दिल्ली में जब से अरविंद केजरीवाल की सरकार 70 में से 67 सीटें जीत कर आई है तब से नरेंद्र मोदी के कलेजे पर ठीक वैसे सांप लोट रहा है जैसे देवरानी के पति की दुबई में अच्छी मोटे वेतन वाली नौकरी लगने पर जेठानी के कलेजे पर सांप लोटता है. दिल्ली का संविधान में स्थान ऐसा है कि केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार दोनों की एक छत के नीचे रहने की मजबूरी है और एक तरह से संयुक्त परिवार में चलना पड़ता है. नरेंद्र मोदी ने इस संयुक्त परिवार में ज्यादा हक होने के कारण जेठानी का काम किया और अपने उपराज्यपाल अनिल बैजल की मारफत हुक्म जारी कर दिया कि देवरानी को हर काम करने की छूट है पर जेठानी से पूछ कर. जेठानी को तो बदला लेना था.

अत: वह किसी काम को हमेशा न ही कहती. देवरानी की तरह अरविंद केजरीवाल 67 विधायकों की संपत्ति के बावजूद असहाय थे और कभी भूख हड़ताल पर उतरते, कभी धरने पर तो कभी अदालत का दरवाजा खटखटाते. 3 साल से ज्यादा समय तक खटपट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया है कि जेठानी को अपने काम से मतलब रखना होगा और अपने कारिंदे अनिल बैजल के मारफत देवरानी के कामकाज में दखल देने की जरूरत नहीं. अपने पति के घर के हिस्से पर देवरानी का राज चलेगा और जेठानी को बस बताया जाएगा कि यह काम हो रहा है. इजाजत नहीं ली जाएगी.

पर जेठानीदेवरानी का झगड़ा खत्म होगा, ऐसा दिखता नहीं है. भारतीय जनता पार्टी 2014 में केंद्र में और उस के बाद राज्यों में हुई जीत से इस तरह अहंकार में डूबी है कि वह कुछ सुनने को ही तैयार नहीं. भारतीय जनता पार्टी में 1970-80 की कांग्रेस के गुण आ गए हैं, जिस के अनुसार बड़ी पार्टी का रोब तो देशभर में चलेगा ही.

संघर्ष घर और राजनीति में चलना आम ही नहीं स्वाभाविक भी है और हरेक को इस तरह की विकट स्थिति से जूझने की आदत डालनी ही होगी. घर में विवाद खड़े होने पर बजाय रोना रोने के हरेक को उसी तरह स्थिति से जूझना चाहिए जैसे अरविंद केजरीवाल ने किया.