केरल की उस युवती की वाहवाही हो रही है जिस ने यौन शोषण करने वाले गंगेसनंथा तीर्थापाडेर उर्फ स्वामी हरि स्वामी का 8 साल संबंध बनाने के बाद छुरी से लिंग ही काट डाला. इस युवती के परिवार के लोग जिन में मां, बीमार पिता, भाई शामिल हैं कोल्लम के पनमना छतांबिल स्वामिकल आश्रम के भक्त हैं और यह युवती स्वामी की सेवा में तभी झोंक दी गईर् थी जब वह महज 15 साल की थी.

यानी असल दोषी वे मातापिता हैं, जो इस अबोध को स्वामी के आश्रम के हवाले कर आए. वह समाज अपराधी है जो आश्रमों को बनने देता है, वह कानून दोषी है, जो आश्रमों की रक्षा करता है और वह धर्म गुनहगार है, जो कहता है कि तनमनधन से गुरुओं व स्वामियों की सेवा करो. स्वामी तो उस सारे पाप भंडार का छोटा सा मुहरा है.

हिंदू धर्म में ही नहीं अधिकांश धर्मों में इस तरह का यौन शोषण आम है. कैथोलिक पोप को हर साल सैकड़ों अबोध बच्चों के यौन शोषण के मामले सुनने पड़ते हैं. पोप सदियों से अपने पुजारियों की यौनपिपासा को नजरअंदाज करते आए हैं. वहां भी हर मामले में बच्चों को मातापिता ही खुद पादरियों के हवाले करते हैं जैसे कोल्लम के इस पिता ने किया.

शायद इस स्वामी पर मुकदमा चल जाए, क्योंकि आजकल गुरुभक्तों की हिम्मत नहीं रह गईर् कि वे अदालतों और पुलिस को यौन आचरण पर आरोपी स्वामी को बचा सकें पर फिर भी असल दोषी तो यहां भी छूट जाते हैं.

असल दोषी इस मामले में मातापिता हैं, जिन्होंने अंधभक्ति में अपनी किशोर बेटी को स्वामी के हाथों सौंप दिया कि वही उद्धार करेंगे. हिंदू धर्मग्रंथ ऐसे किस्सों से भरे पड़े हैं और हर प्रमुख देवीदेवता पर यौनाचार की कहानियां मौजूद ही नहीं, जरा सा इंटरनैट खंगालने पर पढ़ी भी जा सकती हैं. संस्कृत या अन्य भाषाओं से इन के अनुवाद धड़ल्ले से हो रहे हैं और भक्त लोग देवीदेवताओं के यौनाचार को देवकार्य मानते हुए शान से दोहराते हैं. हां, अगर कोई उंगली दिखाने लगे तो धार्मिक भावनाएं आहत होने लगती हैं और यही अस्त्र इन स्वामियों का सब से बड़ा कवच है.

अगर हरि स्वामी पर इस युवती के यौन शोषण का मुकदमा चले तो मातापिता को भी अभियुक्त बनाया जाए व पूरा आश्रम पुलिस कब्जे में आ जाए, तभी न्याय मिलेगा. पर आज यह संभव नहीं है. जहां एक तरफ इसलामी कट्टरपन फैल रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका तक में प्रोटैस्टैंट ईसाई भी कट्टर कैथोलिक से बन रहे हैं तो भारत में भगवा ब्रिगेड के होते भला कैसे स्वामी के दुराचार के लिए धार्मिक व्यवस्था को दोषी ठहराया जा सकता है? किस में हिम्मत है?

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