टीवी सीरियल ‘कौन बनेगा करोड़पति’ सीजन 5 के अंतिम खिलाड़ी के रूप में पुष्पा उदेनिया खेलने के लिए आई थीं. पुष्पा उदेनिया मध्य प्रदेश के दमोह जिले की रहने वाली हैं. उन के पिता चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं. वे बड़ी मुश्किल से पुष्पा की शादी कमलेश उदेनिया से करा पाए. कमलेश की भी कोई नौकरी नहीं थी. पुष्पा एक प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं. उन को शादी के 2 साल बाद बेटा हो गया. अब परेशानी यह थी कि बेटे की देखभाल कौन करे? पुष्पा और उन के पति की हालत ऐसी नहीं थी कि वे बेटे की देखभाल के लिए किसी नातेरिश्तेदार को बुला सकें या बेटे को क्रैच में रख सकें. ऐसे में पतिपत्नी ने मिल कर फैसला किया कि जिस का वेतन कम है, वह घर पर रह कर बेटे की देखभाल करेगा. कमलेश का वेतन कम था, इसलिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और घर पर रह कर बच्चे की देखभाल करने लगे. पुष्पा ज्यादा वेतन पाती थीं, इसलिए वे अपनी स्कूल टीचर की नौकरी करती रहीं. लेकिन पुष्पा को वेतन के रूप में सिर्फ क्व 3,000 ही मिलते थे अत: घर का खर्च चलाने के लिए वे अपने घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगीं.

पुष्पा ने बताया, ‘‘घर पर काम करने को ले कर शुरूशुरू में मेरे पति की बहुत आलोचना होती थी, लेकिन धीरेधीरे लोगों का विरोध कम हो गया.’’ पुष्पा के पति कमलेश का मानना है कि 2 साल की बात और है. जब बच्चा बड़ा हो जाएगा, वह स्कूल जाने लगेगा तब वे भी नौकरी करने लगेंगे. वे अपनी पत्नी को प्रोफैसर बनाने का सपना देख रहे हैं.

डे बोर्डिंग स्कूल बन रहे सहारा

यह बात केवल पुष्पा की ही नहीं है. समाज में पुष्पा जैसी बहुत सी महिलाएं हैं. सीमा और राकेश की कहानी भी ऐसी ही है. सीमा और राकेश दोनों ही नौकरीपेशा हैं. जब उन का पहला बच्चा हुआ तब उन के सामने भी परेशानी आई. राकेश ऐसी नौकरी करते थे, जिस में शिफ्टवार ड्यूटी थी. उस वक्त राकेश की ड्यूटी दिन की थी. ऐसे में परेशानी यह आने लगी कि बच्चे की देखभाल कौन करे? कुछ दिन बच्चा क्रैच में रखा गया, इस में भी परेशानी आ रही थी. तब राकेश और सीमा ने तय किया कि उन में से ही कोई एक अपने बच्चे की देखभाल करेगा. राकेश ने अपनी ड्यूटी बदलवा ली. 4 बजे के बाद सीमा जब बच्चे की देखभाल करने के लिए आ जाती, तब राकेश नौकरी करने जाते. इस बीच सीमा को दूसरा बच्चा भी हो गया. तब बड़े बच्चे को डे बोर्डिंग स्कूल में दाखिला दिला कर राकेश ने छोटे बेटे की देखभाल करनी शुरू कर दी. वे कहते हैं, ‘‘कुछ दिनों की बात है. इस के बाद छोटा बेटा भी डे बोर्डिंग स्कूल में जाने लगेगा, तब सब ठीक हो जाएगा.’’

क्रैच को छोड़ डे बोर्डिंग स्कूल में बच्चे का दाखिला दिलाने के सवाल पर राकेश ने बताया, ‘‘कै्रच में बच्चे की केवल देखभाल हो पाती है. वहां रहने वाली आया बच्चे को पढ़नालिखना या दूसरी चीजें नहीं सिखा पाती. डे बोर्डिंग स्कूल में 2 साल की उम्र के बाद दाखिला मिल जाता है. यहां पर बच्चे कई तरह के रचनात्मक कामों और खेल से तो जुड़ते ही हैं, उन की पढ़ाई की शुरुआत भी हो जाती है, जिस से किसी अच्छे स्कूल में बच्चे को दाखिल कराने में काफी मदद मिल जाती है. डे बोर्डिंग स्कूल में बच्चा दिन भर स्कूल में रहता है. वहां खाने और खेलने की सुविधाएं देने के साथ ही बच्चे को मैनर्स सिखाए जाते हैं. क्रैच के मुकाबले यह थोड़ा महंगा जरूर होता है पर बच्चा यहां ठीक से रहता है.’’

