गृहशोभा विशेष

कारें एक बार फिर चर्चा में हैं. देश की राजधानी दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनाट प्लेस में कारों की आवाजाही पर रोक लगाए जाने की योजना बनाई जा रही है. फिलहाल  3 महीने के एक पायलट प्रोजैक्ट के तहत इस के भीतरी सर्कल को सिर्फ पैदल यात्रियों के लिए आरक्षित कर दिया जाएगा. केंद्रीय ट्रांसपोर्ट मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि सरकार कारों की बेलगाम खरीद पर रोक लगाने पर विचार कर रही है. सैद्धांतिक रूप से इस पर सहमति भी बन चुकी है कि अब सिर्फ वही लोग कार खरीद पाएं, जिन के घर या सोसायटी में कार पार्क करने की एक सुनिश्चित जगह हो. इस में कोई शक नहीं है कि देश में कारों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि सड़कों पर उन्हें समाने की जगह पर्याप्त नहीं है. देश में कारें बढ़ी हैं, पर वे जरूरत हैं या शौक, इस का खुलासा आयकर विभाग के एक आंकड़े से हो रहा है.

आयकर विभाग ने बीते 5 वर्षों के आंकड़ों के आधार पर दावा किया है कि देश में सिर्फ 24.4 लाख करदाताओं ने अपनी सालाना आय 10 लाख रुपए से ज्यादा बताई है, जबकि हर साल यहां  25 लाख कारें खरीदी जा रही हैं. खास बात यह है कि इन में से करीब 35 हजार कारें लग्जरी गाडि़यों में आती हैं जिन की कीमत 10 लाख रुपए से ज्यादा होती है. सवाल यह उठाया गया है कि जब आमदनी नहीं है तो महंगी कारें खरीदने वाले लोग आखिर कौन हैं? जाहिर है कि रिटर्न यानी आयकर विवरणी दाखिल करने वालों में से बहुत से लोग ऐसे हैं जिन की वास्तविक आय कहीं ज्यादा है, लेकिन उन्होंने खुद को टैक्स के दायरे से बाहर रखने के कानूनीगैरकानूनी उपाय कर रखे हैं. मसला भले ही टैक्स चोरी का है, लेकिन ऐशोआराम की जिस चीज यानी लग्जरी कारों के संदर्भ से ये आंकड़े उजागर किए गए हैं, उन से एक बार फिर कारों की जरूरत पर सवाल उठना लाजिमी है.

लाचारी नहीं, समझदारी भी

कारों को विलेन बनानेबताने की कोशिशों के बीच यह जानना जरूरी है कि आखिर शहरों में कार को किस बात ने जरूरी बनाया है. इस की पहली जिम्मेदारी तो असल में लचर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली पर जाती है जिस के बारे में सरकारों ने लगातार कोताही बरती और तेल व कार कंपनियों को फायदा पहुंचाने की नीयत से कारखरीद को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां बनाईं.

लगातार फैलते दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों के एक आम निवासी की नजर से देखें तो समझ में आएगा कि आखिर क्यों वह कार खरीदने और उसे बरतने के लिए मजबूर हुआ है.  पहला उदाहरण दिल्ली का लें, यहां नौकरी करने या बिजनैस करने का यह मतलब नहीं है कि आप शहर के उन हिस्सों में रहते हों जहां मैट्रो रेल उपलब्ध है या डीटीसी की सेवाएं हर वक्त हाजिर हैं. भले ही दिल्ली मैट्रो का दायरा आज सैकड़ों किलोमीटर तक फैल गया है, लेकिन आज भी हजारोंलाखों नौकरीपेशा लोग कहीं भी आनेजाने के लिए या तो डीटीसी बसों पर निर्भर हैं या फिर आटो टैक्सी पर.  बसों का विकल्प देखें तो साढ़े 3 हजार बसों के बेड़े में से औसतन दो से  ढाई हजार बसें ही रोज मुहैया हो पाती  हैं. बाकी खराबी या मेंटिनैंस की समस्या से जूझ रही होती हैं. इस शहर की विशालकाय आबादी की जरूरतों के मुताबिक ये बसें पर्याप्त नहीं हैं. इस के अलावा उत्तम नगर, नरेला, लोनी रोड जैसे कई इलाकों में बसें तो गिनती की ही चलती हैं.

