गृहशोभा विशेष

टीवी धारावाहिक ‘आम्रपाली’ से ड्रैस डिजाइनिंग का काम शुरू करने वाली कौस्ट्यूम डिजाइनर निरुशा निखत ने कई फिल्मों में भी ड्रैस डिजाइनिंग का काम किया है. वे अब तक करीब 40 टीवी धारावाहिकों और फिल्मों के लिए ड्रैस डिजाइन कर चुकी हैं. अपने 16 साल के कैरियर में निरुशा 54 अवार्ड जीत चुकी हैं. उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में निम्न मध्यवर्गीय मुसलिम परिवार में जन्मीं निरुशा ने इलाहाबाद से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की.

यहां तक पहुंचना निरुशा के लिए आसान नहीं था. काफी संघर्ष के बाद उन्होंने अपनी मंजिल हासिल की. वे सिंगल मदर हैं. बिना शादी किए 1 बेटे की मां बनी हैं. मां बनने का फैसला लेना उन के लिए आसान नहीं था, फिर भी यह साहसी कदम अपने बल पर उठाया. वे अपनी लाइफ को अपने तरीके से जीना पसंद करती हैं. अपने बेटे मनाल और काम के बीच तालमेल बनाए रखती हैं. वे कैसे यहां तक पहुंचीं, आइए जानें उन्हीं से:

आप की नजर में सफलता क्या है?

संतुष्टि का दूसरा नाम सफलता है. अगर आप अपने काम से संतुष्ट नहीं, तो आप सफल नहीं हैं, क्योंकि संतोष से ही आप को मानसम्मान, धन यानी सबकुछ मिलता है.

यहां तक पहुंचने में पिता का कितना सहयोग रहा?

सब से अधिक मातापिता ने ही सहयोग दिया. उन्हीं के सहयोग से मैं इलाहाबाद से मुंबई आई थी. सिंगल मदर बनने का निर्णय भी मातापिता के सहयोग से ही ले सकी थी. मेरे पिता ए.आर. खान डाक्टर थे, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. उन्होंने खुद बचपन में बहुत संघर्ष किया था. उन की कहानियों को मैं हमेशा सुनती रहती थी. मेरी मां भी अनाथ थीं और पढ़ीलिखी भी नहीं थीं. उन को सिर्फ उर्दू भाषा आती थी. पिता की कोशिश से उन्होंने 10वीं की परीक्षा शादी के बाद पास की थी. पिता मेरे लिए रियल लाइफ हीरो थे. उन से मैं बहुत प्रेरित थी.

जीवन में कितना संघर्ष रहा?

जब मैं मुंबई आई थी तो मेरी मां ने अपनी सोने की अंगूठी बेच कर मुझे पैसे दिए थे. मैं बचपन से क्रिएटिव थी. बचपन से पेंटिंग का शौक था. मां की साडि़यों को काट कर कुशन कवर बनाती थी. 3 साल तक काफी संघर्ष रहा, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है. जब जो काम मिला करती गई. मेरे लिए यह अच्छा रहा कि जिस दिन मुंबई आई उस के अगले दिन ही मुझे काम मिल गया. उस समय मैं केवल 21 वर्ष की थी. मैं ने अपने फोटो हर जगह भेजे थे. लेकिन पाया कि ऐक्टर बनने का सपना ठीक नहीं, क्योंकि उस समय चैनल कम थे. फिर अधिकतर लोग रात को चर्चा करने के लिए बुलाते थे, जो मुझे पसंद नहीं था. इस के बाद सैल्स गर्ल का काम किया. सैट पर कपड़े ले कर जाती थी. इस से लोगों से परिचय बढ़ा और मैं डिजाइनर बन गई.

पिता की किस बात को अपने जीवन में उतारती हैं?

उन में किसी भी स्थिति में आगे बढ़ते रहने की भावना थी, जिसे मैं ने अपने जीवन में उतारा है. उन्होंने हर कठिन स्थिति में कभी हार नहीं मानी. वे गांव से स्कूल 50 किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय कर जाते थे. उन का उद्देश्य बहुत साफ था. मुसलिम परिवार में होते हुए भी उन की सोच बहुत अलग थी. उन्होंने हमें सीख दी कि हम सभी भाईबहनों को किसी भी तरह अपनी पढ़ाई पूरी करनी है.

आप ने सिंगल मदर बनने का इतना बड़ा फैसला कैसे लिया?

2005 में मैं मुंबई में लिव इन रिलेशनशिप में थी. जब शादी करना चाही तो पता चला कि वह शादीशुदा है. जब तक यह समझ पाती कि अब क्या करूं, तब तक मैं प्रैगनैंट हो चुकी थी. रिश्ता टूट गया. सब ने गर्भपात करवाने की सलाह दी, लेकिन मैं ने सोचा कि यह मेरे प्रेम संबंध का नतीजा है, इस में बच्चे का क्या कसूर है? अत: मैं ने फैसला लिया कि मैं इसे जन्म दूंगी. मेरे इस फैसले को मेरे परिवार वालों ने सहयोग दिया. गर्भावस्था के दौरान मैं पूरा समय अकेली थी. बच्चे की डिलिवरी के वक्त मैं ने खुद अपने फार्म पर हस्ताक्षर किए थे. पैसे की भी तंगी थी. लेकिन सब धीरेधीरे ठीक हो गया. अब मेरा बेटा 11 साल का है. इस दौरान मुझे कभी नहीं लगा कि मां बनने के लिए पिता की जरूरत होती है.

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