गृहशोभा विशेष

महिलाओं को विवाह के बाद अपने व्यक्तित्व को, स्वभाव को बहुत बदलना पड़ता है. समाज सोचता है कि नारी की स्वयं की पहचान कुछ नहीं है. विवाह के बाद बड़े प्यारदुलार से उस की सामाजिक, मानसिक स्वतंत्रता उस से छीनी जाती है. छीनने वाला और कोई नहीं स्वयं उस के मातापिता, सासससुर और पति नामक प्राणी होता है. विदाई के समय मांबाप बेटी को रोतेरोते समझाते हैं कि बेटी यह तुम्हारा दूसरा जन्म है. सासससुर और पति की आज्ञा का पालन करना तुम्हारा परम कर्त्तव्य है.

ससुराल में साससुसर और पति कुछ स्पष्ट और कुछ संकेतों द्वारा ससुराल के अनुसार चलने की हिदायत देते हैं. मध्यवर्गीय व उच्च मध्यवर्गीय समाज की यह खास समस्या है. पत्नी विदूषी है, किसी कला में पारंगत है, तो उस में ससुराल वाले और संकुचित मानसिकता वाला पति उस की प्रतिभा का गला घोटने में देर नहीं करता. नृत्यकला या गायन क्षेत्र हो तो उसे साफतौर पर बता दिया जाता है कि ये सब यहां नहीं चलेगा. इज्जतदार खानदान के मानसम्मान की दुहाई दी जाती.

यहां तक कि कुछ घरों में बहुओं को नौकरी करने से भी मना कर दिया जाता है. भले घर में कितनी ही आर्थिक तंगी क्यों न हो. किसीकिसी घर में जहां आर्थिक तंगी, बदहाली चरम सीमा पर पहुंची होती है वे नौकरी की आज्ञा तो दे देते हैं, पर औफिस में किसी पुरुष से बात नहीं करनी और पूरा वेतन पति या सास को देने की शर्त रख दी जाती है. कठपुतली वाली जिंदगी

सुनंदा जिला स्तर की टैनिस खिलाड़ी थी. घर भर की लाडली थी. जीवन कैसे हंसखेल कर बिताया जाता है यह उस से सीखा जा सकता था पर अपनी जीवन प्रतियोगिता में वह पिछड़ गई. देखसुन कर एक सभ्रांत घर में रिश्ता तय किया गया. पति व ससुर दोनों उच्चपदाधिकारी थे. पगफेरे के लगभग 1 महीने बाद कठपुतली की तरह व्यवहार करने को मजबूर हो गई, जिस की डोर सिर्फ ससुराल वालों के हाथ में थी. क्या पहनेगी, कहां जाएगी, कितनी बात करनी है सब पति और ससुराल वाले तय करते थे. उस की भाभी ने अपना मोबाइल उसे छिपा कर दे दिया. अवसर पाते ही सुनंदा ने मायके से फोन पर अपनी व्यथाकथा कही तो भाभी हैरान रह गईं. ऊंची दुकान फीके पकवान वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी. अगर वह कुछ कहती तो ससुराल वाले उस के भाई व पिता को नुकसान पहुंचाने की धमकी देते. बेचारी डर के मारे चुप रह जाती.

अवसर पाते ही पिता व भाई सुनंदा को ससुराल से वापस ले आए. 1 साल तक वह उन के साथ रही. जिला क्लब में टेबल टैनिस की कोच बन गई. साल भर तो ससुराल वालों की नाराजगी के कारण कोई खोजखबर नहीं ली पर बाद में एक दिन पति ही सिर झुकाए गिड़गिड़ाता हुआ आ पहुंचा और सुनंदा को ले जाने का आग्रह करने लगा. घरवालों ने लिखित रूप से उस से वे सब बातें लिखवाई जिन से पति और उस का पिता सुनंदा को धमकाता था. आइंदा सुनंदा के साथ कुछ गलत न करने का वादा रिकौर्ड करवा कर सुनंदा को उस के साथ भेज दिया.

सताने के नए पैंतरे एक और घटना में एक युवती का विवाह एक ऐसे घराने में हो गया. जो अव्वल दर्जे के धोखेबाज थे. उन्होंने अमीर और सभ्य बनने का नाटक किया था. वास्तव में वे लोग सिर से पैरों तक कर्ज में डृबे थे. शादी में उन्हें अच्छाखासा कैश मिलने की उम्मीद थी, जो पूरी नहीं हुईं. इस का आक्रोश निकाला गया.

