तीन तलाक का राजनीतिकरण

11 January 2017
तीन तलाक का राजनीतिकरण

ट्रिपल तलाक यानी 3 बार तलाक, तलाक, तलाक कहने पर कोई भी मुसलिम पति अपनी मुसलिम पत्नी को तलाक दे सकता है. यह कानून इसलामी शरीयत की देन है और सदियों से चला आ रहा है पर आजकल चर्चित है क्योंकि कुछ मुसलिम औरतें इस पर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई हैं जहां आमतौर पर हिंदू समाज में सुधारों का विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी उस का समर्थन कर रही है और इसे अमानवीय, बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ मान रही है.

देखा जाए तो यह सिस्टम बहुत अच्छा है. होना तो यह चाहिए कि यह हिंदू कानून में भी शामिल हो जाए और औरतों को भी हक मिल जाए. शादी करूंगी, शादी करूंगी, शादी करूंगी कहने से जब शादी हो जाती है और बाद में कुछ प्रक्रिया के बाद कानून इसे मान भी लेता है तो तलाक, तलाक, तलाक कहने पर शादी क्यों न तोड़ दी जाए?

देशभर की अदालतों में सैकड़ों मामले औरतों के तलाक मांगने के पड़े हैं. जब पतिपत्नी में से कोई भी अदालत पहुंच जाए तो पक्का है कि शादी तो नहीं चलेगी. फिर कानून की, बंदूक की नाल के सहारे उन्हें पतिपत्नी क्यों माना जाए? यह तो गैंगरेप की तरह गैंगबंधन है जिस में दोनों के मातापिता, बच्चे, कानून व्यवस्था जम कर पतिपत्नी का शोषण करते हैं कि एक बार शादी करूंगा क्या कह दिया कि अब जब तक हलाल न हो जाए, शादी टूटेगी ही नहीं.

अगर तीन तलाक सब धर्मों और पतिपत्नी दोनों पर लागू हो जाए तो न इसलामी कट्टरपंथी कुछ कह सकेंगे न इस मामले का राजनीतिकरण होगा. अब तो राजनीति पतिपत्नी के बीच तीसरा बन कर जम गई है और दोनों का शोषण कर रही है.

विवाह कोई नैसर्गिक, प्राकृतिक या आवश्यक प्रक्रिया नहीं है. मानव इतिहास को एक दिन का गिना जाए तो पता चलेगा कि धर्मजनित विवाह की परंपरा तो केवल कुछ मिनटों पहले शुरू हुई होगी. आज विवाह टूट इसलिए रहे हैं क्योंकि बीच के 2,000 वर्षों में भारतीयों ने धर्म के सहारे औरतों को गुलाम बना कर रखने में सफलता पा ली थी. आज औरत आजादी और अपना वजूद चाहती है, बराबरी चाहती है, इसलिए ट्रिपल तलाक का विरोध कर रही है.

उसे बराबरी का स्तर चाहिए. सरकार, कानून, समाज उसे मन मार कर कुछ करने को मजबूर न करें. उस पर न अत्याचार हों न उसे सामूहिक सामाजिक रेप का शिकार बनना पड़े. तलाक सरल हो, चाहे कोई भी धर्म हो और यह प्रक्रिया औरतोंआदमियों दोनों के लिए आसान हो.

ट्रिपल तलाक यानी 3 बार तलाक, तलाक, तलाक कहने पर कोई भी मुसलिम पति अपनी मुसलिम पत्नी को तलाक दे सकता है. यह कानून इसलामी शरीयत की देन है और सदियों से चला आ रहा है पर आजकल चर्चित है क्योंकि कुछ मुसलिम औरतें इस पर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई हैं जहां आमतौर पर हिंदू समाज में सुधारों का विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी उस का समर्थन कर रही है और इसे अमानवीय, बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ मान रही है.

देखा जाए तो यह सिस्टम बहुत अच्छा है. होना तो यह चाहिए कि यह हिंदू कानून में भी शामिल हो जाए और औरतों को भी हक मिल जाए. शादी करूंगी, शादी करूंगी, शादी करूंगी कहने से जब शादी हो जाती है और बाद में कुछ प्रक्रिया के बाद कानून इसे मान भी लेता है तो तलाक, तलाक, तलाक कहने पर शादी क्यों न तोड़ दी जाए?

देशभर की अदालतों में सैकड़ों मामले औरतों के तलाक मांगने के पड़े हैं. जब पतिपत्नी में से कोई भी अदालत पहुंच जाए तो पक्का है कि शादी तो नहीं चलेगी. फिर कानून की, बंदूक की नाल के सहारे उन्हें पतिपत्नी क्यों माना जाए? यह तो गैंगरेप की तरह गैंगबंधन है जिस में दोनों के मातापिता, बच्चे, कानून व्यवस्था जम कर पतिपत्नी का शोषण करते हैं कि एक बार शादी करूंगा क्या कह दिया कि अब जब तक हलाल न हो जाए, शादी टूटेगी ही नहीं.

अगर तीन तलाक सब धर्मों और पतिपत्नी दोनों पर लागू हो जाए तो न इसलामी कट्टरपंथी कुछ कह सकेंगे न इस मामले का राजनीतिकरण होगा. अब तो राजनीति पतिपत्नी के बीच तीसरा बन कर जम गई है और दोनों का शोषण कर रही है.

विवाह कोई नैसर्गिक, प्राकृतिक या आवश्यक प्रक्रिया नहीं है. मानव इतिहास को एक दिन का गिना जाए तो पता चलेगा कि धर्मजनित विवाह की परंपरा तो केवल कुछ मिनटों पहले शुरू हुई होगी. आज विवाह टूट इसलिए रहे हैं क्योंकि बीच के 2,000 वर्षों में भारतीयों ने धर्म के सहारे औरतों को गुलाम बना कर रखने में सफलता पा ली थी. आज औरत आजादी और अपना वजूद चाहती है, बराबरी चाहती है, इसलिए ट्रिपल तलाक का विरोध कर रही है.

उसे बराबरी का स्तर चाहिए. सरकार, कानून, समाज उसे मन मार कर कुछ करने को मजबूर न करें. उस पर न अत्याचार हों न उसे सामूहिक सामाजिक रेप का शिकार बनना पड़े. तलाक सरल हो, चाहे कोई भी धर्म हो और यह प्रक्रिया औरतोंआदमियों दोनों के लिए आसान हो.

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