यही नहीं, यदि आप एनसीआर यानी राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र के निवासी हैं, तो वहां आलम यह है कि डीटीसी की बसें मुहैया ही नहीं हैं. मिसाल के तौर पर, ग्रेटर नोएडा इसी एनसीआर का अहम हिस्सा है, पर कुछ वर्षों तक नाममात्र का संचालन करने के बाद डीटीसी ने वहां अपनी बसों का परिचालन रोक दिया था. इस का जिम्मा जिस यूपी रोडवेज पर है, उस की बसें रात 8 बजे के बाद ऐसे लापता हो जाती हैं, मानो उन की मौजूदगी की कोई जरूरत ही नहीं है. जबकि दिल्ली स्थित दफ्तरों और कार्यस्थलों से घरों को लौटने वाले लोगों को इसी वक्त एक मजबूत सार्वजनिक परिवहन की जरूरत होती  है. इधर, दिल्ली मैट्रो से जोड़ कर एनएमआरसी (नोएडा मैट्रो रेल कौर्पोरेशन) ने नई कंपनी के तहत बसें चलानी शुरू की हैं, पर वे गिनती की हैं और उन की विश्वसनीयता संदिग्ध है.

समझा जा सकता है कि दिल्ली के दूरदराज और एनसीआर के किसी भी हिस्से में रहने वाले शख्स को अगर जरूरत के वक्त मैट्रो तो क्या, पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में भी बसें भी नहीं मिलेंगी, तो वह क्या करेगा? जाहिर है कि रोज दफ्तर आनेजाने के लिए वह ओला या उबर जैसी प्राइवेट टैक्सी के लिए न्यूनतम 4-5 सौ रुपए प्रतिदिन खर्च करने के बजाय कार खरीदने की समझदारी ही दिखाएगा.

कार : एक जरूरी कमोडिटी

आज की नौजवान पीढ़ी कारों को एक जरूरी कमोडिटी मानती है. इस के पीछे कार से मिलने वाली सुविधाएं ही अहम हैं. आज के युवा कहीं आनेजाने के लिए बसों, मैट्रो या आटो टैक्सी पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि वे निजी ट्रांसपोर्ट के हिमायती हैं. इस के अलावा देश में मौसम की विविधता के मद्देनजर भी कारों की जरूरत को समझा जाना चाहिए. कभी तेज धूप, गरमी, धूल, कभी बरसात और कड़ाके की ठंड. ऐसे में एक छत के साथ एयरकंडीशंड वाहन बहुत जरूरी लगता है. जिन मुल्कों में ज्यादा बर्फबारी होती है, वहां तो कार के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती. इसी तरह भारत में भी कई इलाके ऐसे हैं जहां कारें मौसम की मार से बचाने के तर्क के साथ जरूरी लगती हैं.

