सुप्रीम कोर्ट ने औरतों को राहत देने वाला एक निर्णय दिया है कि गर्भपात का अधिकार केवल औरतों का ही है और इस में उन्हें पति की सहमति की भी आवश्यकता नहीं है. एक अस्पताल पर रूठे हुए अलग रह रहे पति के मुआवजे के मामले को खारिज करते हुए पहले उच्च न्यायालय ने और फिर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि औरतें कोई मशीन नहीं कि उन का हुआ बच्चा पति की संपत्ति है. औरत अपनी इच्छा से बच्चा पैदा कर सकती है और गर्भपात भी करा सकती है.

जो औरतें कन्या भ्रूण हत्या पर हल्ला मचाती रहती हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि यह हक कि गर्भ में लड़की है या लड़का, जानना और उसे जन्म देना या नहीं देना उन्हीं का खुद का हक है और वे नाहक पतियों, सासों, ससुरालियों को दोष देती रहती हैं और बेटियों के बारे में कविताएं, कहानियां गढ़ती रहती हैं.

अगर गर्भ रखने और बच्चा पैदा करने का हक है ही औरत का तो बेटा हो या बेटी यह निर्णय भी तो उसी का हुआ न. समाज अगर दूसरी, तीसरी या चौथी बेटी पर भौंहें चढ़ाता है तो दोषी औरतें खुद हैं. 2 बेटियों के बाद जो औरतें तीसरे बच्चे का रिस्क लेती हैं वे खुद पुत्र मोह में फंसी रहती हैं पर दोष पति या सास को देती हैं जबकि कानूनी व्यवस्था साफ है कि अगर 2 के बाद गर्भ ठहर जाए तो गर्भपात का हक औरत और केवल औरत को है.

असल बात यह है कि हमारी शिक्षित औरतें बेहद अंधविश्वासी व रूढि़वादी हैं और जहां एक तरफ आईफोन और लैपटौप इस्तेमाल करती हैं, वहीं दूसरी तरफ उसी में कुंडली बनवाती हैं, वास्तु के ऐंगल ढूंढ़ती हैं और राशिफल पढ़ती हैं. उन में तार्किक दृष्टि है ही नहीं, क्योंकि धर्म की रक्षा का जनून उन के सिर पर इस तरह सवार रहता है कि उस के लिए हजारों मील का सफर कर के कभी तिरुपति तो कभी बदरीनाथ पहुंचती हैं और वहां मोबाइलों से सैल्फी ले कर खुद को आधुनिक कहती हैं.

गर्भपात के अधिकार का इस्तेमाल न कर के समाज को दोष देना और सामाजिक नियमों को सही मानना जैसा दोगलापन हमारी शिक्षित आधुनिकाओं का गहना है, जो बात अंगरेजी में करती हैं पर रटती संस्कृत में हैं. सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा है पर कहने से क्या होता है?