गृहशोभा विशेष

प्याज और पैट्रोल के दाम नरेंद्र मोदी के अच्छे दिनों के वादों पर काले धब्बे लगा रहे हैं. जबरदस्त प्रचार और वादों, सपनों पर जो चुनाव भारतीय जनता पार्टी ने जीता था उस का रंग उतर रहा है. नरेंद्र मोदी की सरकार बजाय प्रशासन को चुस्त करने और भ्रष्टाचार दूर करने, सरकारी शिकंजों को ढीला करने के लिए गवर्नरों को हटाने में लगी दिखाई दे रही है.

जब सरकार बदलती है तो बहुत से लोग बदलते हैं. पर यदि कांग्रेस द्वारा नियुक्त किए गए गवर्नर 5-6 महीने रुक जाते तो आफत क्या आ जाती? ये गवर्नर सरकार के काम में अडं़गा तो नहीं डाल रहे. इस के बजाय सरकार को अर्थव्यवस्था को सुधारने में समय लगाना चाहिए.

आज जनता उन नियमों व कानूनों से कराह रही है, जो पिछली सरकारों ने जनता पर थोपे थे. जिन का एकमात्र उद्देश्य आम जनता को सरकारी नौकरशाही का गुलाम बनाना था. बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाना हो या ड्राइविंग लाइसैंस बनवाना हो, न केवल समय लगता है, पगपग पर नौकरशाही द्वारा थोपी गई रिश्वतखोरी का भी सामना करना पड़ता है. अगर पिछली सरकार को भ्रष्ट होने के कारण हटाया गया है तो नई सरकार को इन खंदकों को पाटने का काम शुरू करना चाहिए न कि अपनों को रेवडि़यां देने के लिए गवर्नरों व आयोगों में स्थान खाली कराने का.

यह ठीक है कि राज्यपालशान से रहते हैं पर जब तक उन का कार्यकाल नियत है, केवल शासन बदलने पर उन्हें हटाना वैसे गलत है. नैतिकता को आधार बना कर जीती पार्टी पिछली पार्टी की तरह पहले ही माह में निरर्थक अनैतिक कामों में उलझने लगे तो जनता का खिन्न होना स्वाभाविक है.

आज जनता सरकार से बहुत अपेक्षाएं कर रही है, लेकिन जनता पर सरकार इतनी हावी हो गई है कि जनता को जो चाहिए उस के लिए सरकार की ओर देखती है. सरकार ने भी जिम्मेदारियों को जबरन अपने सिर पर ले लिया है क्योंकि उस से उसे लाभ होता है, नौकरशाही मजबूत होती है.

नरेंद्र मोदी की सरकार यदि इन मामलों में कुछ नहीं करेगी तो जनता अपनेआप को ऐसे ही ठगा महसूस करेगी जैसे बेटी की बलि खजाने के लालच में देने वाला पिता करता है. अब फैसले टोटकों और मंत्रों के नहीं, व्यावहारिकता और सरलता के हों ताकि जनता अपना काम निडर हो कर कर सके. कांग्रेसी राज्यपालों व आयोगों के सदस्यों को कुछ माह मजे करने दिए जाते तो क्या हरज होता?

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