युवती की सारी बुनियादी आवश्यकताओं पर रोक लग गई. पति और ससुर के खाने के बाद जो बचता वही वह खाती. फोन करने, बाहर जाने पर पाबंदी थी. मायका दूसरे शहर में था. ससुराल वाले जानपहचान वालों से भी नहीं मिलवाते. अगर कोई मिलने की इच्छा जाहिर करता तो वे कहते कि वह सोई हुई है या तबीयत खराब है. बड़ी कोशिशों के बाद परिवार को उसे वहां से निकालने का मौका मिला. जहां तक सैक्स की बात हो पति अपनी इच्छाओं को सर्वोपरि रखता है. पत्नी थकी हो या बीमार अथवा उस की इच्छा न हो, परंतु स्त्री को पति की जरूरत के आगे घुटने टेकने ही पड़ते हैं. यदि यह प्रस्ताव पत्नी की ओर से हो तो उसे पहले दर्जे की बेहया मान कर अपमानित किया जाता है यानी कदमकदम पर उस की स्वतंत्रता को रौंदा जाता है.

कुछ पुरुष तो अपनी पत्नी को अपनी जायदाद या संपत्ति समझते हैं. पिछले दिनों यह खबर सुर्खियों में थी कि एक सैनिक अपनी पत्नी को अपने सैनिक मित्रों, सहयोगियों के साथ यौन संबंध बनाने को बाध्य करता था. मना करने पर चाकू से उस के कपड़े काट देता था. सच में स्त्री के साथ ऐसा व्यवहार, ऐसी दरिदंगी बेहद खौफनाक है. एक औरत विवाह के बाद अगर इस तरह के पुरुषरूपी भेडि़यों के हाथ पड़ जाती है, तो उस की हर प्रकार की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है. ज्यादातर पत्नियों को स्त्री समस्या के बारे में, रेप की बढ़ती घटनाओं पर, किसी सभा में बोलने या लिखने पर भी पाबंदी लगा दी जाती है. पति शराबी है, मारपीट करता है, नपुंसक है तो भी पत्नी को उसी पति के लिए सती होना पड़ता. यानी रहने को मजबूर होना पड़ता है.

क्या करें महिलाएं विवाह के बाद महिला की स्वतंत्रता समाप्त न हो, इस के लिए स्त्रियों को स्वयं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए. कुछ दिन पहले का मामला है, विवाह के समय दूल्हा नशे में धुत्त होशहवास खो कर डांस कर रहा था. यह देख कर दुलहन ने उस से शादी करने से इनकार करते हुए मंडप छोड़ दिया. जहांतहां दहेज लोभियों को सबक सिखाने के लिए लड़की द्वारा बरात लौटा देने के समाचार आते रहते हैं, जो अच्छा संकेत हैं.

आज की युवा पीढ़ी को चाहिए कि अपने होने वाले पति या होने वाली पत्नी के साथ मिलबैठ कर अपनी आंकाक्षाओं, विचारधाराओं से भली प्रकार एकदूसरे को अवगत करा दें. शराबी, बेरोजगार, तथा दहेज के लोभी पुरुषों का बहिष्कार कर देना चाहिए. मातापिता भी अपनी बेटियों को बेवजह घुटने टेकने के लिए मजबूर न करें.

जिस प्रकार हम एक पौधे को जड़ से निकाल कर दूसरी जगह रोपते हैं, तो देखते हैं कि मिट्टी, पानी, हवा सब उस पौधे के लिए अनुकूल हैं अथवा नहीं. अगर मिट्टी ठीक नहीं है, पानी ज्यादा या कम दे दिया, हवा पर्याप्त न मिली तो पौधा सूख जाता है. इसी प्रकार स्त्री भी विवाह के बाद अपनी जड़ें मायके से निकाल कर ससुरालरूपी बगीचे में रोपती है. उसे स्वतंत्रता, प्यारदुलार रूपी हवा, मिट्टी मिलनी चाहिए नहीं तो उस का व्यक्तित्व मुरझा जाएगा. विवाह नारी स्वंतत्रता का अंत नहीं. प्रत्येक स्त्री को अपनी प्रतिभा, आकांक्षाओं और सपनों को संजो कर रखने का पूरा हक है. ये उस के जीवन की अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें नष्ट होने से रोकना है. उन का व्यक्तित्व और अस्तित्व एक ऐसा भवन है, जिसे खंडित करने का हक किसी को नहीं है.

यदि स्त्री किसी कारणवश ऐसे नर्क से गुजर रही है, तो उसे किसी की सहायता लेनी चाहिए. अपनी निजी स्वतंत्रता का हनन होने से रोकना चाहिए. नारी एक जननी है. उस का अपमान करना, उस पर अत्याचार करना या उस की मानसिक, शारीरिक, स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाना, जघन्य अपराध ही नहीं पूरे परिवार के विकास में भी बाधा है.

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