच्छा खानापीना, दिखना रह गया है. बच्चों में अच्छे जीवनमूल्य डालना अब अच्छे लालनपालन का हिस्सा नहीं रह गया है.’’

कुछ उन की भी सुनें

मातापिता दोनों के कामकाजी होने की वजह ने भी बच्चों की सोच पर असर डाला है. कामकाजी मातापिता समयसमय पर बच्चों को यह एहसास दिलाते रहते हैं कि वे बड़े हो गए हैं. स्वाभाविक है कि बच्चे भी बड़ों की तरह व्यवहार करने लगें. ऐसी हालत में बच्चों के बचपन के साथसाथ बालसुलभ भोलापन खो गया है और उस की वजह सैटेलाइट की दुनिया में घुला सैक्स और मारधाड़ ले चुका है. मातापिता अपनी टूटीबिखरी आकांक्षाओं को बच्चों के जरीए पूरा करना चाहते हैं. ऐसे हालात में क्या जरूरी नहीं कि मातापिता अपने बच्चों को जो चाहे दें, पर साथ ही अपना बहुमूल्य समय भी उन्हें अवश्य दें.

आखिरकार वे आप के बच्चे हैं, उन के किशोरावस्था में बढ़ते कदम आप की सांसों के साथ जुड़े हैं. इसलिए आप को उन का दोस्त बनना सीखना होगा और इस के लिए यह बहुत जरूरी है कि आप उन्हें बराबरी का सम्मान दें. उन्हें गलत और सही का ज्ञान करवाएं. कुछ उन की मानें, कुछ अपनी मनवाएं.

मेरी सहेली शर्बरी का बेटा शाम होते ही कार्टून चैनल लगा कर बैठ जाता. दफ्तर से घर आने पर शर्बरी का मन होता कि अपना पसंदीदा टीवी सीरियल देखे. यह देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा जब उन्होंने डांटनेफटकारने के बजाय बेटे को प्यार से यह समझाया, ‘‘बेटा, रोज शाम को पहले मेरी पसंद का सीरियल देखा करेंगे और फिर तुम्हारा कार्टून चैनल.’’

इस तरह प्यार से समझाई गई बात बेटे की समझ में आ गई और मम्मी उस की सब से अच्छी फ्रैंड भी बन गईं.  दूसरी ओर सुनीता ने अपने बच्चों से सुविधा का संबंध कायम किया हुआ है. खुद मिनी को ‘सिली’, ‘स्टूपिड’ जैसे विशेषणों से पुकारती हैं और फिर जब वही अल्फाज बच्चों के मुंह से निकलते हैं, तो उन्हें डांटती हैं. इस से अच्छा होता सुनीता पहले खुद की जबान पर कंट्रोल करतीं.  अकसर देखने में आता है सैटेलाइट के इस युग में जब हर चैनल सैक्स संबंधी बातों/विज्ञापनों को खुलेआम परोस रहा है तो भी मांएं किशोरावस्था की दहलीज पर खड़ी अपनी बेटियों को सैक्स के बारे में स्वस्थ जानकारी नहीं देतीं. ऊपर से उस विषय की कोई मैग्जीन या किताब पढ़ने पर उन्हें डांट देती हैं, जबकि उन की यह जिज्ञासा सहज और स्वाभाविक है. ऐसे में बेहतर होगा मांएं अपनी ड्यूटी समझें. किशोर बेटियों को सही तरीके से पूरी जानकारी दें ताकि वे अपनी मां पर पूरा विश्वास कर सकें, बेहिचक अपनी समस्याएं उन के सामने रख सकें और भटकें नहीं.

बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार, उन के साथ बिताया गया समय भले ही वह क्वालिटी टाइम बहुत कम हो, उन्हें आप से उन के  रिश्ते की कद्र समझाएगा और तब आप स्वयं अपने प्यारे बच्चों की फ्रैंड, फिलौस्फर और  गाइड होंगी.