धर्म और जाति की बिना पर प्यार से नाकभौं सिकोड़ते रहने वाले लोग अगर एक दफा ईमानदारी से अपने दिमाग से नफरत का कूड़ा निकाल कर प्यार करने वालों की बातों, जो वे दिल से करते हैं, को सुन लें तो तय है उन का नजरिया प्यार और प्यार करने वालों के हक में बदल जाएगा.

जिस समाज में हम रहते हैं उस पर उन लोगों का दबदबा है जिन्हें धर्म ने रटा दिया है कि प्यार करना बुरी बात है और धर्म के उसूलों के खिलाफ है, इसलिए जहां भी किसी को प्यार करते देखो, तुरंत एतराज जताओ, उन्हें धर्मजाति के अलावा घर की मानमर्यादाओं के नाम पर परेशान करो और इतना परेशान करो कि वे मरने तक कि सोचने लगें. यह हर्ज की बात नहीं क्योंकि धर्म जिंदा रहना चाहिए, वही जीवन का सार है.

इस कट्टरवादी सोच के तले हमेशा से ही इश्क करने वाले हारते आए हैं. वे आज भी कायदेकानूनों, रीतिरिवाजों और उसूलों के नाम पर अपनी हंसतीखेलती जिंदगी व हसीन ख्वाबों की बलि चढ़ा रहे हैं. पर प्यार में जान देने वालों की जिम्मेदारी लेने को कोई आगे नहीं आता तो यह महसूस होना कुदरती बात है कि हमें एक ऐसा समाज और माहौल चाहिए जिस में प्यार करने की आजादी हो, नौजवानों को अपनी मरजी से शादी करने का हक हो, नहीं तो प्रेमी यों ही डरडर कर जीते रहेंगे और इन में से कुछ मरते रहेंगे.

एकदूजे के लिए

भोपाल के बाग मुगालिया इलाके  में रहने वाले 19 वर्षीय रंजीत को अपने ही महल्ले में रहने वाली 17 वर्षीया काजल साहू से प्यार हो गया. एक सुनहरी जिंदगी का ख्वाब उन की आंखों ने देखा. लेकिन उन की नजरें दुनियादारी नहीं देख पाईं. जल्दी ही उन के हौसलों ने घर, समाज, जाति और धर्म के आगे घुटने टेक दिए.

पेशे से मैकेनिक रंजीत ठीकठाक कमा लेता था. उस की जिंदगी की कहानी औरों से हट कर है. एक साल पहले ही उस के पिता की मौत हुई तो मां ने दूसरी शादी कर ली थी. जब मां अपने दूसरे शौहर के यहां चली गई तो वह अपने मामा अरविंद के यहां रहने चले आया. जवानी में विधवा हो गई मां को अगर दूसरा सहारा मिल गया था तो यह कतई हर्ज की बात नहीं थी.

लेकिन एक साल के अंतर से हुई इन 2 घटनाओं ने रंजीत की जिंदगी में एक खालीपन ला दिया, जिसे पूरा किया कमसिन और खूबसूरत काजल ने जो उस के दिल का दर्द समझने लगी थी.

19 फरवरी की दोपहर में रंजीत घर आया और खुद को कमरे में बंद कर फांसी लगा ली. जैसे ही मामा अरविंद ने भांजे को फांसी के फंदे पर झूलते देखा, तुरंत पुलिस को खबर दी. पुलिस आई, कानूनी कार्यवाही व पूछताछ की और फिर रंजीत की लाश को पोस्टमौर्टम के लिए भेज दिया. सारे महल्ले में इस खुदकुशी की चर्चा थी कि क्यों सीधेसादे रंजीत, जिस का अपने रास्ते आनाजाना था, ने बुजदिलों की तरह अपनी जान, भरी जवानी में दे दी जबकि उस के सामने तो पूरी जिंदगी पड़ी थी.

कुछ ही लोगों को समझ आया कि माजरा क्या हो सकता है लेकिन वे कुछ नहीं बोले. बोलने से अब कोई फायदा भी नहीं था कि रंजीत दरअसल काजल से प्यार करता था और शादी करना चाहता था लेकिन उस के घर वाले तैयार नहीं हो रहे थे. शायद, इसलिए उस ने जान दे दी. रंजीत कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ गया था.