यही नहीं, हमारे देश में बहुत से बिजनैस और नौकरियों में संपर्क व आवागमन का सिलसिला इतना ज्यादा बढ़ा है कि उस के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर आश्रित हो कर नहीं रहा जा सकता. इन्हीं वजहों से कभी मारुति ने हमारी सोसायटी के इस सपने के साथ कदमताल की थी, पर अब इस सपने का दायरा और बढ़ चुका है. लोगों की इस फिक्र से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि छोटी और सस्ती कारों के आ जाने से ट्रैफिक जाम और प्रदूषण आदि की समस्याओं में इजाफा हुआ है, पर भारत में कम ईंधन खपत करने वाली और कम प्रदूषण फैलाने वाली कारों का अभी भी काफी स्कोप है.  आंकड़ों में देखें तो देश में कारों की खपत बढ़ रही है. फिर भी दावा किया जाता है कि भारत में अभी उतनी कारें नहीं हैं, जितनी विदेशों में, यहां तक कि पड़ोसी मुल्कों में. वर्ष 2009 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में अभी प्रति हजार लोगों पर 14 कारें हैं. जबकि पाकिस्तान में यह आंकड़ा 19, श्रीलंका में 28, सिंगापुर में 68, यूरोप में 500-1000 और अमेरिका में 740 है. माना जा सकता है कि कारों के मामले में हम अभी बहुत पीछे हैं. लेकिन हमारे शहरों का आबादी घनत्व काफी ज्यादा है, इसलिए दिल्ली-मुंबई हो या कानपुर-अहमदाबाद, सड़कों पर कारों की भीड़ दूसरे देशों के मुकाबले काफी ज्यादा बैठती है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट की खामी जैसी मजबूरियां कारों की मांग पैदा कर रही हैं, जिस का नतीजा यह निकला है कि कारों के निर्माण के मामले में भारत दुनिया का छठा सब से बड़ा मुल्क बन चुका है.

वर्ष 2011 में भारत में 39 लाख कारों का निर्माण हुआ और इस ने ब्राजील को पीछे छोड़ दिया. एशिया के पैमाने पर वर्ष 2009 में जापान, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड के बाद भारत चौथा सब से बड़ा कार निर्यातक देश था और अगले 2 वर्षों में इस ने थाईलैंड को पीछे छोड़ते हुए 2010 में तीसरा स्थान हासिल कर लिया. वर्ष 2010 के आंकड़ों के हिसाब से भारत में कुल मिला कर 39 लाख कारों का सालाना उत्पादन होता है और चीन के बाद दुनिया में सब से तेज बढ़ता आटो सैक्टर भारत में ही है.

कारें विलेन क्यों बनीं

कोई शक नहीं कि कार बाजार की बदौलत देश की अर्थव्यवस्था में हलचल पैदा हुई है और हजारोंलाखों नए रोजगार भी पैदा हुए हैं. इसी तरह मध्यवर्ग के लिए भी सस्ती और छोटी कारों का जो सपना देखा गया, उस ने भी कुछ लाख लोगों की जिंदगी में क्रांतिकारी तबदीली की. लेकिन एक तरफ यही कारें पर्यावरण की शत्रु साबित हुई हैं और दूसरी तरफ दावा किया जाता है कि ये उस ट्रैफिक समस्या का कोई खास विकल्प नहीं बन पाई हैं, जिस के हल के रूप में उन्हें पेश किया गया था. अलबत्ता ज्यादातर परिवारों के लिए महंगी से महंगी कारें स्टेटस सिंबल जरूर हैं.  स्टेटस बढ़ाने वाली कारें किसी समस्या का समाधान नहीं सुझाती हैं जबकि हमारे देश में किसी भी ऐसे उपक्रम का पहला उद्देश्य बड़ी दिक्कतों को हल निकालना होना चाहिए. लेकिन जिन कारों के बिना शहरों की जिंदगी थम जाने की बात अब कही जाती है, अब वे तमाम दिक्कतें भी पैदा कर रही हैं. जरूरत के मुकाबले तंग महसूस की जाती सड़कों पर कारों की भीड़ लगभग रोजाना ट्रैफिक जाम की समस्या पैदा करती है. इन समस्याओं से निबटने को दिल्ली-गुरुग्राम जैसे महानगरों में एक के बाद एक फ्लाईओवर, सबवे और क्लोवरलीफ जैसे विकल्प पेश किए गए हैं, पर जाम का झाम यथावत जारी है.