क्रैच का नहीं जवाब

निशा सरकारी नौकरी में हैं. उन के पति बाहर नौकरी करते हैं. उन्हें जब बच्चा हुआ तो पहले 3 माह की छुट्टी औफिस से मिल गई. इस के बाद उन्हें औफिस जाना था. निशा ने अपनी परेशानी औफिस में अपने सहयोगियों को बताई. उन से निशा को पता चला कि उन के औफिस में ही एक क्रैच खुला है, जिस में महिला कर्मचारी अपने बच्चों को रखती हैं. वे जब घर जाती हैं तो अपनेअपने बच्चे को साथ वापस ले जाती हैं. ऐसे में बच्चा उन से दूर भी नहीं रहता और उन्हें औफिस के काम में कोई परेशानी भी नहीं रहती. बच्चे की देखभाल के एवज में निशा को केवल क्व 3 सौ प्रतिमाह देने होते थे. आमतौर पर बड़े सरकारी औफिसों के अंदर ही क्रैच खुले होते हैं. सरकारी औफिसों में खुले क्रैच में बाहरी लोग भी अपने बच्चे को रख सकते हैं. इस के लिए बस उन को फीस कुछ ज्यादा देनी पड़ती है. प्राइवेट नौकरी करने वाली रजनी कहती हैं कि क्रैच और डे बोर्डिंग स्कूल में अंतर होता है. क्रैच में आप छोटे से छोटे बच्चे को भी रख सकती हैं जबकि डे बोर्डिंग स्कूल में 2 साल से ज्यादा उम्र के बच्चे ही रखे जा सकते हैं. रजनी को अपने औफिस से केवल 2 माह की छुट्टी मिली थी, उन को 2 माह की उम्र में ही बच्चे को क्रैच में भेजना शुरू करना पड़ा. समाज में वर्किंग मदर की बढ़ती संख्या को देखते हुए क्रैच खोलना अब एक कैरियर भी बन गया है. लगभग हर बड़े शहर की बड़ी कालोनी या रिहायशी इमारतों के आसपास क्रैच खुल रहे हैं.

अपने हों साथ तो क्या बात

रीना एनजीओ सैक्टर में काम करती हैं. वे कहती हैं, ‘‘हमें कभीकभी काम के सिलसिले में घर पहुंचतेपहुंचते काफी रात हो जाती थी. ऐसे में हमारे सामने कई मुश्किलें थीं. इन मुश्किलों से बचने के लिए हम ने अपनी मां को अपने पास बुला लिया. वे आ कर बच्चे की देखभाल करने लगीं. मैं कभीकभी रात में घर नहीं भी आती थी तो भी वे बच्चे की देखभाल कर लेती थीं. मुझे लगता है कि अगर संभव हो तो हम कोई ऐसी व्यवस्था कर दें जिस से घर का कोई बड़ाबुजुर्ग बच्चे की देखभाल करने को तैयार हो जाए. इस से बच्चे की तनिक भी चिंता नहीं रहती. रात में भी यह नहीं सोचना होता कि अब बच्चे को कहां रखें? ‘‘हम कितना भी महंगा क्रैच क्यों न खोज लें, उस में वह बात नहीं होती जो घर के बड़ेबुजुर्ग में होती है. आज की पीढ़ी अपने घर के बड़ेबुजुर्गों की देखभाल से बचने के लिए उन्हें अपने साथ नहीं रखती. अगर बच्चा घर के लोगों के साथ रहेगा, तो वह ज्यादा सुरक्षित रहेगा, उसे अच्छे संस्कार भी मिलेंगे.’’ मजदूर तबके की और स्वतंत्र रूप से काम करने वाली कुछ महिलाएं काम के दौरान भी बच्चे को साथ रखने का काम करती हैं. लेकिन जो नौकरी करती हैं उन के लिए बच्चे को साथ रखना मुनासिब नहीं होता. उन की कार्यक्षमता और तरक्की पर भी असर पड़ता है. ऐसे में क्रैच, घर के लोग और डे बोर्डिंग स्कूल उन का सहारा बन सकते हैं. पर इन जगहों पर बच्चे को रखने के लिए पहले मानसिक रूप से खुद को तैयार कर लें. बच्चे को भी पूरा सहारा दें ताकि उसे इस बात का एहसास न हो सके कि वह बिना मांबाप के अकेला रहता है. कई बार ऐसे हालात बच्चे के लिए नुकसानदायक साबित होती है.