जैसे ही रंजीत की खुदकुशी की खबर काजल को लगी तो उस ने बगैर वक्त गंवाए फैसला ले लिया. यह फैसला दरअसल रंजीत के साथ जीनेमरने की कसमें और वादे निभाने का था. रंजीत की मौत की खबर जिस वक्त काजल को मिली, उस वक्त वह पड़ोस की एक शादी में गई थी. वह घर आई और शाम का खाना बनाया, फिर अपने कमरे में चली गई.

इस वक्त काजल की दिमागी हालत क्या रही होगी, इस का सहज अंदाजा हर कोई नहीं लगा सकता. जिस का प्यार उस से कभी छिन गया हो वही समझ सकता है कि काजल पर क्या गुजर रही होगी. रात कोई साढ़े 8 बजे काजल भी रंजीत की तरह फांसी पर झूल गई. मरने से पहले सुसाइड नोट में उस ने खुद के और रंजीत के प्यार का जिक्र किया.

अपनों द्वारा विरोध

शुरू हुआ चर्चाओं का दौर, हरेक की अपनी अलग राय थी. कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने यह कहा कि रंजीत को काजल के बालिग होने तक इंतजार करना चाहिए था. बात सच थी लेकिन ऐसा कहने वाले लोग यह नहीं सोच पाए कि आखिर क्या वजहें थी जिन के चलते रंजीत और काजल को इंतजार करना भी बेकार लगने लगा था. यह बात 10वीं में पढ़ने वाली काजल भी जानतीसमझती थी कि नाबालिग की शादी कानूनन जुर्म होती है.

दरअसल, ये दोनों इंतजार करने को तैयार थे पर इन का प्रेमप्रसंग घरवालों को रास नहीं आ रहा था. रंजीत और काजल का प्यार कोई ढकीमुंदी बात नहीं रह गई थी. जानने वालों को यह भी मालूम था कि कुछ दिनों पहले ही काजल के घरवाले शादी के लिए तैयार हो गए थे पर फिर बाद में मुकर गए थे. यह बात रंजीत के मामा अरविंद ने मानी कि दोनों में प्यार था.

इस वाकए ने अनायास ही फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ की याद दिला दी जिस में हीरो कमल हासन और हीरोइन रति अग्निहोत्री थे. ये दोनों भी एकदूसरे से टूटकर प्यार करते थे पर घरवाले अलगअलग धर्मों, जाति और इलाकों के थे, इसलिए विवाह के लिए तैयार नहीं थे. सपना और वासु पर उन्होंने तरहतरह की बंदिशें व शर्तें लाद रखी थीं जिन पर वे खरे भी उतर रहे थे पर इस के बाद भी बात नहीं बनी तो दोनों ने एकएक कर खुदकुशी कर ली थी.

यह फिल्म जबरदस्त हिट हुई थी. आज भी प्रेमियों के बीच इस के किरदारों सपना और वासु की मिसाल दी जाती है और यह आज भी इस लिहाज से मौजूं है कि प्यार के मामले में भारतीय समाज की सोच और संकरापन ज्यों का त्यों 35 साल और उस से भी पहले जैसा है. 35 साल में कितने प्रेमियों ने अपनी जान दी होगी, इस की कोई गिनती नहीं, लेकिन कुछ चर्चित मामले जरूर हैं.

जुदाई का डर

भोपाल के हमीदिया रोड स्थित होटल अमरदीप के एक कमरे में इसी साल 5 जनवरी को ही मनीषा लोवंशी और शुभम पटेल नाम के प्रेमियों ने खुदकुशी कर ली थी. इन दोनों ने जुदाईर् के डर से बाकायदा योजना बना कर साथ मरने की कसम निभाई थी. 24 वर्षीया मनीषा ने इस दिन दोपहर को एक होटल में कमरा किराए पर लिया था. थोड़ी देर बाद शुभम भी होटल के कमरे में आ गया. दोनों ने साथ मिल कर खाना खाया.

