गृहशोभा विशेष

आज मेरी बेटी सौम्या की सहेली अर्पिता का फोन आया. दोनों बचपन की सहेलियां थीं और साथ ही साथ कोचिंग करने के लिए दिल्ली गई थीं.

बहुत डर और संकोच के साथ अर्पिता ने मुझे बताया कि सौम्या का पिछले छः महीने से किसी लड़के से अफेयर चल रहा था और अब वह उसके साथ लिव इन में रह रही है. मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई. मेरी सौम्या ऐसा कदम उठा सकती है!एकदम अप्रत्याशित था मेरे लिए. मेरा घबराया चेहरा देख कर पति मेहुल पूछने लगे कि क्या बात है?

मेहुल का चेहरा देखते ही मैंने अपने आप को संभालने की पूरी कोशिश की क्योंकि मुझे पता था कि अपनी बेटी को ‘मेरी परी’ कहने वाले मेहुल उसके इस कदम की जानकारी से टूट कर बिखर जाएंगे.

मैंने बात को टाल दिया. मेहुल के आफिस जाने के बाद मैंने सौम्य को फोन किया और बिना किसी भूमिका के बोली “बेटा मैंने तुम्हें बचपन से यही सिखाया था कि कोई भी काम करने से पहले यह जरूर सोचना कि अगर मम्मी पापा को से इस काम को करने की परमिशन मांगती तो वह देते कि नही? और एक पल को भी लगे कि परमिशन नहीं मिलेगी तो वह काम मत करना. पर आज तुमने जो कदम उठाया है वह शायद यह सोचने के बाद ही उठाया होगा कि इसकी परमिशन तो कत्तई नहीं मिलेगी.

शायद ऐसा कर के तुमने हमें यह सन्देश दे दिया है कि अब तुम्हें हमारे मार्ग दर्शन या परमिशन की जरूरत नहीं रह गई है. शायद तुम ‘बड़ी’ हो गई हो.

मैं तो तुम्हारे इस कदम को सहने की कोशिश कर रही हूं और जब तक हो सकेगा तुम्हारे पापा से छिपा कर रखूंगी, पर जिस दिन उन्हें पता चलेगा उस दिन तुमको ‘मेरी परी’ कहने वाले तुम्हारे पापा शायद दुबारा तुम्हे अपनी परी नहीं कह पाएंगे.

तुम्हे ज़रूरत तो नहीं है हमारे मार्गदर्शन की, फिर भी मां हूं इसलिए कहूंगी ज़रूर” बेटा ऐसे कदम अक्सर लड़कियों को कहीं का नहीं छोड़ते”. तुम्हारे इस कदम से हम मृतप्राय हो चुके हैं.

एक गलत कदम उठा चुकी हो, जब इसका एहसास हो तो मेरे आंचल में आकर छिप जाना. दूसरा ‘गलत कदम’ मत उठाना.

दूसरे दिन सुबह मैं सोकर उठी तो देखा हाल में सौम्या अपने पापा की गोदी में सर रखे आंसूओ से उनके कपड़े भिगो रही थी और मेहुल घबराए से कभी उसे तो कभी मुझे देख रहे थे.

GS-660

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