दिल्ली-मुंबई से अलग दूसरे शहरों में कारें ज्यादा परेशानियां खड़ी कर रही हैं क्योंकि वहां न ट्रैफिक संभालने वाले इंतजाम पूरे हैं और न ही सड़कें दुरुस्त हालत में हैं. कारों की बढ़ती भीड़ के कारण अब तो स्कूटर और साइकिल वालों का सड़क पर निकलना दूभर हो गया है और पैदल यात्रियों पर तो मानो कारें कहर बन कर टूटी हैं. ज्यादातर शहरी सड़क दुर्घटनाओं में पाया गया है कि गैर प्रशिक्षित, असावधान और पियक्कड़ कारचालक पैदल चलने वालों को कहीं भी कुचल कर भाग खड़े होते हैं.  इस विडंबना का एक और रूप है. देश में किसी भी व्यक्ति को फिलहाल मनचाही संख्या में कारें रखने और इस्तेमाल करने की आजादी है, भले ही वह टैक्स न देता हो. इस आजादी के नतीजे में निजी कारों की संख्या तो बढ़ गई लेकिन वे यातायात समस्या का कोई हल नहीं दे पा रही हैं.

मिसाल के तौर पर दिल्ली में सड़क पर दिखने वाले कुल ट्रैफिक का  75 प्रतिशत हिस्सा निजी कारों का होता है, लेकिन उन से यात्रा की 20 प्रतिशत  से भी कम जरूरत पूरी होती है. यह हालत तब है जब इस शहर के केवल 30-32 प्रतिशत परिवारों के पास ही कार की सुविधा है. पर इन दिक्कतों के लिए कारों को विलेन ठहराना क्या जायज है?

असल में, कारों के अंधाधुंध आगमन के अलावा ज्यादातर शहरों के ट्रैफिक का बुरा हाल करने में कुछ और बातों की भूमिका रही है, जैसे हमारे देश में ज्यादातर सड़कें कारों के हिसाब से डिजाइन नहीं की गईं. पार्किंग के समुचित प्रबंध नहीं किए. कानून में नए घरमकानों में यह जरूरी नहीं किया गया कि उन में कारों की पार्किंग के लिए अनिवार्य रूप से जगह हो, हालांकि अब इस की पहलकदमी हो रही है. जैसे, साल 2014 में दिल्ली में किए गए एक कानूनी प्रावधान के मुताबिक, 100 मीटर के मकान में निश्चित संख्या में कारों की पार्किंग की बात कही गई थी.  इसी तरह अब कहा जा रहा है कि पार्किंग स्पेस नहीं रखने वालों को कारखरीद की इजाजत नहीं होगी. लेकिन इसी दिल्ली में सैकड़ों अवैध कालोनियां ऐसी हैं जहां कारें बाहर गली में खड़ी की जाती हैं. वहां ऐसा करने पर कोई रोकटोक नहीं है.

कार कंपनियों के लिए ऐसे कड़े कायदों की भी कमी है कि वे कितना प्रदूषण फैला सकती हैं और उन के पैसेंजरों की सुरक्षा के कितने माकूल प्रबंध होने चाहिए. कारों से पैदा होने वाली इन समस्याओं के कई समाधान हो सकते हैं. जैसे, कानूनन जरूरी किया जाए कि एक परिवार अधिकतम कितनी कारें रख सकता है, किसी बाजार, कालोनी या सोसायटी में पार्किंग के इंतजाम होने चाहिए, एक वक्त पर सड़कों पर अधिकतम कितनी कारें आने की इजाजत होनी चाहिए और यदि लोग अपनी कारें घर में छोड़ कर आते हैं, तो सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें हर हाल में बस या मैट्रो का विकल्प मिलेगा. इसी तरह छोटे शहरों में भी लोगों को टूटीफूटी सड़कों के स्थान पर रास्ते दुरुस्त मिलें और वहां भी बढ़ते ट्रैफिक के मद्देनजर फ्लाईओवर व सबवे आदि के इंतजाम किए जाएं.  सब से अहम यह है कि ट्रैफिक नियमों का पालन हर कहीं और हर किसी के लिए जरूरी किया जाए. असल में, इन्हीं सारी समस्याओं के चलते कारें किसी समस्या का समाधान बनने के बजाय खुद में एक समस्या बन गई हैं. यदि इन सभी कारणों का निवारण कर दिया जाए, तो कारें हमारी शहरी जिंदगी में आततायी नहीं, बल्कि एक समाधान की तरह सामने आएंगी.