खाना खाने के बाद उन्होंने जो बातें की होंगी, वो तो उन के साथ गईं पर उन की खुदकुशी कुछ सवाल जरूर छोड़ गई. दोनों ने होटल के कमरे में सल्फास की गोलियां खा लीं.

मनीषा इंदौर की रहने वाली थी जो अकसर भोपाल आया करती थी. यहां उस की जानपहचान अपनी उम्र से 4 साल छोटे शुभम से हो गई. दोनों ने तय कर लिया कि अब साथ जिएंगे और साथ नहीं जी पाए तो मर तो साथ सकते हैं.

इस हादसे पर भी खूब सनसनी मची थी जिस में एक बात यह सामने आई थी कि मनीषा की मामीमामा को उस का शुभम से मिलनाजुलना पसंद नहीं था क्योंकि अगर वह शुभम से शादी करती तो इस का असर उन की 3 लड़कियों की शादी पर भी पड़ता यानी गैरबिरादरी के कम उम्र के लड़के से शादी करने पर पूरे घर की बदनामी होती.

ये दोनों बालिग   थे, चाहते तो शादी कर सकते थे पर इन्हें चिंता और डर जाति व समाज का था. क्यों? इस सवाल का जवाब साफ है कि प्यार करने वाले इस मोड़ पर उसूलों और ख्वाहिशों की चक्की में पिस रहे होते हैं जिस से बाहर निकलने में इन की मदद के लिए कोई न आगे आता है और न ही सही राह दिखाता है.

फिर क्या करें? रंजीतकाजल और मनीषाशुभम जैसे प्रेमी. यह सवाल हमेशा से ही मुंहबाए खड़ा है. लेकिन हारते प्यार करने वाले ही हैं जिन का गुनाह सिर्फ इतना सा होता है कि उन्होंने प्यार किया. यह प्यार आज भी चोरी और या गुनाह माना जाता है तो इस के असल जिम्मेदार धर्म के ठेकेदार हैं जो नहीं चाहते कि नौजवान अपनी मरजी से शादी करें, अगर करेंगे तो इन के खोखले उसूल, कायदे, कानून और रीतिरिवाज ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगे जो इन की रोजीरोटी का तो बड़ा जरिया हैं ही, साथ ही समाज पर इन का दबदबा भी बनाए रखते हैं.

बीती 18 दिसंबर को मध्य प्रदेश के शिवपुरी में एक और ऐसा ही हादसा हुआ था जिस में 20 वर्षीया माशूका आरती कुशवाह ने अपने 22 वर्षीय आशिक महावीर रजक के खुदकुशी करने के बाद खुद भी आत्महत्या कर ली. महावीर चूंकि छोटी जाति का था और आरती ऊंची जाति की, इसलिए इन दोनों की शादी के लिए इन के घर वाले राजी नहीं हो रहे थे. ये दोनों बैराड़ गांव से शिवपुरी पढ़ने आए थे और एकदूसरे को बेइंतहा चाहने लगे थे.

महावीर और आरती ने धर्म द्वारा बनाए और फैलाए गए जातिवाद की सजा अपनी जानें दे कर भुगतीं तो किसी ने कुछ नहीं कहा, न ही सोचा कि आखिर इन मासूमों का इस में कुसूर क्या था. कुल मिला कर साबित यह हुआ कि वाकई प्यार करने वाले धर्म, जाति और ऊंचनीच वगैरा कुछ नहीं देखते और ऐसा होना तभी मुमकिन है जब दिलों में प्यार का एहसास जाग जाए.

पर इन्हें सजा क्यों

2 बालिग जब प्यार करते हैं तो सही मानो में उन्हें जिंदगी के माने समझ आते हैं. प्रेमियों को सारी दुनिया हसीन लगती है और उन का कुछ करगुजरने का जज्बा भी सिर उठाने लगता है. उन्हें अपने वजूद का एहसास होता है, जिंदगी का मकसद मिलता है और एक सुकूनभरी जिंदगी गुजारने के लिए वे एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगते हैं. धर्म, जाति और उम्र के बंधन तोड़ने पर ये उतारू हो जाते हैं. लेकिन हकीकत से जब टकराते हैं तो इन की हिम्मत जवाब देने लगती है.

