बेरोजगारी का फंदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गले में कसता जा रहा है. इसलिए अब अच्छे दिनों, 15 लाख रुपए हर खाते में, पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काट कर लाने जैसे झूठे वादों की तरह रेलवे में 90 हजार नौकरियों का विज्ञापन छपवाया गया है. यही नहीं, विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में भारतीयों को नौकरी देने के समाचार भी छपवाए जा रहे हैं. ये सब बातें लोकलुभावन हैं क्योंकि असली नौकरियों का अभी अकाल ही है.

वैसे जो अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है, जैसा वित्तमंत्री अरुण जेटली देश की अर्थव्यवस्था के बारे में सोतेजागते कहते रहते हैं, वहां नौकरियों की कमी नहीं होती. नौकरियों की कमी वहीं होती है जहां अर्थव्यवस्था संकुचित हो रही हो और व्यापार व उत्पादन कम हो रहा हो. सरकार घटते व्यापार व उत्पादन की वजह से ज्यादा टैक्स जमा कर के निठल्लों को नौकरियां नहीं दे पा रही. निजी सैक्टर पर कानूनों, नोटबंदी, जीएसटी और ऊपर से कंप्यूटरी युग थोपने की वजह से नौकरियां और भी कम हो रही हैं.

पहले के समय में अखबार नए उद्योगों, नई कंपनियों, नए उत्पादनों की खबरों से भरे रहते थे. लेकिन आजकल भगोड़ी कंपनियां ही सुर्खियों में हैं. हर रोज पता चलता है कि किसी गुमनाम सी कंपनी ने 250 से 3,000 करोड़ रुपए तक कर्ज लिया और उस के प्रमोटर्स भाग गए. ऐसी कंपनियों के चलते रोजगार कम होंगे, बढ़ेंगे नहीं.

कुछ सैक्टरों को छोड़ दें तो हर क्षेत्र में सन्नाटा सा है. कृषि मंडियों से ले कर आईटी कंपनियों तक एक तलवार लटकी है कि कल न जाने क्या होगा. सरकारी वादे असल में पंडों जैसे वादे साबित हो रहे हैं कि यजमान, बस, तुम दानपुण्य करते रहो, भगवान झोली भरेंगे. बेरोजगारों से कहा जा रहा है कि तुम एप्लीकेशनें और उन की फीस भरते रहो और ऊपर से नौकरियों के टपकने का इंतजार करते रहो.

सरकारी क्षेत्र में लगीबंधी, ऊपरी कमाई वाली नई नौकरियां बहुत कम होती जा रही हैं. सरकार के पास न पैसा है और न ही ऐसे क्षेत्र बचे हैं जिन में वह बेरोजगारों को नौकरी दे कर खपा सके. लाखों नौकरियां तो सरकार ने खुद कौंटै्रक्टरों को दे दी हैं जो युवाओं को रखते हैं, उन से काम लेते हैं पर उन्हें सरकारी नौकरी सा मजा नहीं देते. मेहनत से काम करने की आदत होती तो नौकरियों का अकाल ही क्यों होता?

कठिनाई यह है कि अब शिक्षा महंगी हो गई. पहले सस्ती सरकारी शिक्षा के बाद कम वेतन वाली नौकरी करने में दिक्कत नहीं होती थी. अब लगता है कि यदि लाखों रुपए खर्च कर ऊंची पढ़ाई करने के बाद भी कुछ विशेष नहीं मिला तो क्या लाभ? विदेशों में तो कुछ अवसर हैं पर वहां भारतीयों की महंगी शिक्षा भी काम नहीं आती. वे उस न्यूनतम ज्ञान से भी अनभिज्ञ होते हैं जिस को विदेशी सामान्य मानते हैं.

नौकरियों के अवसर देना किसी भी देश की सरकार के लिए टेढ़ी खीर होता है. भारत सरकार के लिए तो यह और ही कठिन है. हां, अगर पूजापाठ की नौकरियां चाहिए तो शायद बहुत अवसर हैं क्योंकि देश में कारखाने बने नहीं, मंदिर जरूर बनतेबढ़ते जा रहे हैं.

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