कार फ्री डे और औड-ईवन प्रबंध

वर्ष 2015 के सितंबर माह में देश के औद्योगिक शहर गुरुग्राम में पहली बार कार फ्री डे का आयोजन किया गया. इसे ले कर काफी सनसनी रही. इस दिन शहर की कुछ एकदम खाली सड़कों के फोटो अखबारों में छापे गए और उम्मीद की गई कि कारों की बढ़ती संख्या के कारण होने वाले प्रदूषण और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याओं की तरफ लोगों का ध्यान जाएगा. इस की देखादेखी दिल्ली में भी  22 अक्तूबर, 2015 को कारमुक्त दिवस का आयोजन किया गया. एकदिवसीय इन आयोजनों को ले कर सरकार, प्रशासन के स्तर पर काफी हलचल रही. लेकिन आम जनता की सहूलियत के पर्याप्त प्रबंधों के अभाव में ये रस्मी आयोजन भर बन कर रह गए. सवाल उठा कि आखिर कार फ्री डे की नाकामी की वजह क्या रही?

इस सवाल के जवाब में दुनिया के दूसरे शहरों में कार फ्री डे आयोजनों की तरफ नजर डालनी होगी. मसलन, अगर जापान की राजधानी टोक्यो में यही आयोजन होता है, तो उस दिन सड़कें निपट सूनी नहीं दिखतीं. उन पर पैदल और साइकिल से चलने वालों की भीड़ होती है. कारें नदारद होती हैं, लेकिन लोगों का कामकाज नहीं रुकता. पर हमारे देश में कार फ्री डे पर लोग अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता दिखाते हुए कामकाज से ही छुट्टी ले लेते हैं. मानो, वे साबित करना चाहते हैं कि अगर कहीं जाने के लिए किसी वजह से कार उपलब्ध नहीं है, तो बेहतर होगा कि घर में बैठा जाए.  यह समस्या महज जनता के स्तर पर नहीं है. बेशक, आज ज्यादातर लोग दिखावे के लिए कार खरीदना और उन का इस्तेमाल करना चाहते हैं, पर यदि वे ऐसा न करें, तो शहरों में कहीं आनेजाने के लिए उन के पास विकल्प क्या हैं? चाहे दिल्ली, मुंबई हो, कानपुर, लुधियाना या कोई अन्य बड़ा शहर, सभी जगह लचर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली ने लोगों को मजबूर कर दिया है कि वे किसी साधन का इंतजाम अपने स्तर पर करें. कारों की संख्या नियंत्रित करने की तो कहीं कोई बात ही नहीं है. इस के नतीजे में शहरों में ट्रैफिक जाम बढ़ता है जिस से नजात पाने के लिए कार फ्री डे जैसे आयोजनों के बारे में सोचा जाता है.

वैसे, भारत में कार फ्री डे भले ही नाकाम रहा हो, पर अन्य मुल्कों में इसे काफी सफलता मिली है.  1995 में विश्व कार मुक्त दिवस का आयोजन भी किया गया, लेकिन अपने स्तर पर राष्ट्रीय कैंपेन चलाने वाला ब्रिटेन ऐसा पहला मुल्क था, जिस ने यह आयोजन पृथक रूप से 1997 में अपने देश में किया और इस के बाद फ्रांस ने भी 1998 में ‘इन टाउन, विदाउट माई कार’ नारे के साथ कार मुक्त दिवस का आयोजन किया.  लोगों को इन आयोजनों के जरिए संदेश दिया जाता रहा है कि वे एक दिन अपनी कार छोड़ कर बस या मैट्रो जैसे सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल करें. इस से कार्बन डाईऔक्साइड के उत्सर्जन में तो कमी आएगी ही, उस भीषण ट्रैफिक जाम से भी मुक्ति मिलेगी जो शहरी जीवन का मजबूरन अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है.

