पिता और पुत्री का प्यार असीम और मांबेटी के प्यार के मुकाबले ज्यादा गहरा और गंभीर होता है. फिर भी कितने ही पिता अपनी बेटी के संरक्षक और रक्षक बनने की जगह भक्षक बन जाते हैं. पुलिस रिकौर्ड ऐसे क्रूर पिताओं के मामलों से भरे पड़े हैं जिन में पिता ने ही बेटी की इज्जत लूटी और उसे न केवल अबोध अवस्था में रोताबिलखता छोड़ दिया, जिंदगी भर के लिए उस पर एक काला साया भी थोप दिया.

साल 2014 में दिल्ली में 23 साल की एक युवती ने अपने 3 मित्रों की सहायता से अपने पिता की हत्या इसलिए कर दी, क्योंकि टैक्सी ड्राइवर पिता उस की मां के मरने के बाद अपनी यौन इच्छा बेटी से पूरी करता था. बेटी ने गुस्से और बदले की भावना में एक रात अपने दोस्तों को बुला लिया जिन्होंने उसे सोते वक्त डंडों से पीटपीट कर मार डाला और फिर उस की लाश को जंगल में फेंक आए.

यह मामला केवल अपराध का नहीं है. यह पितापुत्री संबंधों का है. समाज अभी भी इस कदर सैक्स भूख को स्वीकार करता है कि उसे किस से पूरा किया जा रहा है इस पर सवाल नहीं किए जाते. सब से बड़ी बात तो वे गालियां हैं, जो खुलेआम अनपढ़ों और पढ़ेलिखों सब में दी जाती हैं जिन में मां, बहन, बेटी को सैक्स का निशाना बनाया जाता है.

जो समाज इन शब्दों के किसी धर्म गुरु या देवता के बारे में कहने पर भड़क उठे वह मां, बेटी, बहन के बारे में कहे जाने पर शब्दों को अनसुना कर देता है. गालियों के नाम पर ये शब्द इस तरह दोहराए जाते हैं मानो भगवान के नाम के मंत्र पढ़े जा रहे हों. इस का अर्थ होता है कि इन्हें सामाजिक मान्यता दी जा रही है. गाली में मां, बहन व बेटी का इस्तेमाल खुलेआम करना समाज की गत दर्शाता है. हम कहां हैं, यह बताता है. हमारा नैतिक स्तर क्या है बताता है. गेरुए या काले कपड़ों वाले धर्म के सौदागरों के बावजूद समाज को 4 सही शब्द नहीं सिखा पाना हमारी सभ्यता पर निशान खड़ा करता है.

बेटी का पिता से सुरक्षा का हक जन्म से है पर यह सुरक्षा कवच खुद शरीर को खाने लगे तो इस से बढ़ कर बुरी बात कोई और नहीं हो सकती. अफसोस तो यह है कि देश विकास की बात करता है, गरीबों के हकों की बात करता है, मंदिर वहीं बनाएंगे की बात करता है, पर बेटियों को सुरक्षा का हक देंगे, इस पर चुप है.