यह हकीकत है कि ये प्यार करने वाले धर्म के ठेकेदारों और समाज के पैराकारों के बिछाए सदियों पुराने जाल में फड़फड़ा कर परिंदों की तरह दम तोड़ देते हैं. किसी का दिल नहीं पसीजता, उलटे प्रचार यह किया जाता है कि देख लो, प्यार करने का अंजाम.

कई मामलों में प्रेमी बालिग होते हैं और हर लिहाज से काबिल भी होते हैं लेकिन उसूल तोड़ कर अपने सपनों का आशियाना बनाने की हिम्मत वे नहीं जुटा पाते. इस की वजह सिर्फ यह है कि वे एक बुजदिल बेडि़यों में जकड़े समाज और दुनिया में जीने के बजाय साथ मर जाना बेहतर समझते हैं.

कहने का मतलब यह नहीं कि खुदकुशी करना कोई बहादुरी वाली बात है बल्कि यह है कि प्रेमियों को अपनेआप में दुनिया, धर्म और समाज से लड़ने की हिम्मत जुटानी चाहिए क्योंकि अपनी मरजी के मुताबिक शादी करना और जिंदगी जीना हर किसी का हक है. जिंदगी को बेकार के रीतिरिवाजों व नियमों की बलि चढ़ा कर ये लोग प्यार को कमजोर साबित कर जाते हैं.

आ रहा है बदलाव

एकसाथ खुदकुशी कर मर जाने वालों को समाज में आ रहे बदलावों को भी गौर से देखना चाहिए. आजकल पढ़ेलिखे, खातेपीते घरों में 60 फीसदी शादियां दूसरी जाति में हो रही हैं और हैरत की बात यह है कि राजीखुशी हो रही हैं. मांबाप खुद बच्चों की मरजी से शादी कराने के लिए आगे आ रहे हैं. थोड़ी तकलीफ हालांकि उन्हें भी होती है पर बच्चे खुद को अच्छा पतिपत्नी साबित कर दें, तो वक्त रहते वह तकलीफ भी दूर  हो जाती है.

दरअसल, फर्क शिक्षा और माहौल का है जिसे बदलने के लिए जरूरी है कि पहले कैरियर बना कर खुद के पैरों पर खड़ा हुआ जाए, दुनियाजमाने की परवा न की जाए.  इस के लिए जरूरी है कि आशिक और माशूका साथ जीने की कसम खाएं, साथ मरने की बात तो उन्हें सोचनी ही नहीं चाहिए क्योंकि कानून उन के साथ है. धीरेधीरे लोगों का नजरिया भी बदल रहा है पर उस का दायरा अभी सिमटा है, तो जाहिर है नौजवानों के विरोध, गैरत और अच्छे कैरियर से ही और बढ़ेगा.   

इन्होंने जीती जंग

नए साल की शुरुआत प्यार के मामले में ठीकठाक नहीं हुई थी. 3 जनवरी की सुबह भोपाल के कलैक्ट्रेट में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था और उन के इरादे नेक नहीं लग रहे थे. लिहाजा, भारी तादाद में पुलिस बल यहां तैनात था जिसे देख हर कोई हैरत में था कि आखिर यहां कौन सा पहाड़ टूटने वाला है.

दरअसल, इस दिन बैंक की एक मुलाजिम रितु अपने प्रेमी विशाल से कोर्टमैरिज करने वाली थी. विशाल चूंकि ईसाई धर्म को मानने वाला है, यह भनक लगते ही कि एक हिंदू लड़की क्रिश्चियन लड़के से शादी करने जा रही है वह भी अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ, तो बजरंगियों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था.