घर से कार्यस्थल के बीच की दूरी तय करने में लगने वाला वक्त ट्रैफिक जाम के कारण बढ़ता जा रहा है और मानसिक थकान व अन्य बीमारियों (हाईब्लडप्रैशर व चिड़चिड़ापन आदि) की संख्या भी. रोडरेज यानी सड़क पर पैदल यात्रियों या अन्य वाहनचालकों से मामूली बात पर झगड़े व मारपीट की नौबत भी इसी कारण आने लगी है.  कार फ्री डे जैसा हश्र औडईवन फौर्मूले का भी हुआ है. सड़कों पर पड़ रहे बेइंतहा दबाव व प्रदूषण की समस्या से निबटाने को और वाहनों के सुचारु संचालन के लिए देश की राजधानी दिल्ली में 2 बार लागू किया गया समविषम फार्मूला विवादों में रहा है. एक विवाद इस की विज्ञापनबाजी पर हुए करोड़ों के खर्च को ले कर हुआ, विपक्ष ने इसे फुजूलखर्ची बताते इस का विरोध किया. इस के समानांतर टैक्सी संचालकों ने उस दौरान ग्राहकों की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए सब से व्यस्त समय में शुल्क बढ़ाने की कोशिश की, जिस पर दिल्ली सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी.

यही नहीं, इस दौरान इस तथ्य का खुलासा भी हुआ कि कैसे कम कीमत  में सैकंडहैंड कार ले कर लोगबाग समविषम की समस्या का तोड़ निकालने लगे थे. साफ है कि दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों को प्रदूषण और भारी ट्रैफिक की समस्या से राहत दिलाने में ये उपाय तब तक कारगर नहीं होंगे जब तक जनता की मानसिकता नहीं बदली जाती और लोगों को बेहतरीन पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुविधा मुहैया नहीं कराई जाती.

शहरीकरण की सही परिभाषा

कारों को मर्ज साबित करने में हमारे देश में बेतरतीब ढंग से हुए शहरीकरण की बड़ी भूमिका है. असल में, हमारे नएपुराने शहरों की रूपरेखा क्या होनी चहिए, इसे ले कर अभी पर्याप्त असमंजस बना हुआ है. एक तरफ सरकार है जो स्मार्टसिटी योजना के तहत देश के 100 शहरों को भविष्य का शहर बनाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी ओर खुदबखुद अनियोजित ढंग से बसते शहर हैं जो आकारप्रकार में बढ़ जरूर रहे हैं लेकिन बसाहट के उन के अंदाज सदियों पुराने हैं.  मुश्किल यह है कि सरकार की योजनाओं के बाहर बनने और बिगड़ने वाले ऐसे ज्यादातर शहरों ने देश के शहरीकरण की शक्ल  ही बिगाड़ कर रख दी है. यह शहरीकरण चाहे जैसा हो, अब इसे रोका नहीं जा सकता, लिहाजा सवाल उठता है कि कारों के मर्ज से पहले इन का इलाज नहीं होना चाहिए.  एक आकलन के अनुसार, वर्ष 2028 तक भारत दुनिया में सब से ज्यादा आबादी घनत्व वाला देश होगा. यानी अगले डेढ़ दशक के भीतर इस मामले में हम अपने पड़ोसी मुल्क चीन को पीछे छोड़ने वाले हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि तब वहां (चीन में) जनसंख्या में गिरावट का दौर शुरू हो चुका होगा, जबकि भारत की आबादी तेजी से बढ़ रही होगी. यह आकलन संयुक्त राष्ट्र की वर्ष 2013 की जनसंख्या रिपोर्ट का है.

