नोटबंदी के बाद कैशलैस

9 January 2017
नोटबंदी के बाद कैशलैस

नोटबंदी के धड़ाम से औंधेमुंह गिर जाने के बाद और कालेधन का अंशभर भी नहीं निकलने पर नरेंद्र मोदी ने देश को एक और काले कुएं में धकेलने का फैसला कर लिया है. अफसोस यह है कि उन के कैशलैस हवन में चाहे पूरा लाक्षागृह जल जाए पर भक्तों को सुध नहीं आएगी और वे उसी तरह जपतप व जयजयकार करते रहेंगे जैसे सदियों से इस देश में होता रहा है.

‘भगवान भला करेंगे और पूजापाठ करो. संतोंमहंतों की सेवा करो, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में कल्याण होगा ही’ की तर्ज पर नरेंद्र मोदी ने प्रकांड पंडित और महात्मा का बाना ओढ़ लिया है और नोटबंदी व कैशलैस के अखंड जागरण में देश को धकेल दिया है. वे तो अपने को अब संसद से भी ऊपर समझने लगे हैं. संसद में कुछ कहने के बजाय जमा की हुई भक्तों की भीड़ में प्रवचन दे कर देश के कल्याण का जपतप कर रहे हैं.

गनीमत बस यही है कि दुनिया के बाकी सभी देश किसी न किसी उलझन में फंस गए हैं. अमेरिका ने डोनाल्ड ट्रंप जैसे सिरफिरे को राष्ट्रपति चुन लिया है. चीन में लगातार आर्थिक गिरावट आ रही है. यूरोप का एक होने का सपना ब्रिटेन के बाहर जाने के  फैसले के कारण टूट गया है. रूस तेल के दामों में कमी को ले कर यूरोप को धमका कर पूरा करने की कोशिश में अपनी कमजोरी छिपा रहा है.

ऐसे में भारत में यदि कुछ खराब हो रहा है तो दुनिया में किसी को चिंता नहीं है और विदेशी समाचारों पर निर्भर हमारा मीडिया खुश है कि भारत की नोटबंदी व कैशलैस स्ट्राइकों पर दुनिया की नजर ज्यादा नहीं है, तो ये अच्छे ही होंगे. अगर बैंकों व एटीएमों के बाहर लंबी कतारें न लगतीं तो शायद इस पूरे जंजाल की पोल भी न खुलती. नोटबंदी से कालाधन निकला नहीं और कैशलैस आम जनता रोटीकपड़ामकानलैस हो जाएगी, यह डर नहीं बैठता.

आधुनिक तकनीक अपनाई जाए, इस की वकालत करना ठीक है पर यह फैसला सरकार का एक मुखिया बिना सहमति के देश पर थोप दे, यह स्वीकार्य नहीं है. नरेंद्र मोदी का कैशलैस सपना और लालकृष्ण आडवाणी का बाबरी मसजिदलैस अयोध्या एकजैसे हैं. जैसे 2002 के दंगों के बाद गुजरात से मुसलमान गायब नहीं हो गए हैं, राम मंदिर अभी तक नहीं बना है (और बन भी जाए तो क्या वह कोई कल्याण करेगा?) वैसे ही कैशलैस सपना भूखी जनता के कई निवाले छीन कर भुला दिया जाएगा.

नोटबंदी के धड़ाम से औंधेमुंह गिर जाने के बाद और कालेधन का अंशभर भी नहीं निकलने पर नरेंद्र मोदी ने देश को एक और काले कुएं में धकेलने का फैसला कर लिया है. अफसोस यह है कि उन के कैशलैस हवन में चाहे पूरा लाक्षागृह जल जाए पर भक्तों को सुध नहीं आएगी और वे उसी तरह जपतप व जयजयकार करते रहेंगे जैसे सदियों से इस देश में होता रहा है.

‘भगवान भला करेंगे और पूजापाठ करो. संतोंमहंतों की सेवा करो, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में कल्याण होगा ही’ की तर्ज पर नरेंद्र मोदी ने प्रकांड पंडित और महात्मा का बाना ओढ़ लिया है और नोटबंदी व कैशलैस के अखंड जागरण में देश को धकेल दिया है. वे तो अपने को अब संसद से भी ऊपर समझने लगे हैं. संसद में कुछ कहने के बजाय जमा की हुई भक्तों की भीड़ में प्रवचन दे कर देश के कल्याण का जपतप कर रहे हैं.

गनीमत बस यही है कि दुनिया के बाकी सभी देश किसी न किसी उलझन में फंस गए हैं. अमेरिका ने डोनाल्ड ट्रंप जैसे सिरफिरे को राष्ट्रपति चुन लिया है. चीन में लगातार आर्थिक गिरावट आ रही है. यूरोप का एक होने का सपना ब्रिटेन के बाहर जाने के  फैसले के कारण टूट गया है. रूस तेल के दामों में कमी को ले कर यूरोप को धमका कर पूरा करने की कोशिश में अपनी कमजोरी छिपा रहा है.

ऐसे में भारत में यदि कुछ खराब हो रहा है तो दुनिया में किसी को चिंता नहीं है और विदेशी समाचारों पर निर्भर हमारा मीडिया खुश है कि भारत की नोटबंदी व कैशलैस स्ट्राइकों पर दुनिया की नजर ज्यादा नहीं है, तो ये अच्छे ही होंगे. अगर बैंकों व एटीएमों के बाहर लंबी कतारें न लगतीं तो शायद इस पूरे जंजाल की पोल भी न खुलती. नोटबंदी से कालाधन निकला नहीं और कैशलैस आम जनता रोटीकपड़ामकानलैस हो जाएगी, यह डर नहीं बैठता.

आधुनिक तकनीक अपनाई जाए, इस की वकालत करना ठीक है पर यह फैसला सरकार का एक मुखिया बिना सहमति के देश पर थोप दे, यह स्वीकार्य नहीं है. नरेंद्र मोदी का कैशलैस सपना और लालकृष्ण आडवाणी का बाबरी मसजिदलैस अयोध्या एकजैसे हैं. जैसे 2002 के दंगों के बाद गुजरात से मुसलमान गायब नहीं हो गए हैं, राम मंदिर अभी तक नहीं बना है (और बन भी जाए तो क्या वह कोई कल्याण करेगा?) वैसे ही कैशलैस सपना भूखी जनता के कई निवाले छीन कर भुला दिया जाएगा.

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