ये लोग रितु और विशाल की शादी न होने देने पर आमादा थे तो इन दोनों ने दृढ़ कर रखा था कि कुछ भी हो जाए, प्यार के इन दुश्मनों के सामने सिर नहीं झुकाना है. शादी से रोकने के लिए रितु के घरवालों ने उसे मारापीटा भी था. इस से साबित हो गया था कि ऐसा गांवदेहातों के अनपढ़ कहे जाने वाले लोगों में ही नहीं, बल्कि पढ़ेलिखे शहरी भी जातपांत, धर्म और ऊंचनीच की गिरफ्त में हैं.

खूब हंगामा हुआ लेकिन ये दोनों अपने फैसले से टस से मस नहीं हुए और रजिस्ट्रार के यहां शादी की दरख्वास्त लगा दी. शादी के दिन भारी गहमागहमी के बीच एडीएम रत्नाकर झा ने रितु को कोर्ट में बुला कर पूछा कि कहीं विशाल और उस के घरवाले तुम्हें बहलाफुसला कर तो शादी नहीं कर रहे हैं और मुमकिन है शादी के बाद तुम्हारा धर्मपरिवर्तन भी करा दें. जवाब में पूरे भरोसे के साथ रितु ने कहा कि वह विशाल से ही शादी करना चाहती है. एडीएम के यह पूछने पर कि तुम्हारे घरवाले नहीं चाहते कि तुम किसी दूसरे लड़के से शादी करो तो रितु ने कहा कि विशाल और मैं ने एकसाथ जीनेमरने की कसम खाई है और इसे मैं उम्रभर निभाऊंगी.

रितु का यह भी कहना था कि वह बालिग है और अपना भलाबुरा बखूबी समझती है. अपने घरवालों के एतराज से उसे कोई सरोकार या लेनादेना नहीं है. उधर, विशाल ने पूरी सख्ती के साथ कहा कि भले ही रितु के मांबाप गुस्सा हों लेकिन वह उन्हें अपने मांबाप की तरह इज्जत देगा और जिंदगीभर रितु का खयाल रखेगा. एडीएम ने बाहर हिंदूवादियों के  जमावड़े की परवा न करते हुए इन दोनों की शादी पर कानूनी मुहर लगा दी.

इस मामले से सबक यह मिलता है कि अगर प्रेमी प्यार के दुश्मनों से लड़ने की ठान लें, तो कोई उन का कुछ नहीं बिगाड़ सकता. फिर मरने की बात सोचने का तो सवाल ही नहीं उठता.

क्या करें

प्यार करना गुनाह नहीं है पर उस में साथसाथ या फिर अलगअलग किसी एक का खुदकुशी कर लेना, वह भी डर से, जरूर गुनाह है जिस से इस तरह बचा जा सकता है

–       शादी का फैसला बालिग होने पर ही लें.

–       शादी से पहले काबिल बनें यानी अपने पैरों पर खड़े हों.

–       कोई भी फैसला लेने से पहले घर वालों को मनाने की हर मुमकिन कोशिश करें.

–       घरवाले न मानें तो रिश्तेदारों और दोस्तों का साथ लेने की कोशिश करें.

–       अगर कोई भी साथ न दे तो कोर्टमैरिज करें और अलग रहें.

बिलाशक ये बातें कहनेसुनने में आसान लगती हैं लेकिन इन पर अगर आसानी से अमल किया जा सकता तो बड़े पैमाने पर प्रेमी खुदकुशी करते ही क्यों? पर मुहब्बत की जंग जीतने के लिए जरूरी है अपनेआप में हिम्मत पैदा की जाए. इस के लिए जरूरी है कि घरपरिवार, जाति और धर्म को ले कर ज्यादा जज्बाती न हुआ जाए और यह भी न सोचा जाए कि अगर अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ शादी कर ली तो उन पर क्या गुजरेगी.

सोचें यह कि जब हम एकदूसरे के बगैर वाकई नहीं रह सकते तो हम पर क्या गुजरेगी. खुदकुशी करना आसान काम है, पर इस से सपने पूरे नहीं होते, न खुद के और न ही घरवालों के जो धर्म व जाति के चक्रव्यूह में फंसे अपने बच्चों का भला भी नहीं सोच सकते.