रिपोर्ट में सब से ज्यादा चौंकाने वाली तसवीर भारत की है. रिपोर्ट कहती है कि आबादी की जरूरतों के मद्देनजर और विकसित देशों की देखादेखी हमारे देश में शहरीकरण को तो बढ़ावा दिया गया, लेकिन इस तबदीली का हमारी सरकारों और योजनाकारों ने कोई गंभीर नोटिस नहीं लिया.  नतीजा यह निकला कि आज देश के ज्यादातर शहर बेकाबू और अनियोजित फैलाव के शिकार हो गए हैं. इस की तसदीक कुछ ही समय पहले विश्व बैंक की एक रिपोर्ट ‘अर्बनाइजेशन इन साउथ एशिया’ में की गई है. इस में कहा गया है कि भारत में ज्यादातर शहर बिना किसी सरकारी योजना या टाउन प्लानिंग के अभाव में बेरोकटोक बसाए जा रहे हैं. उन में यह व्यवस्था नहीं है कि किस इलाके में कितने मकान बनेंगे, कितनी आबादी निवास करेगी, उन की जरूरतों के हिसाब से सड़क, पानी, बिजली आदि इंफ्रास्ट्रक्चर का क्या प्रबंध होगा.

उल्लेखनीय यह भी है कि देश में एक नया मध्यवर्ग उन्हीं लोगों के बीच से उभर रहा है जो ग्रामीण इलाकों में शहरों की ओर बेहतर जीवनशैली की आस में पलायन कर रहा है. आंकड़े इस के गवाह हैं- साल 2008 में 34 करोड़ भारतीय शहरों के बाशिंदे बन चुके थे और अनुमान है कि 2030 तक यह तादाद बढ़ कर 59 करोड़ पहुंच जाएगी.  इस आबादी की जरूरतों के मद्देनजर फिलहाल देश के ज्यादातर शहरों की पहली मौलिक समस्या हर तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की खराबी है. सड़कें, सीवर, बिजली, पानी की मूलभूत कमियों के बाद अवैध कब्जों और बिना किसी नियोजन के विकास ने ऐसे ज्यादातर शहरों को बहुत ही खराब स्थिति में पहुंचा दिया है. इस के बाद सामाजिक परिवेश और कानून व्यवस्था जैसे सवाल हैं, जो इन ज्यादातर शहरों में बड़ी समस्या बन कर सामने आए हैं. अवैध निर्माण और जलवायु व जमीनी प्रदूषण तो देश की राजधानी दिल्ली तक में बेइंतहा है, बाकी शहरों के बारे में क्या कहा जाए.

सरकारी योजनाओं की खामी

2 स्तरों पर है. पहली तो यह कि वह जब भी शहरी विकास की बात कहती है तो पहले से बसेबसाए शहरों में ही सुविधाएं बढ़ाने की योजनाएं पेश की जाती हैं. पिछली यूपीए सरकार की योजना अर्बन रिन्यूअल मिशन और मौजूदा एनडीए सरकारी की स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को इसी खाते में डाला जा सकता है. दूसरे, सरकार उन इलाकों को आरंभ में शहर नहीं मानती जो बड़े शहरों के आसपास अपनेआप बेढंगे तरीके से विकसित हो जाते हैं.  दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, कानपुर, इंदौर आदि किसी भी बड़े शहर के आसपास उगे इलाके शहर की सरकारी परिभाषा में फिट नहीं होते हैं, लिहाजा उन्हें तब तक बिजली, पानी, सीवर, सड़क, स्कूल, अस्पताल, मैट्रो रेल जैसी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जाती हैं, जब तक कि उन का विकास एक राजनीतिक मुद्दा न बना दिया जाए. शहरों को खुद ही विकसित होने देने और उन की आबादी बेतहाशा ढंग से बढ़ते रहने के कारण भी शहर बेडौल और बेनूर हो रहे हैं, यह समझने की जरूरत है.

चीन ने इस मामले में मिसाल पेश की है. जुलाई 2015 में चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी औफ चाइना की एक अहम बैठक में वादा किया गया कि देश की राजधानी बीजिंग के बगल में प्रशासनिक केंद्र के रूप में एक नया शहर बसाया जाएगा जिस की आबादी 2.3 करोड़ तक सीमित रखी जाएगी. शहर की आबादी पर अंकुश रखने और महानगर के बगल में नया शहर बसाने की ऐसी ही नीतियों की जरूरत भारत में भी है.

आप इस लेख को सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं